राखी – उम्मीदों की बैसाखी

राखी – उम्मीदों की बैसाखी …

राखी,
स्नेह प्रेम की झांकी,
चाहे वैद्य या ख़ाकी,
चेहरे पे रौनक मां की ।

भाई बहन का पर्व,
इक दूजे पर गर्व,
मनाये हिन्द है सर्व,
पावन धरा व नभ ।

भाई लेता प्रण,
रक्षा हर क्षण,
बहन बसी हर कण,
एक जैसे मन ।

भाई की वो हिम्मत,
जैसे विशाल सा बरगद,
अनुराग प्रेम बेहद,
ना सीमा सरहद ।

एक दूजे की आस,
दोनों ही खास,
जैसे दिया प्रकाश,
धरती आकाश ।

पक्की ये डोर,
रिश्ते दे जोड़,
चाहे जो भी मोड़,
बंधन सर्वोच्च ।

माथे पे तिलक,
चंदन जाए सज,
चाहे अनुज या अग्रज,
दिल में जाए बस ।

सजाए राखी कलाई,
बहन जान भाई,
चाहे अक्षर ढाई,
कम नहीं बढ़ाई ।

होता मुँह मीठा,
ना कोई है ऐंठा,
निर्मल जैसे गीता,
ये त्योहार अनूठा ।

पूजा की थाली,
आरती है उतारी,
मोली है बाँधी,
उम्मीदें बाँधी ।

स्वरचित – अभिनव ✍🏻

कविता