भ्रष्टाचार की कब्र में दफन भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन

 

   अभी पिछले दिनों टीम अन्ना ने अपना अनशन यह कहते हुये खत्म कर दिया था कि, अब वे देश को राजनैतिक विकल्प देगें और तभी जन लोकपाल बन पायेगा। लेकिन अन्ना ने अचानक अपने ब्लाग में टीम अन्ना की कोर कमेटी को भंग करने की घोषणा करके सबको चैंका दिया  है।

अन्ना की इस घोषणा के क्या माने है? क्या यह हताशा में लिया गया कदम है? या वो अपनी टीम के सदस्यों से खुश नहीं थे? या कुछ और? इस आन्दोलन वापिसी, टीम अन्ना को स्वयॅ अन्ना द्वारा यह कह कर भंग कर देना कि, अब इस का कोई काम बाकी नहीं रह गया है और भ्रष्टाचार से निपटने के लिये एक राजनैतिक विकल्व देना लेकिन उसमें स्वॅय न तो चुनाव लडना और न हीं किसी राजनैतिक पार्टी का सदस्य  बनना अनेक प्रश्नों को जन्म दे गया है।

अन्ना के इस कदम के पीछे कुछ तो ऐसे कारण होगें जिन्हें केवल अन्ना ही जानते होगें या फिर उनके एकाध सलाहकार। लेकिन जानकार सूत्र तो सह बताते है कि, अन्ना को बहुत सारे निर्णयों की जानकारी समय पर ही दी जाती थी। इस अनशन के बारे में भी यही कहा जा रहा है। इस आन्देालन से जुडा हर एक व्यक्ति यही कह रहा है कि, क्या ये अनशन करने का सही समय था? साथ ही एक प्रश्न यह भी अनशन स्थल पर पूरी गंभीरता से पूछा जाता रहा कि, क्या लोकपाल के स्थान पर 19 मंत्रियों  के भ्रष्टाचार केा मुद्धा क्यों बनाया गया? यदि मंत्री भ्रष्ट हैं तो उनके विरुद्ध न्यायालय में कार्यवाही क्यों नहीं की गई? उनकी यह मांग हास्यास्पद हो गई जब उन्होंनें जन लोकपाल के स्थान पर 19 मंत्रियों को भ्रष्ट बता कर उनके विरुद्ध एस.आई.टी. गठित कर  कार्यवाही करने की बात प्रमुखता से उठादी। और अनशन स्थल मूल रुप से कांग्रेस विरोधी  मंच बन कर रह गया।

यही वो भूल थी जिसने इस आन्दोलन को स्तरीय आन्दोलन में तब्दील कर दिया। एक ओर तो आन्दोलन में  प्रत्यक्ष जन समर्थन का अभाव रहा दूसरी ओर बाबा रामदेव प्रायोजित भीड के आधार पर यह संदेश दे गये कि, उनके आन्दोलन को अन्ना से ज्यादा जन समर्थन प्राप्त है। जबकि, वास्तविकता यह है कि, जिस दिन से अन्ना अनशन पर बैठे उनको भारी  प्र्रत्यक्ष जन समर्थन मिलना शुरू हो गया, क्योंकि अन्ना जन आकांक्षा के प्रतीक है। अन्ना ने जब भी कोई बात कही बडी ही गंभीरता से कही। जिसका जन मानस पर प्रभाव हुआ। यह एक कडवी सच्चाई भी है कि, टीम अन्ना के सदस्यो ने विशेष रुप से अरविंद केजरीवाल ने  अनशन स्थल को राजनैतिक मंच बनाने में कोई कसर नहीं छोडी। इसीलिये अरविंद केजरीवाल या मनीष सिसोदिया जन भावना को जाग्रत नहीं कर पाये। इसीलिये उनके अनशन के दौरान लोग अनशन स्थल तक नहीं आयें। इन सबसे चतुर रहे डा. कुमार विश्वास जो हमेशा माईक थामे रहे लेकिन अनशन पर नहीं बैठे। केवल अपनी नोटंकी बाजी करते रहे।

अन्ना टीम के सभी सदस्य केवल मंच साधने की जुगाड में रहने लगे थे और इन सबसे अन्ना बेचारे अलग थलग पडने लगे थे। केजरीवाल का व्यवहार तो एसा हो रहा था गोया वो सरकार उनकी जर खरीद गुलाम हो। लगभग यही हाल किरण बेदी का था। वो समय समय पर अपना आपा खोती रही थी।

एक एसा आन्दोलन जिसने जय प्रकाश नारायण के बाद पहिली बार देश के जन मानस को झंकझोरा था , जिसमें देश का युवा सबसे अधिक जुडा था वो भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये हर लडाई लडनें के लिये निकल आया था उसका एसा दुःखद अंत होगा किसी को कल्पना भी नहीं थी। ये सब अतिमहत्वाकांशा की परिणिती थी। टीम अन्ना की यह सबसे बडी एतिहासिक भूल थी जब केन्द्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर टीम अन्ना को वैधानिक मान्यता दी। एव उसके साथ समय समय पर अनेक बैठके की। टीम अन्ना को यह मालूम होना चाहिये था कि, किसी भी आन्दोलन में  एक बार में ही सब कुछ नहीं मिल जाता लेकिन वे अपने जन लोकपाल के अतिरिक्त और कुछ मंजूर करना ही नहीं चाहते थे। ये जन समर्थन का जोश था या गर्वमिश्रित नादानी। वो एक एसा लोकपाल चाहते थे जिसके अन्र्तगत सी. बी.आई. हो, सी.वी.सी. हो, प्रधानमंत्री, मंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी हों। वो जाॅच करता और न्यायालय को भेजता। ऐसे में न्यायालयों की क्या औचित्यता रह जाती। अर्थात् क्या उसकी शक्तियां राष्ट्रपति के समतुल्य होती? क्या इससे निचले स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लग पाता।

आजकल सरकारी कार्यालयों में एक जुमला बहुतायत से कहा जाता है कि‘‘  खून में सी.एच. यानि कि, ‘‘करप्शन हीमोग्लोबिन ’’ की बहुत जरुरत है। और इस सी.जी. की रामबाण दवा केवल गाँधी जी में ही निहित है। जिसको अपना कोई काम करवाना हो उसे गाँधी जी का सहारा लेना ही पडता है। जिस देश में भ्रष्टाचार राष्ट्रीय चरित्र के समतुल्य होता जा रहा हो वहाँ क्या अकेले अन्ना ओैर उनकी टीम यह काम कर सकती थी? शायद नहीं क्योंकि, इसमें जन समर्थन ओैर जन सहयोग आव’यक था। जो अन्ना को प्राप्त था सही अन्ना की सफलता थी। लेकिन टीम अन्ना इसका उपयोग करने में सफल नहीं हो सकी। और यह आन्दोलन अहं के टकराव का पर्याय बन कर रह गया।

अन्ना की सफलता को राजनीतिक बिरादरी पचा नहीं पा रही थी। और मौका ढूंढ़ रही थी। कि, किस तरह इस आन्दोलन को कमजोर कर दिया जाय? संसद में सरकार के बिल को एक लंबी बहस के बाद व्यापक संशोधनों के साथ पारित किया जा सकता था। लेकिन बिना राजनैतिक इच्छाशक्ति के यह बिल जानबूझ कर उलझा दिया गया।

अन्ना को जो जन समर्थन मिला वो केवल इसलिये कि, देश भ्रष्टाचार के दंश से आहत है। और वास्तव में इससे छुटकारा पाना चाहता है। लेकिन राजनीतिक बिरादरी या भ्रष्टाचार से  लााभान्वित लोगों में इसका विरोध शुरू हो गया। आज सबसे ज्यादा खुश यही बिरादरी है क्योंकि यही बिरादरी आम जन का भ्रष्टाचार के माध्यम से शोषण कर रही है। यही देश का दुर्भाग्य है कि, अभी फिलहाल उनको अभयदान मिल गया लगता है।
अन्ना के इस कदम को राजनैतिक बिरादरी चाहे अपनी विजय के रुप में देखे या टीम अन्ना की हार के रुप में । लेकिन यह बात बिल्कुल सत्य है कि, एक पवित्र आन्दोलन जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध था जिसे अपार जन समर्थन प्राप्त था भ्रष्टाचार रुपी कब्र में दफन कर दिया गया है।

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