ऐ हवस, तू बस भी कर …

ऐ हवस, तू बस भी कर …

ऐ हवस,
अब कर भी बस,
कुछ खा तरस,
और ढूंढ तू शख्स ।

मैं हूँ बेबस,
ना बचा अब रस,
क्यूँ रही है हस ?
तूने लिया है डस ।

तेरे सिर हैं दस,
तेरा दुस्साहस,
मैं गया हूँ फंस,
बना तेरा दास ।

ना तू टस से मस,
है जस की तस,
तू झूठा सच,
दे पहनने वस्त्र ।

हूँ मेहनतकश,
पर गया हूँ धँस,
तेरा मामा कंस,
तभी ऐसा अंश ।

तू है कर्कश,
और जैसे चरस,
तेरा हर एक कश,
पिये ना कोई काश !

लगे तू दिलकश,
जाए दिल में बस,
जाने सबकी नस,
कमज़ोरी नब्ज़ ।

तू झूठी तपिश,
तेरी तफ्तीश,
होती वर्जिश,
तू हो वर्जित ।

तेरी लत अनुचित,
तड़पे चिंतित,
ना हो विकसित,
ना तू अमृत ।

तेरी जो तलब,
नशा रात दिवस,
तेरे पीछे सब,
शर्मसार धरा नभ ।

तू छल की मित्र,
मेनका का चित्र,
बनाए विश्वामित्र,
अच्छा ना चरित्र ।

तू जैसे गिद्ध,
करे सबको दरिद्र,
करे क्या तू सिद्ध ?
बंद बुद्धि के छिद्र ।

मैला तन मन चित्त,
तेरे अश्लील गीत,
तू मतलब की मीत,
करे सब प्रदूषित ।

तेरा ना कोई वारिस,
करे तू तो अपाहिच,
तुझमें केवल साज़िश,
सारी दलीलें हैं खारिज ।

तुझे देख ओझल समझ,
जाते हैं बाज़ार सज,
सोचते ‘क्या है हर्ज’ !
वास्तव में तू एक मर्ज़ ।

तेरे कारण सबकुछ उजड़,
ज़ोर किसी का सके ना चल,
अच्छा खासा हो पागल,
हिंसक उग्र हर एक पल ।

तू अपनों में कलह करवाए,
दिमाग पे बस तू ही छाए,
चले साथ जैसे चलते साए,
मगरमच्छ के आंसू बहाए ।

तेरा शिकार अक्सर मर्द,
रोष, ग्लानि, अवसाद, दर्द,
तू पत्थर, ना पड़े है फ़र्क,
ज़हर ऐसा कि कांपे सर्प ।

तेरी जिसे लगे आदत,
ना मरे और ना वो जीवित,
बदले तू कई रूप नित,
अतृप्ति से मन चिंतित ।

तू करदे खोखला शरीर,
छल कपट के मारे तीर,
तेरी धुंधली है तस्वीर,
खेल खेल में तू दे चीर ।

मृग तृष्णा में तू माहिर,
कुआं दलदल, ये जग ज़ाहिर,
तुझमें बसना चाहे मुसाफ़िर,
बार बार वो आए फ़िर ।

वासना में हों देह से लिप्त,
जिस्म से जिस्म रहें लिपट,
बस चले तो सब कुछ जप्त,
ये व्यापार, ना रिश्ता रक्त ।

कैसी लालसा, ये कैसा भ्रम ?
बस मतलब का है संगम,
हुआ मशीनी अब तो सब,
संबंध नाते गए हैं जम ।

इज़्ज़त आबरू को तू मारे,
शरीफ़ पे तू कीचड़ उछाले,
बुरी नज़र तू सबपर डाले,
अक्ल पे तब लग जाएं ताले ।

भिन्न भिन्न हैं तेरे नाम,
लिप्सा करे सब काम तमाम,
कामवासना से बुरे अंजाम,
नष्ट यौवन, पूरा आवाम ।

गले की हड्डी गई तू बन,
फ़ैली है आंगन आंगन,
वश में ना सीधा भी जन,
कामुक भावना हर एक मन ।

चोरी छिपे तू आती है,
आंखों से कह जाती है,
नीयत ख़राब करवाती है,
फिर भी सबको भाती है ।

कैसी है तू कठिन पहेली ?
कितनों के तू दिल से खेली ?
तू महामारी जैसी फ़ैली,
तेरा कसूर, दूजे ने सज़ा ली ।

तू षडयंत्र की है महारानी,
धूर्त तू धन की भी दीवानी,
सगी ना अपनी, है बईमानी,
जज़्बातों की कभी कद्र ना जानी ।

चाल चलन करे तू है खराब,
कलयुग में तू बेहिसाब,
चकाचोंद बस झूठे ख़्वाब,
तेरी वजह से ही भटकाव ।

मांस के टुकड़े में दिलचस्पी,
धोखेबाज़ी सबसे सस्ती,
देह व्यापार की सजती मंडी,
भोग से तू क्या हासिल करती ?

क्या सो गया है तेरा ज़मीर ?
तेरे शिकंजे में गरीब अमीर,
पाके तुझको हो जाएं फ़क़ीर,
स्वार्थ व मद की तू तस्वीर ।

असली क्या तेरा मकसद ?
पार करे है तू तो हद,
तेरे लिये निकलें अपशब्द,
तेरो हरकत से हूँ मैं निःशब्द ।

सोचने समझने की शक्ति ख़त्म,
तू करती पवित्रता भस्म,
ऐसे देती है तू ज़ख्म,
वैशी दरिंदा होता उत्पन्न ।

सुबह शाम बस तेरा नाम !
और ना कर सके कोई काम,
तू कर दे दूजा बदनाम,
तुझपर चाहिए पूर्ण विराम ।

आत्मा से परमात्मा दूर करे,
बिन बात का गुरूर करे,
ज़मीनी हक़ीक़त चूर करे,
तू हरकत बड़ी क्रूर करे ।

ना बरपा तू इतना कहर,
तू बस ज़हर, तू बस ज़हर,
बिल्कुल ना तू कहीं ठहर,
दुराचार तेरी ही शह पर ।

तुझसे दूरी बहुत ज़रूरी,
अपनाना तुझे ना मजबूरी,
पापी तू पूरी की पूरी,
राक्षसी तू, देदे कमज़ोरी ।

तू जो हो तो सबकुछ शून्य,
तेरे बिन ज़िन्दगी है अमूल्य,
काश तुझे पूरा विश्व ही भूले,
जीवन मिला कि करलो पुण्य ।

निकलें सब तेरे चक्रव्यूह से,
फंसे पड़े हैं जाल में कब से,
प्रार्थना मेरी पूरे समूह से,
अंतर्बोध हो अपनी रूह से ।

जंज़ीरें जाएं जल्दी खुल,
आज़ादी नम और गुमसुम,
ना जाने कहां हो गए हम गुम ?
वापस लौटें निर्मल कुटुम्ब ।

कहने से कुछ भी ना होगा,
प्रयास अगर तो सब कुछ होगा,
नियंत्रण ने बहुत कुछ है रोका,
कब तक देंगे ख़ुद को धोखा ?

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