आपका ‘धर्म’ क्या है?

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आपका ‘धर्म’ क्या है?

‘धर्म’ मानव इतिहास के किसी भी कालखंड में सर्वाधिक चर्चित विषय रहा हैं | ‘धर्म’ को लेकर विभिन्न महामानवों ने अपने विचार रखें हैं, और उनके अनुयायी आज भी उस वैचारिक यात्रा में गतिशील हैं | मूलतः ‘धर्म’ शब्द का अभिप्राय एक जैविक इकाई के रूप में हमारे ‘कर्तव्यों’ से जुड़ा हैं, लेकिन जब भी वैश्विक समाज में धर्म के रूप में स्थापित हो चुकी कुछ सांगठनिक इकाइयों को अपने चिंतन में सम्मिलित करते हैं, स्पष्ट पता चलता हैं की ‘धर्म’ विचार और धारणाओं का एक मिश्रित स्वरूप हैं | अगर इस्लाम धर्म हजरत मुहम्मद साहब के वैचारिक चितन का प्रतिफल हैं, तो बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध के विचारों और मानव जीवन के प्रति उनकी धारणाओं का प्रतिबिम्ब हैं | इसी प्रकार ईसाई धर्म यीशु मशीह, और सिख धर्म गुरुनानक देव जी के चितन और स्थापित धारणाओं का ही परिणाम हैं| इन सभी महापुरुषों ने मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन किया, और चितन से जो विचार उतपन्न हुए, उसे अपने समर्थकों में बाँटने का काम किया | धीरे-धीरे उनकी वैचारिक यात्रा में अनुयायी बढ़ते गए, आगे चलकर अनुयायियों का यही समूह एक धार्मिक समूह के रूप में परिवर्तित हो गया |

ये तो हुई इस वैश्विक समाज में ‘धर्म’ के रूप में स्थापित हो चुके मानवीय संगठनों कि उत्पत्ति से जुडी मूल-अवधारणा | लेकिन एक जैविक इकाई के रूप में ‘धर्म हमारे लिए क्या हैं ? क्या यह सिर्फ एक आस्था और विश्वास का प्रश्न हैं, या हमारी जीवन यात्रा के साथ इसका कोई सीधा और प्रभावी सम्बन्ध भी हैं ? मुख्यतः हम युवाओं के लिए ‘धर्म’ एक तर्कहीन और तथ्यविहीन कल्पनाओं का स्वरूप मात्र हैं, लेकिन क्या हम इसे अपने वास्तविक जीवन के पहलुओं से जोड़कर ‘धर्म’ कि एक सरल, परिभाष्य, तार्किक और कल्पनाविहीन व्याख्या कर सकते हैं ? मुझे लगता हैं कि हमें ऐसा जरूर करना चाहिए | मुझे शक हैं कि, इन सभी प्रश्नों के साथ मैं सही न्याय कर पाउँगा…क्योंकि मेरा प्रयास आपके मस्तिष्क में धर्म कि एक और नई व्याख्या का रोपण नहीं हैं, अपितु आपको इस बात के लिए जगाना हैं कि, आपका/हमारा धर्म क्या हैं ? एक इंसान के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? एक पुरुष या स्त्री के रूप में हमारा धर्म क्या हैं? एक युवा के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? एक छात्र के रूप, एक शिक्षक के रूप में, एक अभिभावक के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? इन प्रश्नों के साथ ही मैं यह याद दिलाना चाहूंगा कि, धर्म ‘थोपने’ का विषय नहीं हैं | ‘धर्म’ अंधश्रद्धा और वैचारिक पंगुवाद का विषय भी नहीं है | आपका धर्म सिर्फ आपके लिए चिंतन का विषय हैं, क्योंकि हम सभी इस ब्रम्हांड में एक जैविक इकाई के रूप में अपने धर्म के बारे में चितन करने के लिए स्वतंत्र हैं |मैं एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ, जो कई कड़ियों में आपके समक्ष रखूँगा …आप अपनी टिपड़्ड़ीयों से हमें जरूर अवगत कराएं :-

जब भी हम ‘धर्म’ को वास्तविकता के धरातल पर परिभाषित करने का प्रयत्न करते हैं, ‘धर्म’ अत्यंत ही सरल एवं सहज विषय प्रतीत होने लगता हैं | ‘धर्म’ का सीधा और सरल अर्थ ‘कर्तव्य’ से हैं | एक इंसान के रूप में अपने कर्तव्यों के क्षेष्ठ निर्वाह के लिए किया जाने वाला ‘कर्म’ ही धर्म हैं | एक पिता के रूप में आपका धर्म हैं कि, अपने बच्चे का सर्वक्षेष्ठ पालन-पोषण करें, उन्हें उच्च कोटि कि शिक्षा ग्रहण करने का अवसर दें | वहीँ ‘पुत्र धर्म’ कहता हैं कि, आप अपने पिता के प्रति सम्मान रखें, उनके बुढ़ापे में किसी प्रकार कि दुख या पीड़ा का कारण न बने | इसी प्रकार मां के प्रति, अपने भाई के प्रति, दोस्तों-मित्रों और सगे- सबंधियों के प्रति आपकी कुछ जिम्मेदारियां हैं, यही जिम्मेदारियां विभिन्न मानवीय रिश्तों के प्रति हमारा ‘धर्म’ हैं | एक राजा के लिए प्रजा के प्रति कर्तव्य ही ‘राज धर्म’ हैं | इस तरह ‘धर्म’ को समझना और उससे खुद को जोड़ना, न सिर्फ धर्म को बेहद सहज बनाता हैं, यह हमारी जीवनयात्रा को आदर्श भी बनाता हैं |

अगर ‘भगवद गीता’ में कहा गया हैं कि, ‘कर्म ही पूजा हैं’ | हमें इस वाक्य कि विशुद्ध व्याख्या को समझना होगा | ‘कर्म’ अर्थात आपके कार्य | अपने उत्तरदायित्वों, अपनी जिम्मेदारियों के सर्वक्षेष्ठ निर्वाह के लिए किया जाने वाला परिश्रम ही …’पूजा’ हैं | सिर्फ इसी पूजा का फल भी आपको प्राप्त होता हैं |

अगर आप अपने पारिवारिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों के सर्वोत्तम निर्वाह के लिए १२ घंटे मेहनत-मजदूरी करते हैं, विश्वास कीजिये …आप १२ घंटे पूजा (कर्म) कर रहे हैं | मूल सन्देश यह हैं की आप अपनी जिम्मेदारियों का सर्वोत्तम निर्वाह सुनिश्चित करें, आपका धर्म सर्वथा सुरक्षित रहेगा |

इस प्रकार अगर हम अपने जीवन से जोड़कर धर्म और धार्मिक तत्वों की व्याख्या कर सकें ..काफी हद तक धर्म अपनी काल्पनिकता से वास्तविकता की तरफ प्रवेश करेगा | यहाँ एक बात और हमें समझनी होगी कि, धर्म अगर कर्तव्य हैं फिर हम कर्तव्यमूढ़ नहीं हो सकते हैं | सिर्फ इसलिए क्योंकि धर्म कुछ लोगों के लिए धंधा बन चूका हैं, हम धर्म का त्याग नहीं कर सकते हैं | हमें धर्म को नए नजरिये, नई सोच के साथ देखना होगा और उसे अपने जीवन में वास्तविकता के साथ उतारना होगा | हो सकता है सैकड़ों वर्ष पूर्व जो बातें कहीं-लिखी गयी हो, तब के समाज और जैव चिंतन के अनुसार सही भी हो | लेकिन आज भी हम उन्ही वर्षों पुरानी धारणाओं के साथ ‘धर्म’ को परिभाषित करते गए, विश्वास कीजिये ‘धर्म’ आने वाली पीढ़ी के लिए अबूझ और अछूत बन के रह जाएगा | अंग्रेजी माध्यम के साथ तैयार हो रही हमारी नई पीढ़ी ‘धर्म’ को समझ सके, इसके लिए धर्म का परिचय वास्तविकता के साथ कराना बेहद आवश्यक हैं |

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