अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से कहे …

अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से कहे …

सोचता था मैं पहले कि तुम,
मेरे रक्षक, मुझको घेरे हो,
आज मग़र अहसास हुआ कि,
तुम तो निकले सौतेले हो ।

दहशत, दर्द, ज़ुल्म, आतंक,
ना जाने क्या क्या दे रहे हो,
पाल पोस तुम्हें बड़ा किया,
तुम बने मेरे ही लुटेरे हो ।

अपने ही भाई बंधू को,
तुम ही तो रहे खदेड़े हो,
जाने किस शत्रु की शय पे,
तुम हो रहे गुंडे चौड़े हो !

बहकावे में मत आओ कि,
तुम अक्ल से पैदल, थोड़े हो,
ऐड़ा बनकर खा रहे पेड़ा,
तुम सीधे नहीं, बहुत टेढ़े हो ।

जल्द होगे तुम भस्म कि,
बेवजह मुझको छेड़े हो,
आग से तुम तो खेल रहे हो,
जल जाओगे नोसिखिये हो ।

कैसे मैं विश्वास करूं,
तुम संग बरसों से झमेले हों,
फ़ितरत में केवल है धोखा,
तुम जज़्बातों से खेले हो ।

देखो दिन कैसे बदले हैं,
अजगर से बने सपेरे हो,
कितनी अशांति फैलाई है,
बस खौफ़ ही बिखेरे हो ।

कितने मुखोटे लगाए हुए हैं,
तुम वाकई दोगले चेहरे हो,
मासूमों का करते शोषण,
चौबीसों घंटे पहरे हों ।

कौन तुम्हे कल याद करेगा ?
तुम कातिल और विषैले हो,
ज़मीर अंदर धंस चुका है,
इसलिए इतना फ़ैले हो ।

ऊपर से चाहे जश्न व मेले,
ढीली हो गई नकेलें हों,
अंदर पर है अफ़रातफ़री,
तुम बेहद ही अकेले हो ।

तुमसे अच्छे जंगली जानवर,
तुम ठहरे जैसे भेड़िये हो,
दुविधा में हूँ रिश्ता जो है,
तुम मेरे नहीं, पर मेरे हो ।

अफ़ग़ानिस्तानकवितातालिबान