कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो !

कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो ! …

कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो !
तुम मेरे नहीं, पर मेरे हो,
ज़रूरी नहीं कि बन्धन हों, फ़ेरे हों,
तन जुदा हैं, पर मन में तो ठहरे हो,
रूहें तृप्त जब रिश्ते गहरे हों ।

कविता