रिलायंस डिफेंस राफाल डील – सच झूठ और प्रोपोगंडा

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फ्रेडरिक नीत्शे ने एक बार कहा था “दुनिया में कुछ भी पूर्ण तथ्य नहीं है , केवल व्याख्याएं हैं”।

जर्मन दार्शनिक और सांस्कृतिक आलोचक की यह बात वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एकदम सटीक बैठती है। आजकल अनंत जानकारी एक उंगली के इशारे पर उपलब्ध है और किसी बात को लोगो तक पहुँचना एक क्लिक के जरिये हो जाता है| इसके फायदे तो है पर उपलब्ध जानकारी से कुछ तथ्यों को निकाल कर परोसना काफी आसान हो गया है । कहीं पर भी और कभी भी किसी के भी द्वारा की गई कोई बात को काफी आसानी से “पकाया” जा सकता है फिर उसे एक साजिश या एक कहानी या एक नए तथ्य के रूप में पेश किया जा सकता है ।

मैं रिलायंस डिफेंस-राफेल सौदा की पकाई हुई इस खिचड़ी को अपने बर्तन में फिर से तड़का लगाने की कोशिश करता हूँ । जैसे ही रिलायंस डिफेंस और राफेल के बीच एक समझौते की खबर बहार आई, कई विरोधी – भ्रष्टाचार विरोधी हरिश्चन्द, गैर सरकारी संगठन के महानुभाव, “असहिष्णु भारत” के नारे लगाने वाले, पुरस्कार वापसी ब्रिगेड, काली टीवी स्क्रीन के समर्थकों मोदी सरकार को अंबानी का एजेंट बताने पर तूल गए है ।

यह लोग इस डील के नाम पर अपनी अपनी व्याख्याएं आंकड़ों के साथ बाहर ला रहे है ।

लेकिन मैं इवान एसर के आंकड़ो के बारे में दिए गए वक्तव्य में विश्वास करता हूँ – “सांख्यिकी (आंकड़ो ) की परिभाषा: विश्वसनीय आंकड़े से अविश्वसनीय तथ्यों के उत्पादन का विज्ञान” |

अमेरिकी व्यंगकार इवान एसर के ऊपर दिए हुए ज्ञान को शायद हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवियों ने उत्कृष्ट तरीके से काम में लिया है या शायद उन्हें यह कला पहले से ही भली भांति आती थी ।

इस बात में कोई दो राय नहीं है की देश का एक बुद्धिजीवी वर्ग सरकार (मोदी ज़्यादा उचित शब्द है) के खिलाफ है और पिछली सरकार के करीब था । अब आंकड़ो के खेल से वह किस तरह अपना मोदी विरोधी प्रचार प्रसार कर रहा है इसे समझते है ।

हम शुरुआत करते है प्रशांत भूषण के द्वारा इस सौदे पर किते गए ट्वीट और मेरे जवाब से ।

क्या एक झूठ !! व्यापार निर्देशिका रिलायंस रक्षा पिपावाव (Estd 1997) खरीदा है। व्यापार निर्देशिका अधिग्रहण इसकी तकनीकी रूप से 19 वर्ष @ pbhushan1 <एक href = “https: / /twitter.com/_YogendraYadav”>@_YogendraYadav pic.twitter.com/gAvY3sxtYN & mdash; अंकुर (@AnkurTheGame) अक्टूबर 3, 2016 और अधिक पढ़ें
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भूषण का कहना है कि मोदी सरकार ने केवल एक साल पुरानी कंपनी रिलायंस डिफेंस को इतना बड़ा प्रोजेक्ट दे दिया ।

भले ही आपस में कितनी भी असहमति हो पर मोदी विरोधी ट्वीट होने पर इसका समर्थन केजरीवाल से ले कर योगेंद्र यादव और बुद्धिजीवियों से ले कर पत्रकारों ने रिट्वीट के रूप में किया |

आइये कुछ तथ्यों पर भी नज़र डाले जिनके बारे में शायद आपने नहीं सुना होगा-

रिलायंस एडीएजी समूह ने पिपावाव शिपयार्ड लिमिटेड नामक कंपनी को खरीदा। अब इस कंपनी का नाम रिलायंस डिफेंस हो गया है । यहाँ गौर करने वाली बात यह है की रिलायंस एडीएजी समूह अनिल अम्बानी का है न की मुकेश अम्बानी का ।

पीपावाव शिपयार्ड लिमिटेड के बारे में कुछ तथ्य इस प्रकार हैं: –

पीपावाव गुजरात में एक गांव है। पीपावाव शिपयार्ड कंपनी 1997 में इस गांव में स्थापित की गयी थी |
धन जुटाने की कुछ प्रक्रियाओ के बाद, कंपनी को 2009 में सार्वजनिक किया गया और बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के साथ ही नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किया गया (एनएसई)
इस कंपनी का पुराना नाम पिपावाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड रह चूका है |
कंपनी रक्षा और अपतटीय जहाज निर्माण में है ।
पीपावाव शिपयार्ड पहली कॉर्पोरेट शिपयार्ड कंपनी है जिसे भारतीय नौसेना के लिए युद्धपोतों और अन्य जहाजों का निर्माण करने की मंजूरी दी गई थी ।

पीपावाव शिपयार्ड सेना में इस्तेमाल पानी के जहाजो के अलावा सेना के लिए हवाई जहाज बनाने के काम भी करना चाहती थी |
जापान की ShinMaywa इंडस्ट्रीज सक्रिय रूप से 1.6 अरब अमेरिकी विमान का डालर यूएस -2 उभयचर विमान परियोजना के रूप में जाना जाता परियोजना के लिए भारत में एक साथी की तलाश में गया था। पीपावाव शिपयार्ड एक स्पष्ट दावेदार माना जा रहा था।
पीपावाव शिपयार्ड की वार्षिक रिपोर्ट FY13-14 से पता चलता है की वह ‘भारत की पहली और एकमात्र समेकित रक्षा कंपनी” है
पीपावाव शिपयार्ड वाणिज्यिक जहाजों भी बनाता है और जहाज की मरम्मत और अपतटीय सेवाएं प्रदान करता है।

2015 में, पीपावाव शिपयार्ड को “naval frigate” आर्डर के लिए रूसी सरकार ने चुना था | यह प्रक्रिया भारत सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत हुई थी । 3 अरब अमरीकी डालर से अधिक मूल्य का यह प्रोजेक्ट निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी युद्धपोत निर्माण परियोजना है। पिपावाव शिपयार्ड का चुनाव रूस के उप उद्योग और व्यापार मंत्री अलेक्सई रखमानोव की एक टीम ने किया था |

ऊपर दिए गए आंकड़ों से यह समझने में देरी नहीं लगनी चाहिए की पिपावाव शिपयार्ड क्षशम है और कोई एक साल पुराणी कंपनी नहीं है। इस कंपनी को रिलायंस अनिल अम्बानी समूह ने अब खरीद लिया है एवं उसका नाम रिलायंस डिफेन्स कर दिया है । तो क्या इनते मात्र से इसकी क्षमता कम हो गयी हैं?
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क्या ऊपर दिए हुए बिन्दुओ से हम यह समझ ले की पिपावाव शिपिंग जो की अब रिलायंस डिफेंस हो गयी है एक सक्षम कप्म्पनी है जिसको इस तरह के प्रोजेक्ट्स दिए जा सकते है ?

क्या ऊपर दिए हुए बिन्दुओ से हम यह समझ ले की पिपावाव शिपिंग जो की अब रिलायंस डिफेंस हो गयी है एक सक्षम कप्म्पनी है जिसको इस तरह के प्रोजेक्ट्स दिए जा सकते है ?

अडानी या अम्बानी की कंपनी की कोई भी खबर आ रही है तो कुछ बुद्धिजीवी ट्विटर से ले कर व्हाट्सएप्प तक यह न्यूज़ के तर्ज़ पर साबित कर देते है की मोदी इनकी दलाली कर रहे है । इस तरह के मूर्खता पूर्ण और झूठे पोस्ट आपने पढ़ लिए होंगे अब तक । अडानी और अम्बानी नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनाने से पहले ही ” रंक से राजा ” बने हुए थे । उस समय किसकी सरकार थी? क्या वह सरकार भी इनकी एजेंट थी? बुद्धिजीवी वर्ग वाले इस बात को समझाए |

अडानी और अम्बानी के ३०-४० साल पुरानी सफलताओ पर बुद्धिजीविओ की चुप्पी देखते हे बनती है । कुछ दूसरे व्यापार घराने भी है देश में जिनको कोयले से ले कर दूर संचार और स्टील से ले कर आईटी तक किसी भी व्यापार को करने में दिक्कत नहीं आई । इनके लिए भी बुद्धिजीवी वर्ग जो मौन व्रत धारण कर के बैठा था उस से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन जरूर याद आते है ।

अडानी और अम्बानी के ३०-४० साल पुरानी सफलताओ पर बुद्धिजीविओ की चुप्पी देखते हे बनती है । कुछ दूसरे व्यापार घराने भी है देश में जिनको कोयले से ले कर दूर संचार और स्टील से ले कर आईटी तक किसी भी व्यापार को करने में दिक्कत नहीं आई । इनके लिए भी बुद्धिजीवी वर्ग जो मौन व्रत धारण कर के बैठा था उस से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन जरूर याद आते है । इन दूसरे व्यापारियों को संतो जैसा आदर दिया जाता रहा है ।

अगर बुद्धिजीवियों के हिसाब से मोदी अडानी अम्बानी के दलाल है तो उन्ही के तर्कों को इस्तेमाल कर के क्या मैं इन बुद्धिजीवियों को दूसरे व्यापार घरानों का दलाल कह सकता हूँ? और फिर इन्हें तर्कों के इस्तेमाल से उनकी प्रिय सरकार और नेताओ को भी?

बुद्धिजीविओ को एक बात समझ लेना चाहिए की व्यापार और चंदा अलग है । व्यापार चंदे से नहीं चलते । व्यापारी वर्ग जोखिम उठा कर व्यापार चालू करते है और अपनी मेहनत, सरकार की मदद (लोन और स्कीम ) की मदद से ऊपर उठते है । बैठे बैठे ऊँगली उठाने का काम बड़ा आसान है।
यह एक साधारण से बात है की बड़ी कंपनियों को बड़े प्रोजेक्ट उनके तजुर्बे के कारन मिलते है । डिफेंस जैसे प्रोजेक्ट क्या किसी भी कंपनी को दिए जा सकते है?

क्या मोदी सरकार को अडानी और अम्बानी को कोई भी प्रोजेक्ट या लोन देना नहीं चाहिए? तभी वे ईमानदार कहलायेंगे । कही ऐसा तो नहीं की दूसरे घरानों की दलाली के नाम पर अडानी अम्बानी का नाम बार बार लिया जा रहा है ? क्या ये सोचने वाली बात नहीं है?

अभी रिलायंस डिफेंस के हुए करार के लिए छाती पीटने वाले पत्रकार उस समय कहा थे जब यह करार या प्रोजेक्ट दूसरी कंपनी को मिले ?

भारत को M-777 होवित्‍जर तोपें बेचने के लिए अमेरिका की डिफेंस कंपनी BAE सिस्टम्स ने महिंद्रा को अपना पार्टनर बनाया था
भारत सरकार द्वारा प्राइवेट सेक्टर को दिया हुआ अबतक का सबसे बड़ा मिलिटरी इक्विपमेंट आर्डर (१०० नई मोबाइल आर्टिलरी गन) लार्सन एंड टूब्रो को देने के करीब है| यह खबर जुलाई २०१६ याने ३ महीने पहले की है |
अशोक लेलैंड को 450 फील्ड आर्टीलरी ट्रैक्टर (फैट) 6गुणा6 और इसी तरह के सुपर स्टेलियन वाहन और 825 एंबुलेंस 4X4 मुहैया करने के लिए सेना ने आर्डर दिया

इस तरह के कई आर्डर और प्रोजेक्ट अलग अलग कंपनी को मिलते रहते है । भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और सैमटेल जैसी कंपनियों को भी सर्कार और सेना से आर्डर मिले है | पर बुद्धिजीविओ के चयनात्मक विरोध से जनता में गलत बाते जा रही है । बुद्धिजीवी अपने मोदी विरोधी एजेंडे में सफल होते जा रहे है और कुछ लोग इनकी एकतरफा पत्रकारिता, चयनात्मक विरोध और सरकार के खिलाफ हो रही मुहीम का हिस्सा बन रहे है |

अरे इनसब में मैं एक जरुरी बात बताना भूल ही गया| राफाल डील का सौदा अनिल अम्बानी से हुआ है न की मुकेश अम्बानी से । और ये माना जाता है की अनिल अम्बानी समाजवादी पार्टी के नेताओ के करीब है ना की मोदी के।

पर अगर किसी का उपनाम अम्बानी है तो तार्किक शक्ति से पूर्ण बुद्धिजीवी वर्ग आराम से केजरीवाल की ये बात दोहरा सकता है की “ये अम्बानी के एजेंट है”। चूँकि मेरा उपनाम मेहता है और यही उपनाम शेयर बाजार में धोखा करने के आरोपी हर्षद मेहता का भी था, आप ” बुद्धिजीवी तर्क ” इस्तेमाल कर मुझे भी जेल में डाल सकते है 😉

समय आ गया है की हम नैतिक पत्रकारिता और जरुरी सामाजिक मुद्दों पर बात करे और बुधिजीविओ के प्रोपोगंडा से बचे |

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