कर्मठ बनो

कर्मठ बनो

भूलना भूल जाओ सूली पर झूल जाओ,
दिन देखो ना रात अभी आंखों में तुम खून लाओ,
हरा भरा होगा सब जीवन बीज तुम्हारे अंदर है,
चेहरा और चमन चमकेगा एक बार बस खिल जाओ।

संघर्ष करो दृणता लाओ अपना घर आंगन महकाओ,
जैसे रस्सी काटे पत्थर ऐसे कर्मठ बन जाओ,
वक्त के दरिया पे तुम पत्ते जैसे रिल जाओ,
बस आंधी को छोड़ अभी तुम चट्टानों से मिल जाओ।

poemकविता