‘‘आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरि’’ अनुभूति, अभिव्यक्ति

          आचारांग सूत्र की एक पंक्ति हैः- पणया वीरा महाविहिं(1@20) अर्थात् वीर पुरु”ा ही महापथ पर गतिमान हो सकते है। त्यागपथ महापथ है, संयम मार्ग महामार्ग है। जो पथ आत्मा को परमात्मा तक पहुॅचा दे, वह महापथ। जो मार्ग आत्मा को अनावृत कर उसके ‘ाुद्ध-‘ाुभ््रा स्वरुप को प्रत्यक्ष कर दे, वह महामार्ग। त्याग के इस महान किन्तु कंटकाकीर्ण,स्वच्छ किन्तु क”ट पूर्ण पथ पर जो अग्रसर हो जाता है, वह महापथ का पथिक कहलाता है।
            साधना के इस पथ पर जो विद्यमान है उसके स्व-पथ से विचलित बना देने वाले अनेक अवरोधों का सामना करना पडता है, प्रतिकूल औेर अनुकूल दोनों प्रकार के संकटों का सामना करना पडता है।प्रतिकूल उपसर्गों को सहन करना साधक के लिये आसान है, परन्तु अनुकूल उपसर्गों को पचा पाना महापथिकों के ही बस की बात है। ‘ाारीरिक क”ट,आधिव्याधि,उपाधि ये प्रतिकूल उपसर्ग है, मान प्रति”ठा कीर्ति आदि अनुकूल उपसर्गों की श्रेणी में आते है। संपत्ति,संग्रह’ाीलता, सुखोपभोग वृत्ति, और प्रति”ठा के प्रति आर्क”ाण ये तीन अनुकूल उपसर्ग के महाबलि”ठ हथियार है। बडे बडे ऋ”िा क्रेाध पर विजयी देखे जा सकते हैे, पर उन्हीे को य’ाकीर्ति के आगे नत देखा जा सकता हेंजो अपनी साधना-प्रक्रिया के द्वारा इन्हें व’ा में कर लेता है, वही ‘‘ महापथिक’’ संज्ञा से अभिहित होता है। ऐसे ही महापथिक परम पूज्य गुरुदेव बहुमुखी प्रतिभा के धनी, प्रज्ञापुरु”ा,आचार्य सम्राट श्रीमज्जिनकान्तिसागर सूरी’वर जी म.सा.को ‘ात’ात नमन्, वंदन।
           विक्रम संवत 1075 के आसपास की चर्चा है। उस समय की स्थिति बडी ही विचित्र क्षोभदायी थीं। उस युग में जैन धर्म ’िाथिलाचारियों के पंजें मे ंजकडा हुआ था।महावीर के नाम से ही अपना सिक्का चलाने वाले साधु उनके सिद्धान्तों के विपरीत  आचरण अपना रहे थे।महापीर ने कहा था कि, तुम अप्रतिबद्ध रुप से विहरण करते रहना, वे मठाधी’ा बन गये थे। महावीर ने उपदे’ा दिया था – धन वैभव से दूर रहना, वे परिग्रही हो गये थे। महावीर का कथन था- ‘ाारीरिक ‘ाुश्रु”ाा से दूर रहना, वे स्नानादि तो करते ही थे,इत्रादि का उपयोग भी करते थे। महावीर का उद्घो”ा था- हमे’ाा आत्मचिंतन में लीन रहना उन्होंने ज्योति”ा,मंत्र, तंत्रादिविद्या से लोगों को प्रभावित करना ‘ाुरु कर दिया। महावीर का आदे’ा था कि, तुम पादविहारी होना, वे रथादि की सवारी करने लगे।
             

प्रभू महावीर के सिद्धान्तों के प्रतिकूल आचरण, आचारित होता देख बौद्धिक वर्ग सोचता था, किसी विरल विभूति का प्रादुर्भाव हो, जो महावीर के सिद्धान्तों को पुनः प्रतिस्थापित कर सके। और वह विभूति जिने’वर सूरि जी के रुप में मिली। सत्य के सूर्य के समक्ष असत्य के धूल भरे बादल छिन्न भिन्न हो गयें। दुर्लभ राजा की राजपरि”ाद्  मे हुये ’ाास्त्रार्थ में ’िाथिलाचारी श्रीपूज्यों, मठाधी’ाों को कडी ’िाकस्त मिली। जिने’वर सूरी विजयी उद्घो”िात हुये। राजा ने तत्क्षण ‘‘ आप खरे हो’’ एसा कहते हुये‘‘खरतर’’ की उपाधि से विभू”िात किया। जिने’वर सूरी के ‘ाुद्ध सत्य सिद्धान्तों के परिपालनार्थ कई संयमी उनके साथ जुड गये ।

तब से ‘‘खतरगच्छ’’ प्रारम्भ हुआ। इस गच्छ में ‘जिनचन्द्रसूरी’ जिन्होंने ‘सवेगरंग ‘ााला’’ रची, ‘ अभयदेव सूरी’ जिन्होंने नव अंग पर टीका लिखी, ‘जिनदत्त सूरी’जिन्होंने लाखों व्यक्तियों को जिन पंथ का पथिक बनाया। सुल्तान मुहम्मद प्रतिबोधक ‘जिन प्रभू सूरि’ मणिधारी ‘जिन चन्द्रसूरि’  ‘ जिनकु’ालसूरि’ जिनके चमत्कार साक्षात् है। ‘जिनभद्रसूरि’ जिन्होंने स्थान- स्थान पर ज्ञान के भण्डार खोले।

नाकोडा तीर्थ के संस्थापक ‘कीर्तिरत्नसूरि’ अकबर प्रतिबोधक ‘जिनचन्द्रसूरि’ कविवर ‘जिन हर्”ासूरि’ आध्यात्म योगी ‘आनन्दघनजी’ द्रव्यानुयोग के प्रोैढ व्याख्यातादेवचदजी, योगीराज चिदानंदजी समयसुन्दरोपाध्याय,जिन्होंने आठ लाख अर्थ करके विद्वज्जनों को चमत्कृत कर दिया। ‘ क्षमाकल्याणोपाध्याय’‘सुखसागरजी’आदि सेंकडोंप्राणवान हुये जिन्होंने साहित्य लेेखन, साहित्य सर्जन, साहित्य संरक्षण, तीर्थ निर्माण,सम्यक्त्व प्रदान आदि नानाविध विधाओं से मानव को सत्य मार्ग दिखाया।आपश्री ने विचरण के दौरान उपदे’ाों के माध्यम से सत्य के स्वरुप का विवेचन तो किया ही,साथ ही साथ उसकी प्रप्ति क लिये कई ‘ाास्त्रीय प्रक्रियाओं का आयोजन भी किया।
                  

सत्य आत्मा का साक्षात्कार करने का एक अनुपम उपक्रम है तप। तप के माध्यम से जब इंद्रियों पर व मन पर अंकु’ा लगता है तो, बुद्धि का आत्मा से संयोंग होता हेै।  आपने ‘‘तप’चरण से आत्म दर्’ान’’ पर अधिक बल दिया। तप’चर्या के साथ साथ मन को साधना के साथ जोडने की अद्वितीय प्रक्रिया है उपधान। अर्थात् आत्मा के समीप पहुॅचने की क्रिया उपधान है। कुल 114 दिन के उपधान के स्थूल रुप से तीन और सूक्ष्म रुप से सात चरण है। इस साधना में एक रोज उपवास,और दूसरे रोज एकासना अथवा आयंबिल करना होता है। इस ‘ाारीरिक तप’चर्या के साथ साथ आध्यात्मिक तप’चर्या भी चलती है। सर्वथा मौन, अरिहंत सिद्ध की उपासना से संयुत इस अराधना  से राग-द्वे”ा व क”ाायों का संक्षिप्तिकरण  होता है। यह साधना -विधि जैनर्”िायों की अनुपम साधना की अनुपम देन है। आपश्री ने इस साधनाविधि का अनेकों बार आयोजन करवाया जिससे हजारों हजारों साधक लाभान्वित हुये है।  आचार्य श्री का ‘ात ‘ात वंदन अभिनंदन।
              
                 
                
               
                  

अभिव्यक्ति‘‘आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरि’’ अनुभूति
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