इसी गंदगी का करना है अंत

लो आ गया नया ज़माना, 
स्वच्छ भारत  बन गया है एक बहाना।

क्या भारत की स्वच्छता का इरादा ,
टूट रहा है यह स्वच्छ भारत का वादा।

सैलानी  हैं  आते यहाँ, 
दिखती है गंदगी देखें जहाँ ।

क्या  वैष्णो देवी की पवित्र पहाड़ियां,
लिपटी  जो रहतीं  हैं,  बर्फीली  साड़ियां ।

एवं  मनुष्य  की अपवित्रता  का साथ,
दया करो हम पर तो भैरवनाथ ।

इसी गंदगी का करना है अंत,
तभी काम करेंगी भक्ति और मेलों में प्रभु या संत ।

कविता
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