ध्यान सिंह से ध्यान चंद तक का सफर’

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मेजर ध्यान चंद भारतीय हाॅकी का एक एसा नाम जिसका जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकी। उसने भारतीय हाॅकी को वो सम्मान, गरिमा, अनगिनत जीत, पदक, आदि अत्यन्त कठिन पस्थिितियों में दिलाये जिसके बारे में वर्तमान खेल जगत सोच भी नहीं सकता। अनेक आसरों पर उनके खेल, लगन समर्पण, औेर खेल भावना को अन्र्तराश्ट्रीय स्तर पर जाॅचा, अैोर परखा गया लेकिन वे हमेषा खरे उतरे। मसलन 1936 के बर्लिन ओलम्पिक में खेल के दोरान उनकी हाॅकी स्टिक की कई बार जाॅच की गई कि, कहीं उसमें कोई एसी चीज तो नहीं लगी है जिससे गेंद उनकी स्टिक से ही लगी रहती है। लेकिन यह उनकी बे मिसाल ड्बिलिंग का कमाल था। इसी प्रकार बर्लि्रन में ही भारत जर्मनी के बीच हुये फाॅयनल मैच के बाद जर्मनी के षासक हिटलर ने उन्हें जर्मनी आने का ओर जर्मन सेना के नायक बनान का कहा तो उन्होंने इसे बडी ही विनम्रता से नकार दिया। यह उनकी देष के प्रति सच्ची निश्ठा का श्रेश्ठतम उदाहरण था।

हाॅकी उनकी रग- रग में बसी हुई थी। 29 अगस्त 1904 को इलाहाबाद में जन्में ध्यान चंद को बचपन से ही कुष्ती लडने का षौक था। लेकिन जब उन्होने भारतीय सेना में ज्वाईन किया जो उनके अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें हाॅकी खेलने के लिये प्रेरित किया। वे उनकी सलाह पर हाॅकी खेलने लगें। उन्हें दिन में हाॅकी खेलने का समय कम मिलता था इसलिये वे चाॅदनी रात में मैदान में अकेले ही प्रेक्टिस किया करते थे जिसे देखकर उनके अंग्रेज अधिकारी ओर साथी ध्यान चाॅद बुलाने लगे बाद में चे ध्यानचंद कहलाये जबकि उनका वास्तविक नाम ध्यानसिंह था।

अपने खेल जीवन में उन्होने भारत के लिये 1000 से अधिक गोल किये। तथा तीन ओलम्पिक खेलों में लगातार स्वर्णपदक के प्रमुख सूत्रधार बने। उनके खेल केोषल से पूरा विष्व अचंभित था नम्रता उनका स्वाभाविक गुण था और हाॅकी उनकी प्राणवायु थी। 1972 में पाकिस्तान औैर भारत के बीच हाॅकी मैेच था जिसमें पाकिस्तान के तत्कालीन महान खिलाडी कर्नल दारा भी आये थे। उन्होने ध्यानचंद से मिलने की इच्छा व्यक्त की। उन्हीं दिनों ध्यानचंद जी के बडे भाई रुपसिंह जो स्वॅय हाॅकी के बहुत बडे खिलाडी थे और भारतीय टीम के सदस्य थे, का स्र्वगवास हो गया था । लेकिन फिर भी वे कर्नल दारा से मिलने पहुॅचे। जब नई दिल्ली के नेषनल स्टेडियम में वे दोनो महान खिलाडी आपस मे गलें मिले तो पूरा स्टेडियम उनके सम्मान में खडा हों गया। तत्कालीन प्रधानमंत्रीश्रीमती इंदिरा गाॅधी भी उनके सम्मान में खडी हो गई और बोली ये केवल खिलाडी ही नहीं बल्कि दो देषों के खेल राजदूत हैं। जब ध्यान चंद ने कहा कि, वे यहाॅ आने की स्थिति में नहीं थे क्योंकि, उनके भाई की मृत्यु हो गई है लेकिन कर्नल का पे्रम मुझे यहाॅ खींच लाया है। कर्नल दारा ने माफी माॅगी कि, मुझे यह खबर नहीं थी वरना मैं स्वॅय मिलने आता। यह ध्यान चंद जी की कर्नल दारा के प्रति सदाषयता थी । वे जैसे थे वैसे ही दिखना चाहते थे आडम्बर , औेर अभिमान उन्हें छू तक नहीं गया था। एक बार झांसी के कलेक्टर उनसे मिलने आने वाले थे परिजनों ने उनसे अच्छे कपडे पहनने को कहा तो दादा ने जवाब दिया कि, मै अपने खेल के लिये जाना जाता हूॅ न कि कपडों के लिये बेहतर होग कि, मै उनसे स्वाभाविक वातावरण में ही मिलूं न कि औेपचारिक वातावरण मे, यही कलेक्टर के प्रति मेरा सम्मान होगा।

वे 48 वर्श की उम्र तक सक्रिय हाॅकी से जुडे रहे तथा अपने खेल जीवन के अंतिम दिनों मेे भारतीय टीम के कप्तान के रुप में न्यूजीलेड दक्षिणं अफ्रीका तथा अनेक अफ्रीकी देषों का दौेरा किया जिसमें उन्होने सर्वाधिक गोल कियें। वे बताते थे कि, किस तरह वे 1928 के एमस्टरडम ओलम्पिक में तीन महीने के लंबे और उबाउ समुद्री जहाज के सफर से पहॅुचे और वहाॅ स्र्वण पदक हासिल किया।

आज खेल दिवस जो उनके जन्म दिवस के रुप में मनाया जाता है हाॅकी प्रेमियों के मन को यह बात आज सालती है कि, उन्हें ‘भारत रत्न’ नहीं दिया गया जबकि वे उसके वास्तविक हकदार थे। लेकिन सबसे बडा दुःख पहलू यह है कि,पहिले भारत रत्न दिये जाने के नियमेा में संषोधन किया गया औेर खेल हस्तियों को इसमें षामिल किया गया। दादा का नाम केवल औपचारिक रुप से रखा गया क्योकिं भारत रत्न किस खिलाडी को दिया जाना है तो सत्ता के गलियारों में पहिले ही तय हो चुका था । भारत रत्न उसी खिलाडी को दिया गया जिसने क्रिकेट को अपनी निजी जागीर समझाा और तब तक खेलता रहा जब तक कि, उसका षतकों का षतक पूरा नहीं हुआ। वो कई महीनों तक जब अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर सका तो भारतीय क्रिकेट क्रटोल बोर्ड ने बंगला देष के विरुद्ध आनन फानन में श्रंखला आयोजित करवाई और उस कमजोर टीम के विरुद्ध अंततः वो सफल हुआ। उन्हें भारत रत्न देने के पीछे तत्कालीन सरकार की क्या अनिवार्यता ,आवष्यकता औेर मजबूरी थी यह तो वो ही जाने । मेरा उस खिलाडी प्रति कोई दुराग्रह भी नहीं है। लेकिन जब हम उस ‘भारत रत्न ’’ को पंखे, इनवर्टर, औेर वाटर प्यूरीफायर बेचते हुये देखते है तो एक भारतीय होने के नाते
उस सम्मान की गरिमा का ख्याल तो आता ही है। जबकि मेजर ध्यान चंद ने खेल को एक जूनून के रुप में लिया।

बहरहाल यही कहा जा सकता है कि, दादा सब सम्मानों से सम्माननीय थे न उन्हें किसी सम्मान की चाह थी। बेबाकी, सत्यनिश्ठा देष के प्रति उनका समर्पण उनकी विषेशता थी हम भारतीय हाॅकी पे्रमी यह आषा ,रखे कि, वो समय आयेगा जब हम उनको खेल दिवस पर भारत रत्न दादा ध्यान चंद के रुप में स्मरण करेगें।

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