जलियाँवाला बाग: जहाॅ निशस्त्र ,निरपराध और अरक्षितों पर गोलियाॅ चलाई गईं

स्वतंत्रता से उद्ंदडता की ओर बढ रहे समाज को यह स्मरण कराना आवश्यक है कि, किस तरह जलियाॅवाला बाग के कूृरतम नर संहार के बाद ही हमें स्वतंत्रता मिली है।
विश्वयुद्ध में मदद माॅगते समय यह कहा गया था कि, यदि भारत हमारी सहायता करेगा तो उसे स्वराज दिये जाने पर विचार किया जायेगा। लेकिन उसके बाद भारतीयों पर दमन चक्र का वेग कई गुना बढा दिया गया। जलियाॅवाला बाग का नर संहार वीभत्स नर संहार था।

युद्ध काल में पंजाब के भतपूर्व गर्वनर जनरल माईकल ओडायर ने बछी ही बेरहमी से सेना के लिये भारतीयों को जबरदस्ती भर्ती किया। दमन चक्र का सिलसिला यहीं नहीं रुका। अग्रेज भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को कुचनले के लिये एक ‘ रोलट बिल’ लेकर आये जिसका उद्येेश्य ऐसे आन्दोलनों को निर्ममतापूर्वक कुचलना था। जिसका पूरे भारत में पुरजोर विरोध होने लगा। महात्मा गाॅधी ने भी सत्याग्रह आन्दोलन की घोषणा की। पूरे देश में इस बिल के विरुद्ध जबरदस्त जन आक्रोष फेल गया।जिसे अंग्रेज पचा नहीं पाये। 6 अप्रेल 1919 को देश में हडताल का आयोजन किया गया जिसका उद्येश्य इस बिल के विरुद्ध जन मानस तैयार करना था।

9 अप्रेल को श्रीरामभजदत्त चैधरी,गोकुलचंद नारंग,धरमदास सूरी और लाला दूनीचन्द आदि क्रांतिकारियों ने ओजस्वी व्याख्यान दिये। इससे घबराकर अ्रग्रेज सरकार ने 10 अप्रेल को गाॅधी जी के पंजाब प्रवेश पर रोक लगादी तथा डा. सत्यपाल और डाकृकिचलू को देश निकाले का दण्ड दिया गया। माईकल ओडायर ने रायजादा हंसराज को बुलाकर जालंधर की हडताल के बारे में जानकारी ली। हंसराज जी ने बताया कि, हडताल सफल रही और कोई हिंसा भी नहीं हुई। रायजादाजी ने बताया कि,इसका एकमात्र कारण एसा महात्मा गाॅधी के आत्मबल के कारण संभव हो सका। जनरल ओडायर ने कहाकि, याद रखिये कि, उनके आत्मबल से भी बढकर कोई शक्ति है।

13 अप्रेल को जनरल ओडायर ने अमृतसर नगर प्रवेश किया और किसी भी प्रकार के जुलूस हडताल को प्रतिबंधित कर दिया। बाबजूद इसके जलियाॅवाला बाग में एक विराट जन सभा हुई जिसमें 20 हजार लोग सम्मिलित हुये जिसमें अबोध बालक ओर महिलाएं भी थीं। ठीक उसी समय जनरल ओडायर अपने सैनिकों के साथ वहाॅ आ पहुॅचा तथा अपने 25 सैनिकों को दायें और 25 सेनिकों को बायें खडा कर बिना किसी पूर्व सूचना के गोली चलाने का आदेश दे दिया। जिसमें 1650 गोलियाॅ दागी गईं। जनरल ओडायर और अंग्रेज सरकार कीे बेशर्मी देख्सिये कि, उन्होने इसकी स्वीकारोक्ति बडे ही गर्वीले अंदाज में की।

दंगें की जाॅच के लिये नियुक्त जाॅच आयोग के समक्ष जनरल ओडायर ने कहा कि,मैने वहाॅ पहुॅचते ही गोली चलाने का आदेश दे दिया। कमीशन ने पूछा कि क्या तुरंत ? क्या तुमने वहाॅ उपस्थित लोगों का तितर – बितर होने के लिये सावधान नहीं किया उसेने कहा कि, नहीं मैने पहिले ही इस पर विचार कर लिया था और अपना कर्तव्य सोचनें में मुझे 30 सेकेन्ड का समय लगा। मैं चाहता तो बिना गोलियाॅ चलाये भी भीड को तितर बितर कर सकता था। हमारे पास 1650 गोलियाॅ थी। जब वो खतम हो गई तभी गोलीबारी बंद की गई। घायलों को उठाने ओर उनकी सहायता करने का कोई प्रबंध नहीं किया गया क्योंकि , यह मेरा कर्तव्य नहीं था। जाॅच आयोग ने भी कुछ विशेष नहीं किया। उल्टे सरकार ने इण्डमिटी बिल के माध्यम से उन सभी अ्रग्रेज अफसरों को दोषमुक्त कर दिया।

इस कू्ररतम नर संहार के बाद अगले दिन जनरल ओडायर ने शहर के रहीसों,म्युनिसिपल कमिश्नरों,व्यापारियों आदि की कोतवाली में एक सभा बुलाई और कहा कि, आप लोग क्या चाहते है शांति या युद्ध यदि शाति चाहते है तो तुरंत दुकाने खुलवाईये नही ंतो बंदूक के दम पर दुकाने खुलवाई जाएंगी। 15 अप्रेल को सब दुकाने खुलगई लेकिन उसके बाद लोगों पर अत्याचार की पराकाष्टा को गइ। जिस गली में मिस शेरउड पर मारपीट हुई वहाॅ लोगो को कोडे लगाये गये ओर लोगों को पेट के बल रेंगने को मजबूर किया गया। इसके साथ-साथ देश के अनेक हिस्सों में भारतीयों पर अकथनीय अत्याचार किये गये।

इस पूरे घटनाक्रम को शहीद मंगल जाट की विधवा वृद्धा बताती है कि, जब पुरुष लोग काम पर गये तो महिलाओं को इकठा किया गया ओर सीमाहीन अपशब्दों का प्रयोग अैोर आचरण किया गया। जलियाॅवाला बाग नरसंहार ओर उसके बाद भारतीयों पर किया गया नरसंहार कूृरता की पराकाष्ठा थी।बाबजूद इसके भारतीयों ने जिस संघर्ष जीवटता एकता और साहस के साथ आजादी को हासिल किया वह अद्वितीय है।उन सभी शहीदों को शत्-शत् नमन।

जलियाँवाला बाग
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