शायर की कलम

शायर की कलम हकीकत निकलती है मेरी कलम सेसियासत के आगे भी ये झुक नहीं सकती !लाइसेंसी बंदूके छीन ली जाती है यहाँमगर ग़ैर लाइसेंसी कलमें रूक नहीं सकती !! ए-हुक्मरानों कैद करलो चाहे इस शायर कोमग़र हकीकत छिप नहीं सकती शायरी में !हर शब्द

मैं उसके घर गया था

मैं उसके घर गया थाअपने किसी काम सेउसके शौहर से मिलावो भी वाकिफ़ था मेरे नाम सेपूछ बैठा कौन थी वोजिसका दिया दर्द लिखते होइतने में अंदर से आ गई वोऔर टाल दी बात कहकर'मिर्ज़या' चाय लोगे या कॉफी ?वाकिफ़ नहीं थी शायद किउसके जाने के बाद चाय से

ज़रा तुम इंसान को तो इंसान मान लो !!

बाजार में सब देखते रहे नजाराकिसी ने नहीं देखी बच्चे की तरसती नज़र !अरे इंसान नहीं पत्थर है इस शहर मेंकिसी के मरने से भी होता नहीं असर !! इंसान कुत्ता को महंगा खाना खिला रहाएक मासूम बच्चा तरस रहा रोटी को !खुद को भूखा रहने की परवाह नहीं

“नाज़” – कविता

हुजूर ज़रा बचना ये इश्क़ बीमारी लाइलाज़ है टूटा हुआ शख़्स लिखता है ये उसका अंदाज़ है !! लब़ों पर रहती होगी मुस्कान हमेशा दिखावे की कभी गौर से सुनना उनकी दर्द भरी आवाज़ है !! टल जाती है दुआ और दवा बेअसर इस मर्ज़ की इश्क़ में
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