कविता -मै‌ लक्ष्मी दो आँगन की

कविता -मै‌ लक्ष्मी दो आँगन की बेटी बन आई हूं मै जिस‌ आशियाने के आँगन में ।बसेरा होगा कल किसी और घर के आँगन में ।। क्यों चलाई ये रीत,खुदा तेरे इन साहसी बन्दों ने ।आज़ नहीं तो कल पराई कर दी तेरे अदीबों ने ।। जन्म हूआ तब, ना बंटी

फायदा ही क्या है

बे'वजह ,असमय बोलने मे‌ तेरा फायदा ही क्या है, अपनी कमजोरियों को दिखाने से फायदा ही क्या है ।। सबको मालूम यहां स्वार्थी लोग निवास करने लगे हैंफिर तेरे स्वार्थी या निस्वार्थी बनने‌ से फायदा ही क्या है || अजय माहिया

कविता-बचपन

कविता-बचपन कल की ही बात थी वो,जब गुड्डे-गुड्डियों‌ का खेल था ।बस.. वो ही यह दिन था,जिसमे बचपन का मेल था ।। वो आए,तुम गए,तुम आए,वो गए,फिर से सब आए ।काश वो घरौंदे बनाने, बचपन वाले दिन फिर आए ।। वो माँ की गौद मे खेलना ,फिर उठकर भाग

अजय महिया छद्म रचनाएँ – 6

भूली-बिसरी यादों का झरोखा हूं मै,कभी इन झरोखों से झांक कर देखो …तेरा वज़ूद नज़र आएगा ।।अजय महिया माँ- मेरा हृदय हैतो बहन -मेरी सांस,पिता मेरी धड़कन हैतो भाई मेरी ज़ान,दोस्त मेरा घर हैतुम मेरी जहान् ।।अजय महिया मिले भी तो क्या हुआ,दिल

अजय महिया छद्म रचनाएँ – 5

हर सुबह का धूआं कोहरा नहीं होता है ।हर रात का चन्द्रमा काला नही होता है ।।बीत जाते हैं ज़िन्दगी के हसीन पल भी ।हर दिन नए साल का सवेरा नहीं होता ।। अजय महिया नोहर, हनुमानगढ़ दिल की धड़कनें ,रातों की नींद,मेरा चैन ले गई ।इक खुबसूरत कली

पन्द्रह अगस्त‌ की उस गाथा को, हम यूं ही नहीं गाते हैं।।

बहुत कठिन था वो दौर,जिसको आज हम याद करते हैं ।पन्द्रह अगस्त‌ की उस गाथा को,हम यूं ही नहीं गाते हैं।। मंगले पांण्डे चढा फांसी पर,लक्ष्मी बाई के हम दिवाने है ।पन्द्रह अगस्त‌ की उस गाथा को,हम यूं ही नहीं गाते हैं।।

ज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलो

ज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलोसफर को हमसफर बनाते‌ चलो ।हर ग़म से भी बे'ग़म होते चलोज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलो ।। है ग़ुलिस्तां गुल ये,कह रहे हैं सभीमांगने से ना मिलेगी फिर ज़िंदगी ।तन्हाई को मुस्कुराकर सहते चलोज़िन्दगी‌ का गीत

वो बात नहीं रही

लगता तेरे जहां मे इंसानों की कदर नहीं रहीतभी तो इंसान को इंसानों से चाहत‌ नहीं रही ।। लगता‌ है जा रहे हैं सुनहरे पल इस ज़माने केतभी तो एक- दूसरे घर में वो बैठक नहीं रही ।। लगता है बीत रहा है मेहमानों वाला दौर भीतभी तो स्वागत करने वाली

तेरे शहर की हवाओं का रूख देखा है हमने

तेरे शहर की हवाओं का रूख देखा है हमनेहर गली-मौहल्ले की दिवारों को सुना है हमने ।। कह रही‌ दर्द-ए-दास्तां हर जुर्म‌ की वो दिवारेंमा-बाप को घर से निकालते देखा है हमने ।। घर से निकाला !‌खैर ,कोई बात की बात नहींबेजुबान पक्षियों को भी नही

अजय महिया छद्म रचनाएँ – 4

इश्क का ऐसे ना इज़हार कर,तेरे नैनों से मुझपे ना वार कर ।मै‌ इश्क का मारा हूं ,मेरी सलामती की दुआ कर ।। अजय महिया नोहर, हनुमानगढ़ मेरी गज़लों से मेरा एतबार करनाप्यार हो जाए तो इकरार करना ।ये ज़िन्दगी है पल-दो-पल कीशाम ढ़ल जाए तो

गीत- रुस्वा करूं {अजय माहिया}

खुदा करे के तु रूठे ओर मनाऊं मैइसी दिन के लिए,तुझे सताऊं मै । कैसा ये अफ़स़ाना,कैसी मोहब्बत है‌‌‌ ‌‌ तुम्ही को रूस्वा करता जाऊं मै । कितनी सीदत से तुझे ,तराशा है खुदा नेलगता है कोई जन्नत की नूर है तू । तेरे लिए ही जीता हूं और मरता

अजय महिया छद्म रचनाएँ – 3

तेरी ज़ुल्फों का साया जो मिला होता‌ मै इक पल वहां आराम से सोया होतालेखक अज़य महिया अब सत् और असत् मे द्वन्द्व होगा‌‌‌धोखे और धोखेबाज़ से युद्ध होगाअब याचना नही केवल रण होगाया तो जीवन या फिर मरण होगाअब अनीति पर जीत,जश्न न होगाखड़्ग की नोक

अजय महिया छद्म रचनाएँ – 2

वो कहने लगे हम‌ सुनने लगेकिसको पता था वो इतना कह देंगेअरे! हम तो तन्हाइयों की गली मे बैठे थेकिसको पता था गली भी बेवफा निकलेगीअजय महिया - इश्क का राही इश्क तेरे दरबार से तकरार न हो,, अब मै महफुज़ हूंतेरा खुदा बख्शे जिन्दगी मेरी , मै तेरे

मै‌ ही हूं – अजय महिया – इश्क का राही

मै ही इश्क हूं,मै ही मौहब्बत हूंमै ही प्यार और मै ही एतबार हूंमै ही नशा हूं ,मै ही नशेड़ी हूंमै ही कल हूं और मै ही आज हूंमै ही घर हूं,मै ही परिवार हूंमै ही माता और मै ही पिता हूंमै ही सूरज हूं ,मै ही चांद‌ हूंमै ही दिन और मै ही शाम हूंमै

संकटमय आदमी,अदम्य साहस

छोड़ जाऊं तुमको ,पर उनको कैसे छोडूंजी लूं मै जीवन,पर तन्हाई को कहां छोडूं पल-पल तरसता हूं ,तुम्हारा प्यार पाने कोपर मा-बाप के प्यार को कैसे,क्यों‌ छोडूं सपना तो हर रोज देखता हूं खुशियों कापर दरिद्रता रूपी कठिनाई को कहां छोडूं‌

मुक्कदर भी तेरा रफी़क होगा

मत सोच तेरे मुकद्दर मे क्या लिखा है ।जो नही लिखा है उसे लिखना सीख ।।‌क्या सोचती है‌ दूनिया तेरे लिए इसे छोड़।तु बस अपनी मंजिल‌‌ को पाना सीख ।।कौनसा रास्ता जाता है उस मंजिल तक ।‌‌‌‌ तु बस उस सही रास्ते को खोजना सीख ।।सीख लिया तुमने दृढ

अजय महिया छद्म रचनाएँ

तड़फ उठती है‌ सांसे,रूक जाती है धड़कन ।जब इश्क‌‌ के हर अल्फ़ाज़,हमको याद आते है ।।एक रोज देखा था ,तुमको किसी ओर के साथ ।अब लोग उसी अल्फाजों से ,हमें जलाते‌ है ।।अजय महिया - इश्क का राही जब जन्म‌‌ हुआ तब भी सम था,जब मृत्यू होगी तब भी

ग़म-ए-शायरी

ग़म-ए-शायरी दिल-ए-दर्द को शब्दों मे बयां कर दूंगा‌ आंखों के आंसूओं को पन्नों पर लिख दूंगामै पाप,मद और अत्याचार का विरोधी हूं‌‌‌‌‌ समय आने पर तुम्हारे दिलों मे लिख दूंगा अज़य महिया

कविता-मौत की दस्तक

कविता-मौत की दस्तक मै जीवन की आशाओं में खोया थामै ज़ीवन की निराशाओं मे रोया थामै‌ उस मौत-ए-महबूबा को भूलकरमै कल फिर से उठने के लिए सोया था रात के घनघोर अंधेरे मे किसी ने मेरे,दिल-ए द्वार पर यकायक दस्तक दीमै एकाएक चौंका और इज़्तिराब

एक जीवन ऐसा भी……

एक जीवन ऐसा भी…… जीवन की तन्हाई को महसूस करसांसों को रोके जा‌ रहा‌ हूं मैं ।नुमाईसें तो बहुत‌ हैं मेरे अंदरफिर भी प्यार निभा रहा हूं मैं।। किस ने देखी दीपक की बातीकि वो अंधियारे को मिटा देती‌ है।फिर भी हे साखी !‌‌ ‌ ‌ ‌ ‌‌‌ ‌ उसी‌ को
मेरी राय ऍप MeriRai App 😷

अब अपने पसंदीदा लेखक और रचनाओं को और आसानी से पढ़िए। मेरी राय ऍप डाउनलोड करे | 5 Mb से कम जगह |

error: Content is protected !!