हिंदी की दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार।

हिंदी भारत की राजभाषा है। राजभाषा किसी भी संघ या राज्य द्वारा अपने सरकारी कामकाज के लिए स्वीकार की गई भाषा होती है। राजभाषा देश के अधिकांश लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है राजभाषा किसी प्रदेश में एक से अधिक भी हो सकती है प्रांतीय भाषाओं के आधार पर भारत में हिंदी के अतिरिक्त 21 भाषाओं को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया है।

हिंदी भाषा को बोलने वाले भारत में ही नहीं पूरे विश्व में सबसे अधिक हैं परंतु जिस हिंदी को कभी सर्वश्रेष्ठ भाषा का दर्जा प्राप्त था आज उस की ऐसी दुर्दशा जिसे लोग बोलते समय भी शर्म का अनुभव करते हैं अंग्रेजी बोलने वालों को क्लासी और हिंदी बोलने वालों को दोयम समझा जाता है। हिंदी की दुर्दशा का आकलन तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंग्लिश मीडियम स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने के लिए सरकार को प्रयास करने पड़ रहे हैं जिससे कि हिंदी का अस्तित्व बचा रहे।

हमारे समाज में इंग्लिश का खुमार लोगों पर इस कदर हावी है कि जब बच्चा बोलना सीखता है तो हम उसे पंखा बोलना नहीं सिखाते फैन बोलना सिखाते हैं बिल्ली को केट और घर में प्रयोग होने वाले सामान का नाम इंग्लिश में सिखाते हैं बच्चा जब “व्हाट इज योर नेम” का जवाब इंग्लिश में देता है तो उसमें हम अपनी बड़ी शान समझते हैं 10 लोगों के सामने बच्चे से बुलाते हैं यह दिखाने के लिए कि बच्चा इंग्लिश बोलना सीख रहा है। मैं यह नहीं कहती कि अन्य भाषाओं का ज्ञान बच्चे को नहीं होना चाहिए परंतु क्या अपनी राजभाषा के अस्तित्व को खत्म करके विदेशी भाषा को सिर चढ़ा लेना चाहिए? मैं पूछती हूं ऐसे कितने लोग हैं जो बच्चे को इंग्लिश में जब फैन बोलना सिखाते हैं तो उसका मतलब हिंदी में भी बताते हैं कितने लोग “व्हाट इस योर नेम” का मतलब हिंदी में बताते हैं जब बच्चा शुरू से पंखे को देखकर फैन कहना सीखेगा तो पंखा क्या होता है वह कैसे जानेगा।

14 सितंबर के दिन हिंदी दिवस मनाया जाता है अपनी राजभाषा के लिए एक दिन निश्चित करना उसके खत्म होते अस्तित्व की ओर संकेत नहीं है तो क्या है आप एक दिन हिंदी बोल कर हिंदी को कितने दिनों तक जिंदा रह कर रख पाएंगे। हिंदी की हो रही इस दुर्दशा के लिए कोई और नहीं हम सब जिम्मेदार है राजनीतिक पार्टियों के बड़े बड़े नेता इंग्लिश में भाषण देना अपनी शान समझते हैं चाहे वह आम जनता को समझ में आये या नहीं। भाजपा के लिए हम यह कह सकते हैं कि भाजपा के नेताओं ने कहीं ना कहीं अपने भाषणों में हिंदी को जिंदा रखा है अटल बिहारी बाजपेई को जब हिंदी में भाषण देते हुए सुनते थे तो लगता था कि हम हिंदी भाषी राष्ट्र की जनता है और आज वही काम वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं तो उनको सुनना अच्छा लगता है आम जनता भी उन्हें सुन और समझ पाती है। आज भी भारत की 70 फ़ीसदी जनता गांव में निवास करती है जो या तो हिंदी बोलती या समझती है या प्रांतीय भाषा। आम जनता के दिल में उतरने के लिए किसी विदेशी भाषा भाषा में बोलने की नहीं राज भाषा में बोलने की जरूरत है।

भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है परंतु हिंदी मीडियम शिक्षा इंग्लिश मीडियम शिक्षा के सामने अपना अस्तित्व भी नहीं बचा पा रही है सिविल सर्विसेज के पिछले आंकड़ों को उठाकर देखा जाए तो गिने चुने हिंदी मीडियम छात्र होते हैं जो मेरिट लिस्ट में अपनी जगह बना पाते हैं और वही आंकड़े हिंदी मीडियम छात्रों के लिए हीन भावना का कारण बन जाते हैं।

किसी प्रतियोगिता की तैयारी करने वाले छात्रों को जितनी अध्ययन सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध होती है हिंदी में मिल ही नहीं पाती अच्छी किताबें अधिकतर इंग्लिश में लिखी गई है और लिखी जा रही है हिंदी की तरफ कोई ध्यान ही नहीं देता नौकरी के अवसर हिंदी मीडियम वालों की अपेक्षा इंग्लिश मीडियम वाले छात्रों को अधिक मिलते हैं हिंदी से पढ़ें मां बाप जब अपने बच्चों के प्रश्नों का अंग्रेजी में जवाब नहीं दे पाते तो आत्मग्लानि उन्हें घेर लेती है बच्चों का इंग्लिश मीडियम में एडमिशन कराना मां बाप की मजबूरी हो गई है क्योंकि भारत में सरकारी प्राइमरी स्कूलों की जो हालत है उसमें कोई मां बाप अपने बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहता इंग्लिश भाषा में बढ़ते नौकरी की संभावनाओं ने मां बाप को भी मजबूर कर दिया है बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाने के लिए”। हिंदी मीडियम में कम होते नौकरी के अवसर और हिंदी की इस दुर्दशा के लिए हम सब जिम्मेदार है यह मत भूलिए कि किसी देश की मातृभाषा ना केवल अभिव्यक्ति का माध्यम होती है बल्कि पूरे देश को एक सूत्र में बांधें रखती है।

“”हिंदी पहचान है हिंदुस्तान की””। हिंदी की दुर्दशा इसी तरह से होती रही तो एक दिन देश की एकता और अखंडता किसी कोने में पड़ी होगी और लोग विदेशी भाषा की गुलामी की जंजीरों में जकड़े होंगे।

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