क्या तीन तलाक खत्म होने से महिलाओं को मिलेगा समान अधिकार

क्या तीन तलाक खत्म होने से महिलाओं को मिलेगा समान अधिकार

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क्या तीन तलाक खत्म होने से महिलाओं को मिलेगा समान अधिकार

23 अगस्त 2017 (मंगलवार) को भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक अहम फैसला सुनाते हुए तीन तलाक को खत्म कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय के 5 न्यायाधीशों में से तीन न्यायाधीशों ने इस कुप्रथा को असंवैधानिक बताया और दो न्यायाधीशों ने इस कुप्रथा पर छह माह के लिए रोक लगा दी तथा
सरकार को निर्देश दिए के छह माह के अंदर तीन तलाक जैसी कुप्रथा पर कानून बनाए, जिससे आरोपियों के विरुद्ध उचित कार्यवाही हो सके। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के साथ ही देश से तीन तलाक (तलाक विद्दत) जैसी कुप्रथा समाप्त हो गई।

अभी जारी हैंं तलाक के अन्य तरीके

मुसलमानों में तलाक के 3 तरीके प्रचलित है। तलाक-ए- अहसन, तलाक-ए- हसन और तलाक विद्दत। जिसमें तलाक विद्दत को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समाप्त कर दिया गया है। तलाक के तीनों तरीके क्या है चलिए जानते हैं।

तलाक-ए- अहसन-: तलाक ए अहसन मुसलमानों में तलाक की सबसे अधिक मान्य प्रक्रिया है, इस प्रक्रिया में किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी को एक बार तलाक दिया जाता है लेकिन तलाक देने के बाद पत्नी पति के साथ ही रहती है लेकिन तीन महीनों तक उनके अंदर सुलह नहीं होती तो 3 महीने के बाद तलाक स्वत ही प्रभावी हो जाता है।

तलाक-ए- हसन-: तलाक की इस प्रक्रिया में कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को एक एक महीने के अंतराल से तलाक देता है, इस बीच इन तीनों महीनों में आपस में सुलह नहीं हुई तो तीसरे महीने में तीसरी बार तलाक कहने पर उनका संबंध खत्म हो जाता है।

तलाक विद्दत-: यह तलाक की सबसे अमानवीय प्रक्रिया है, इसमें एक साथ तीन तलाक कह देने से ही तत्काल प्रभाव से तलाक प्रभावी हो जाता है और दोनों के बीच पति पत्नी का रिश्ता खत्म हो जाता है। तलाक इन तीनों प्रक्रियाओं में तलाक-ए- अहसन और तलाक-ए- हसन में पति पत्नी के बीच सुलह की गुंजाइश भी होती है, परिवार के लोग मिलकर पति पत्नी के बीच सुलह कराने की कोशिश करते हैं लेकिन तलाक विद्दत में ऐसा नहीं होता।

तलाक विद्दत समाप्त होने के बाद कितना आएगा बदलाव

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से सभी मुस्लिम महिलाएं खुश है और अधिकतर सभी लोग मान रहे हैं कि यह प्रथा खत्म होने से मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार मिल जाएगा, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। तलाक विद्दत पत्र, एसएमएस, और जुबानी रूप से तीन तलाक कह देने भर से तलाक प्रभावी हो जाता था, लेकिन जो व्यक्ति तलाक लेना चाहता है क्या वह तलाक का दूसरा तरीका नहीं निकालेगा, वह नगर पालिका के चेयरमैन या किसी भी प्रकार के जनप्रतिनिधि को पत्र भेजकर पत्नी को तलाक देने की घोषणा कर सकता है, मौखिक रूप से एक झटके में तलाक न देखकर वह दूसरा रास्ता निकाल लेगा।

महिलाओं में तलाक से भय की वजह

मुस्लिम महिलाएं हो या हिंदू महिलाऐ तलाक के नाम पर वह भयभीत रहती हैं क्योंकि उन में या तो शिक्षा की कमी है या वह आत्म निर्भर नहीं हैंं, समाज में महिलाएं विवाह के बाद पूरी तरह पति पर निर्भर रहती है ऐसी में वह पति की बदतमीजियों को बर्दास्त करके भी उसके साथ रहती हैं, जब तक महिलाएं आर्थिक रुप से आत्म निर्भर नहीं होगी तब तक तीन तलाक खत्म होने से मुस्लिम महिलाओं को ना के बराबर ही फायदा होगा। सम्मान की जिंदगी जीने के लिए महिलाओं के लिए शिक्षा और आत्मनिर्भरता अत्यंत आवश्यक है।

भारत के पहले तीन तलाक जैसी कुप्रथा को 20 देश पहले ही खत्म कर चुके हैं, यहां तक कि पाकिस्तान और बंगलादेश में भी तीन तलाक पहले ही समाप्त कर दिया गया है। भारत के मुसलमान खुद को पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुस्लिमोंं से अधिक सभ्य, शिक्षित और धर्मनिरपेक्ष मानते हैं, फिर धर्म के नाम पर इतने कठोर कानूनों को क्यों मानते हैं, वह कौन से कानून से बंधे हुए हैं, क्यों वह नारी को समान अधिकार देने में विरोध कर रहे हैं। तलाक देना एक स्वाभाविक और मानवीय प्रक्रिया है लेकिन एक बार में तलाक बोल कर सालों के रिश्ते को खत्म कर देना अवश्य ही अमानवीय और पाप है।

बनाया जाए कठोर कानून

सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक पर सरकार को कानून बनाने के लिए 6 माह का समय दिया है। अब सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह इस कुप्रथा को मानने वालों के लिए कठिन दंड का प्रावधान करें। महिलाओं को भी चाहिए कि वह शिक्षित हो कर आत्मनिर्भर बनें, जिससे वह किसी व्यक्ति पर आश्रित ना रहें और अपने हक के लिए लड़ सकेंं। पुरुषों की तरह महिलाओं को भी तलाक देने का समान अधिकार मिलना चाहिए। जिस तरह शादी के समय दो लोगों की पसंद पूछी जाती है उसी प्रकार तलाक लेते समय भी दोनों की सहमती होनी चाहिए।

एक बार में तीन तलाक खत्म करना इस कुप्रथा को समाप्त करने में पहला कदम है, हालांकि अभी यह शुरुआत है इसके लिए अभी लंबी लड़ाई लड़े जाने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक शांत तालाब में एक लहर मात्र उठी है। अपने हक की लड़ाई में सभी महिलाओं को साथ आगे आना होगा तभी इस कुप्रथा से उन्हें मुक्ति मिल सकती है। उन महिलाओं का प्रयास तारीफ के काबिल है जिन्होंने इतने सालों की इस कुप्रथा को समाप्त करने का बीड़ा उठाया और पूरे धर्म का विरोध झेलकर अपने हक की लड़ाई में सामने आई।

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