प्यार की बात

प्यार की बात बस एक बार तुम्हारे करीब आकर।तुम्हारी नज़रों से ये नजरें मिलाकर। तुम्हारे चाँद से चेहरे का दीदार कर।तुम्हारी रेशमी जुल्फों को सवांर कर। तुम्हारे हाथों को अपने हाथ में लेकर।हर दिन तुमको अपने साथ में लेकर। तुम्हारे साथ

इश्क़ का इज़हार

इश्क़ का इज़हार बहुत ही आसान है किसी को दिल से प्यार करना।लेकिन आसान नहीं होता इश्क़ का इज़हार करना। अब देख लो हम भी तुमसे बातें तो हजार करते हैं।लेकिन कहने से डरते हैं, कि तुमसे प्यार करते हैं। अगर ये समाज प्यार करने वालों को ताने न

संतुष्टि …अंतर्मन की पुष्टि …

संतुष्टि …अंतर्मन की पुष्टि … लिखते लिखते ऊब गया हूँ,ना जाने क्यूँ यूं डूब गया ?चलते चलते रुक गया हूँ,अपने आप ही झुक गया हूँ । लिखने से क्या होगा हासिल,क्या जाएगी मंज़िल मिल ?आए सवाल ये रात और दिन,क्या होगा सपना मुमकिन ? व्हाट्स ऐप

समय चक्र की मार

समय चक्र की मार वर्तमान में हो गया, बुरा सभी का हाल।समय चक्र की मार से, हुए सभी बेहाल।। दर-दर थे भटके सभी, मित्रों पिछले साल।समय चक्र की मार से, हुए सभी बेहाल।। विपदा का फिर आ गया, पुनः सामने काल।समय चक्र की मार से, हुए सभी

ज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलो

ज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलोसफर को हमसफर बनाते‌ चलो ।हर ग़म से भी बे'ग़म होते चलोज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलो ।। है ग़ुलिस्तां गुल ये,कह रहे हैं सभीमांगने से ना मिलेगी फिर ज़िंदगी ।तन्हाई को मुस्कुराकर सहते चलोज़िन्दगी‌ का गीत

वो बात नहीं रही

लगता तेरे जहां मे इंसानों की कदर नहीं रहीतभी तो इंसान को इंसानों से चाहत‌ नहीं रही ।। लगता‌ है जा रहे हैं सुनहरे पल इस ज़माने केतभी तो एक- दूसरे घर में वो बैठक नहीं रही ।। लगता है बीत रहा है मेहमानों वाला दौर भीतभी तो स्वागत करने वाली

‘काश’ बनाम ‘आ-काश”

'काश' बनाम 'आ-काश" काश मेरी कोई बहन ही होती !साथ में हँसती, साथ में रोती । काश मेरा कोई भाई होता !राज़दार चाहे बड़ा या छोटा । काश मेरे भी रिश्ते होते !मेरे साथ फ़िर फ़रिश्ते होते । काश मेरे भी दोस्त होते !आपस में रोज़ न्योते होते ।

तेरे शहर की हवाओं का रूख देखा है हमने

तेरे शहर की हवाओं का रूख देखा है हमनेहर गली-मौहल्ले की दिवारों को सुना है हमने ।। कह रही‌ दर्द-ए-दास्तां हर जुर्म‌ की वो दिवारेंमा-बाप को घर से निकालते देखा है हमने ।। घर से निकाला !‌खैर ,कोई बात की बात नहींबेजुबान पक्षियों को भी नही

माँ – कविता (प्रभात पाण्डेय)

माँ के जीवन की सब साँसे बच्चों के ही हित होती हैं चोट लगे जब बालक के तन को आँखें तो माँ की रोती हैं ख़ुशी में हमारी ,वो खुश हो जाती है दुःख में हमारे ,वो आंसू बहाती है निभाएं न निभाएं हम अपना वो फ़र्ज़ निभाती है ऐसे

एक उसके लिए मैने कितनों से मुँह मोड़ा है

एक उसके लिए मैने कितनों से मुँह मोड़ा है,पर परवाह कहाँ इस मतलबी ज़माने मे उसे हमारी,उसने तो एक असली शायर से मुँह मोड़ा है।पहचान कर भी नज़र अंदाज कर उसने मेरा दिल चूर–चूर कर तोड़ा है,अहंकार नही है मुझमे, कोशिश पूरी थी मेरी।अगर अब की बार भी

रोहित सरदाना – अश्रुपूर्ण भावभीनी श्रद्धांजलि अभिनव

रोहित सरदाना,शख़्स जाना माना,कहीं चला गया,पता नहीं कहां ! था बड़ा सटीक,छवि बेहद निर्भीक,देता था सीख,ना दहाड़, ना चीख़ । देखे सुने बिन,ना कहता था,जो कहता था,रस बहता था । स्पष्ट वक्ता था,सब परखता था,जब हँसता था,बड़ा जचता था । गज़ब था

जीवन को दिशा नई दें

|| जीवन को दिशा नई दें || जीवन को जो सहज बनातीसृष्टि की अनुपम काया, मन को सहर्ष गति फिर देतीप्रकृति की अविरल छाया |जगत का सारा भार लिए दाय जैसे कोई निभा रहे, वायु, वृक्ष, ये धरा हमारी बिगुल हैं जैसे बजा रहे |पंछी

कोरोना त्रासदी (अपनों को खोने का गम )

कोरोना त्रासदी (अपनों को खोने का गम )अंधेरे में डूबा है यादों का गुलशनकहीं टूट जाता है जैसे कोई दर्पणकई दर्द सीने में अब जग रहे हैंहमारे अपने ,हमसे बिछड़ रहे हैंन जाने ये कैसी हवा बह रही हैज़िन्दगी भी थोड़ी सहम सी गई हैहवाओं में आजकल ,कुछ

रोज रोज मिलना जरूरी है क्या ??

रोज रोज मिलना जरूरी है क्या ?? ये जो तुम रोज रोज नए कपड़े पहन कर आती हो,हर बार मुझे ही तारीफ करना जरूरी है क्या ?जब कभी अगर तारीफ ना करूं तो तुम रूठ जाती हो,हर बार मुझे ही मनाना जरूरी है क्या ?रोज रोज मिलना जरूरी है क्या ? यूं तू जब

मजदूरों की कहानी।।

एक मजदूर की ज़िन्दगी, कुछ शब्दों में सुनानी है। ध्यान से पढ़ना, ये एक मजदूर की सच्ची कहानी है। किसी गाँव, किसी बस्ती में, एक छोटा सा मकान। एक टूटी सी चारपाई, जमीं पर रखा कुछ सामान।

मेरी गलतियों के कारण मैंने उसको खो लिया।

मेरी गलतियों के कारण मैंने उसको खो लिया। हम दोनों के दरमियान बेपनाह प्यार था।दोनों को एक दूजे पर बहुत एतबार था।हर रोज लड़ते थे हम एक दूजे से बहुत।लेकिन एक दूजे का साथ स्वीकार था। एक दूजे को देखे बिना रह नहीं सकते थे।दोनों एक पल की

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 4

बिन मतलब,गर तेरी तलब,मानो मिल गया रब,मिल गया रब । अभिनव कुमार आँखों से बात,कुछ अलग ही बात,तारों की रात,अनकहे जज़्बात ।अभिनव कुमार दोस्ती मैं सच्ची निभा ना सका,दिल में तुम्हारे जगह पा ना सका,झूठ ना कहके भी झूठा कहलाया,ग़लती थी बस यही

विश्व पुस्तक दिवस – संदीप कुमार

आज विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर कुछ पंक्तियां पेश हैं, गौर फरमाएं। आज बहुत याद आती हैं, वो पुरानी किताबें मेरी।उनसे ही सीखा था हर पल, कहना मैं बातें मेरी। जिनको पढ़कर कहीं खो जाता था मैं।सीने में रख किताबों को सो जाता था मैं।वो कुछ
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