महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हो

प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं रही है। पुरुष सत्तात्मक समाज हमेशा से महिलाओं को केवल भोग विलास की वस्तु समझता आया है और महिलाओं को घर में चारदीवारी तक रखना ही अपना बड़प्पन समझा जाता है। हालांकि लोगों में जागरुकता फैलाने की कोशिश लगातार होती रही है सोशल […]

कुछ कहने को तो है मेरे पास भी…

कुछ कहने को तो है मेरे पास भी… कुछ कहने को तो है मेरे पास भी… पर कोई सुनने वाला नहीं मिला… सोचे शायद कोई अजनबी ही हाले दिल सुन लेग लहरों का शोर इतना बढ़ गया… की खामोशियों से नाता टूटता चला गया… किसी के साथ ऑडी में पेट्रोल भरवाया… किसी का ऑटो फ़ेयॅर […]

नोटबंदी के बाद से अब विद्वानों को धनीजनों से किनारा कर लेना चाहिए

नोटबंदी के बाद से अब विद्वानों को धनीजनों से किनारा कर लेना चाहिए  विद्वान जन जो बहुत ही पढाई-लिखाई में बहुत ही तेज-तरार हुआ करते थे। वे 1950 से लेकर 1992 तक किसी धनीजन के साथ नहीं उठा-बैठा किया करते थे। तब समाजवाद था, समाजवाद में हर इंसान दूसरे इंसान की तरह ही जीना […]

|| प्रेमी की भक्ति – यक्ष प्रश्नोत्तर।।

|| प्रेमी की भक्ति – यक्ष प्रश्नोत्तर।। भगवान् में गहरी आस्था रखने वाले एक भक्त को प्यार हो जाता है और अपनी प्रेमिका के प्रेम में भाव विह्वल होने के कारण दुनियादारी से सुध-बुध खो देता है । दिन रात उसके दिल-ओ-दिमाग में सिर्फ उसकी प्रेमिका ही छायी रहती है।  वो भगवान् से अपनी प्रेमिका […]

[कविता] मैंने बहुत याद किया – बृजेश यादव

एक प्रेमी युगल की काफी दिन के बाद बात हुई…तो प्रेमिका ने प्रेमी से पूछा क्या किया इतने दिन??? तो प्रेमी ने अपना हाल किस तरह वयां किया…पढ़िएे मित्रों…. उसने मुझसे पूछा कि क्या किया इतने दिन? मैंने कहा….. तेरी याद में सनम मैंने गिने दिन और गिनी रातें, हर घडी और हर पल गिने, […]

बजट २०१७ का अर्थव्यस्था पर असर

बजट २०१७ का अर्थव्यस्था पर असर वित्तीय वर्ष २०१७-२०१८ के लिए जब वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने बजट पेश किया तो सबसे ज़्यादा देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई की नज़र उन पर लगी थी | और बजट अभिभाषण के बाद यह कहा जा सकता है कि बजट आशावादी तो है लेकिन अपेक्षाओं से थोड़ा […]

बजट २०१७ उम्मीदों पर कितना खरा उतरा ?

बजट २०१७ उम्मीदों पर कितना खरा उतरा ? आज के राजनितिक परिवेश में सरकार का कोई भी निर्णय उम्मीदों के मापदंड पर केवल एक ही तरह से तौला जाता है कि आप किस दल के समर्थक हैं , यदि आप सत्ताधारी दल के समर्थक हैं तो बजट आपको बहुत बेहतर और ऐतिहासिक लगेगा और यदि […]

क्या और क्यों भारत में मुद्दे अंग्रेजी मीडिया ही तय करती है ?

भारत जैसे अद्भुत देश में मीडिया एक अहम किरदार निभाता है क्योंकि इस विशाल देश के हर कोने में हर क्षण कुछ न कुछ घटित होता है. चाहे कोई नई उपलब्धि हो या कोई राजनीतिक घटना , एक मीडिया ही है जो हमें उससे सम्बंधित जानकारी पहुंचाती है. इस अनोखे मीडिया जगत में भी बहुत […]

भारत में पत्रकारिता का गिरता स्तर

यह बात बिलकुल सत्य है कि एक पत्रकार और उसकी पत्रकारिता अपनी कठिन मेहनत से समाज में घटित हो रही घटना से हमें रूबरू करवाते है. माध्यम बेशक टलीविजन पर दिखाई जाने वाली खबरें हो या आपके हाथों में आने वाला रोज का अखबार और आज तो हमें ज्यादातर विश्वास इंटरनेट पर चलने वाली ख़बरों […]

चार पंक्तिया

हमने चार पंख्तियाँ क्या लिख दीं लोगों ने कवि बना दिया भरे बजार में हाले-दिल का तमाशा बना दिया घर से निकले तो थे कि तुझे भुला देंगे लिख लिख कर दिल से यादों को मिटा देंगे पर आशिकों के इस बाजार ने तेरी यादॊं को हि बाजारू बना दिया बस अब तो यही दुआ […]

बच्पन के दोस्त हुए पुराने

बच्पन के दोस्त हुए पुराने रोज सुबह झूलते हुए स्कूल बस में आंखे मलना दोस्तों के साथ मिलकर क्लास में हुल्लड़ करना शाम को गली क्रिकेट का सिलसिला हुआ अफ़साना बच्पन के दोस्त हुए पुराने…. ….और, E.M.I का चक्कर हुआ चालू A.C. आफ़िस में फ़ाईलों से लड़ना फ़िर बास कि डांट सुनकर बिवी के तानॊ […]

नोटबंदी से भारत की अर्थव्यवस्था पर असर

8 नवंबर २०१६ को भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने काला धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक अनोखा युद्ध आरंभ करते हुए ५०० और १००० के नोटों को पूरी तरह से रद्ध करने का फ़ैसला सुनाया था. नोटबंदी के इस फ़ैसले के लगभग ५० दिन बाद भी लोगों की तकलीफ़ों में कोई खासा […]

२००० का नोट – “धोखा”, “स्कैम” या “होशियारी”

२००० का नोट – “धोखा”, “स्कैम” या “होशियारी” सरकार ने जो विमुद्रीकरण का कड़ा कदम उठाया है उसकी चारो और प्रशंसा हो रही है । भारत ही नहीं विदेशो में भी इस पर चर्चा हो रही है । कई देश अब इस पर विचार कर रहे है की उन्हें भी इस तरह के कदम उठाने […]

रिलायंस डिफेंस राफाल डील – सच झूठ और प्रोपोगंडा

फ्रेडरिक नीत्शे ने एक बार कहा था “दुनिया में कुछ भी पूर्ण तथ्य नहीं है , केवल व्याख्याएं हैं”। जर्मन दार्शनिक और सांस्कृतिक आलोचक की यह बात वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एकदम सटीक बैठती है। आजकल अनंत जानकारी एक उंगली के इशारे पर उपलब्ध है और किसी बात को लोगो तक पहुँचना एक क्लिक के […]

धन्यवाद पाकिस्तान ! एक बुद्धिजीवी की कलम से

धन्यवाद पाकिस्तान । साधुवाद । मन कर रहा है तेरे आतंकियों के चरणों को छू लू जैसे की नरेंद्र मोदी ने नवाज़ शरीफ़ की माँ के छुए थे । तूने मुझ पर जो एहसान किया है उससे में जज्बाती हो गया हूँ । अगर फ़िल्मी अंदाज़ में कहूँ तो वह इस प्रकार होगा ” तेरी […]

मुझे मेरे १५ लाख़ दे दो मोदीजी

मुझे मेरे १५ लाख़ दे दो मोदीजी मैं बोखलाया हुआ व्यक्ति हुँ | २०१४ के चुनाव में मैं आपकी पार्टी के खिलाफ था । मैं आपके समर्थको का उपहास करता था । उन्हें भक्त कहकर खूब मजे लेता था । मैं बचपन से ही बुद्धिजीवियों को पढ़ता आया हूँ , सुनता आया हूँ, देखता आया […]

एक विस्मृत क्रांतिकारी शहीद ,उदमी राम

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहासलेखन पर्याप्त शोध, जानकारी की अल्पता की वजह से अनेक क्रांतिकारियों के बलिदान, शौर्य, औेर देशभक्ति को समावेशित नहीं कर पाया या यू कहें कि, उनके त्याग ओैर बलिदान को इतिहास के पन्नों पर पर्याप्त स्थान नहीं दे पाया। एसा ही एक उदाहरण वर्तमान हरियाणा राज्य के सोनीपतजिले के गाॅव लिबासपुर […]

जब भारतीय जनमानस आजादी के सूर्य की पहली किरण के इंतजार में था

जब भारतीय आजादी की इबादत लिखी जा चुकी और तक हों गया था कि, 14-15 अगस्त की आधी रात को भारत नये अध्याय की षुरुआत करेगा औेर एक स्वतंत्र राश्ट्र हो जायेगा तब जनमानस की उत्तेजना, खुषी, जोष,राश्ट्र के प्रति प्रेम, स्वतंत्र राश्ट्र में जीने की उत्सुकता अपने चरम पर थी। षाम से ही लेगों […]

हाॅकी खिलाडी मोहम्मद शाहिद का अवसान

एक बडे खिलाडी का छोटी उम्र में चले जाना एक बहुत बडा खिलाडी और एक बेहतर इंसान बहुत छोटी उम्र में 56 वर्ष में हमें छोडकर चला गया। लीवर की गंभीर बीमारी से ग्रसित शाहिद ने गुरुग्राम के वेदांता अस्पताल में अपने जीवन की आखिरी साॅस ली। 14 अप्रिल 1960 को वाराणसी में जन्में शाहिद […]

निधनः- साहित्यकार महाश्वेता देवी

निधनः- साहित्यकार महाश्वेता देवी

‘‘ खामोश हो गई शोशितो, दलितों औेर आदिवासियों की आवाज’’

बंगला साहित्यकार महाष्वेता देवी अब हमारे बीच में नहीं रही। कलकत्ता के अस्पताल में उन्होने अपने जीवन की अंतिम साॅस ली। इसी के साथ षोशितों, आदिवासियों और दलितों की आवाज खामोष हो गई। उन्होंने अपने लेखन में हमेषा दलितों और षोशितोंकी पीडा उन पर हो रहे अत्याचार को प्रखर आवाज दी।