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देश

ख़ुद को दिया धोखा …

ख़ुद को दिया धोखा … इस गणतंत्र दिवस,किसान वाकई बेबस ?लिया देश को डस,रहा विश्व है हँस ! शर्मसार हुई दिल्ली,उड़ी बहुत है खिल्ली,क्या यही आज़ादी ?की बहुत बर्बादी । तिरंगे की मर्यादा,सीना छलनी, है काटा,देश टुकड़ों में बांटा,नम आज विधाता ।

टीस … देशभक्तों को सलाम

टीस … देशभक्तों को सलाम एक मगर कुछ शिकवा है,मेरा जाने किसका है,हर पल ये कुछ रिसता है… या फ़िर बोलूं टीस है,ना चाहत ना रीस है,तंग कर रही कोई चीज़ है… ज़हन में चल रही उलझन है,सोच बहुत ही गहन है,भटक रहा अब ये मन है… अंदर कुछ

आज़ादी की आपबीती

आज़ादी की आपबीती 'आज़ादी' अब ७३ की हो गई,अपनों की राह तकते हुए थककर सो गई,माना थोड़ी सी बेचारी बूढ़ी हो गई,अभी तो मिली थी, कहीं फ़िर तो नहीं खो गई ! 4 अपनी किस्मत को कोस रही थी,मन को अपने मसोस रही थी,ख़ुद को ख़ुद में खोज रही थी,दिल पे रक्खे
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