ओलम्पिक में भारतीय हॉकी का सफर

ओलम्पिक में भारतीय हॉकी का सफर

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1886 से एथेंस (ग्रीस) से प्रारंभ हुये ओलम्पिक खेलों में 1886,1900 पेरिस,1904 सेंट लुईस, तथा 1906 एथेंस में हाॅकी को ‘ाामिल नहीं किया गया था। 29 अक्टूबर से 31 अक्टूबर1908 तक लंदन में पहिली बार  हाॅकी के खेल को ‘ाामिल किया गया।ं 1912 एवं 1916 में इसे ‘ाामिल नहीं किया गया। हाॅकी को 1920 से बेल्जियम ओलम्पिक से नियमित ‘ाामिल कर लिया गया तब से आज तक हाॅकी ओलम्पिक का प्रमुख खेल है। जहाॅ तक भारत का प्र’न है भारतीय टीम ने पहिली बार नियमित रुप से 1928 से इस प्रतियोगिता में भाग लेना प्रारंभ किया।
        एम्स्टरडम ( नीदरलेंड) में 1928 में हुये ओलम्पिक में भारतीय टीम ने जयपालसिंह की कप्तानी में भाग लिया। टीम के अन्य प्र्रमुख खिलाडी युयुफ और नवाब आॅफ पटौदी सीनीयर लंदन से सीधे एमस्टरडम पहुॅचे। सबसे महत्वपूर्ण खिलाडी थे मेजर ध्यान चंद। भारतीय टीम ने आस्ट्रिया को 6-0, बेल्जियम को 9-0, डेनमार्क को 5-0, स्विटजरलेंड को 6-0 तथा फाॅयनल में नीदरलेंड को 3-0 से पराजित कर पहिली बार ओलम्पिक स्र्वण जीता।

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चित्र indiahockey.org

         1932 में लांस एंजेल्स में जापान को 11-0 से, तथा फाॅयनल में संयुक्त रा”ट्र अमेरिका को 24-1 से हराकर पुनः स्र्वण पदक प्राप्त किया। इस बार भारतीय टीम के कप्तान लाल’ााह बोखारी थे।
         1936 में बर्लिन ओलम्पिक में  भारतीय टीम के कप्तान चमत्कारिक खि

लाडी मेजर ध्यानचंद थे। उनके साथ उनके भाई केप्टन रुप सिंह भी टीम के प्र्रमुख सदस्य थे। अपने प्रेक्टिस मैच में मेजबान जर्मनी की टीम ने भारतीय टीम को पराजित किया जिससे भारतीय खेमें में चिंता व्याप्त थी। टीम को मजबूती देने के उद्धे’य से भारत से कर्नल दारा को तलब किया गया। उनके एन समय जर्मनी पहुॅचने से टीम में जो’ा औेर हिम्मत आ गई। भारतीय टीम ने हंगरी को 4-0, सयुंक्त रा”ट्र अमेरिका को 7-0 से, जापान को 9-0 से, फा्रॅस को 10-0 से तथा फाॅयनल में जर्मनी को 8-1 से पराजित कर लगातार तीसरी बार स्र्वण पदक जीता। फाॅयनल मैच को देखने के लिये स्वॅय हिटलर मौजूद था। मैच की समाप्ति के बाद हिटलर ने ध्यान चंद को तलब किया औेर उनसे जर्मनी की सेना में उच्च पद देने की पे’ाक’ा की जिसे उन्होंने विनमृता से ठुकरा दिया। 1940 तथा 1944 के ओलम्पिक खेल वि’वयुद्ध के कारण आयोजित नहीं हो सके।
 1948 में भारतीय टीम ने कि’ानलाल की कप्तानी में भागलिया। ध्यानचंद ने उस समय तक हाॅकी को अलविदा कह दिया था। भारतीय टीम ने आस्ट्रिया को 8-0, अर्जेंटिना को 9-1, स्पेन को 2-0, नीदरलेंड को 2-1, तथा ब्रिटेन को 4-0 से हराकर चैथी बार स्वर्ण जीता।
   1952 में हेलसिंकी में हुये ओलम्पिक में भारतीय टीम के कप्तान थे कुॅवर दिगविजय सिंह थें। भारत ने आस्ट्रिया को 4-0, ब्रिअेन को 3-1,  तथा नीदरलेंड को 6-1 से हराकर पुनः स्वर्ण जीता।
    1956 में भारतीय टीम तेजतर्रार फारवर्ड बलबीर सिंह के नेतृत्व में मेलबर्न पहुॅची। भारत ने अफगानिस्तान को 14-0, संयुक्त रा”ट्र अमेरिका को 16-0 से, सिंगापुर को 6-0 से, जर्मनी को 1-0 से, तथा फाॅयनल में पाकिस्तान को 1-0 से हराकर लगातार छठवीं बार स्वर्ण जीता।
   1960 में रोम में हुये खेलों में भारतीय टीम को पहिली बार स्वर्ण से वंचित होना पडा। लेसली क्लाडियस की कप्तानी में गई टीम ने डेनमार्क को 10-0 से,नीदरलेंड को 4-0 से,न्यूजीलंेड को 3-0 से, आस्टे्रलिया को 1-0 से, जर्मनी को 1-0 से हराया लेकिन फाॅयनल में अपने चिरपरिचित प्रतिद्वंदी पाकिस्तान से 0-1 से पराजित हो गया तथा उसे रजत पदक से संतो”ा करना पडा।
  1964 में टोकियों में भारतीय टीम ने चरनजीत सिंह की कप्तानी में भाग लिया। भारत ने बेल्जियम को 2-0, जर्मनी तथा स्पेन के साथ 1-1 से बराबरी की,हाॅगकाॅग को 6-0,मलये’िाया को 3-1,कनाडा को 3-0, नीदरलेंड को 2-1, तथा आस्टे्रलिया को 3-1 से हराया। फाॅयनल में उसका मुकाबला पकिस्तान से था जिसे 1-0 से हराकर भारत ने पिछली हार का हिसाब चुकता कर स्वर्ण पर पुनः कब्जा किया।
   1968 में मेक्सिको ओलम्पिक में भारतीय हाॅकी अनेक खेमों में बॅटी नजर आई। कप्तानी का झगडा इतना अधिक बढ गया कि, पहिली बार दो कप्तान बनाये गये। कप्तान सर्वश्रे”ठ रक्षक पृथीपाल सिंह बनाये गये तथा बंगाल के गुरुबक्’ा सिंह को संयुक्त कप्तान बनाया गया। इन मनमुटावों का असर भारतीय टीम के प्रदर्’ान पर पडा तथा पहली बार फाॅयनल में नहीं पहुॅच सकी।  भारतीय टीम काॅस्य पदक ही जीत सकी। अपने पहिले ही मैच में उसे न्यूजीलंेड की टीम से 1-2 से पराजित होना पडा। हाॅलाकि, बाद में टीम ने अच्छा प्रदर्’ान करते हुये प. जर्मनी को 2-1,मेक्सिको को 8-0,स्पेन को 1-0, बेल्जियम को 2-0,जापान को 5-0, तथा पूर्व जर्मनी को 1-0 से हराते हुये सेमीफाॅयनल में प्र्रवे’ा किया। लेकिन  ओलम्पिक के इतिहास में  उसे पहिली बार सेमीफाॅयनल में पराजित होना पडा। जहाॅ आस्ट्रेलिया ने उसे 2-1 से पराजित किया।
         1972 म्युनिख ओलम्पिक की कहानी भी लगभग वही दोहराई गई। हरमीक सिंह की कप्तानी में पहुॅची टीम ने नीदरलेंड के साथ 1-1 तथा पोलेंड के साथ 2-2  से ड्रा मैच खेले।  आस्टे्रलिया को 3-1, ब्रिटेन केा 5-0, केन्या को 3-2,मेक्सिको को 8-0, तथा न्यूजीलंेड को 3-2से हराया लेकिन सेमीफाॅयनल में पाकिस्तान से 0-2 से पराजित हुई। बाद में पोजी’ान मैच में नीदरलेंड को बमु’िकल 2-1 से पराजित काॅस्य पदक जीता।
          1976 माॅटियल ओलम्पिक आते आते भारतीय टीम का पराभव प्रारंभ हो गया। अजीत पाल सिंह जैेसे श्रे”ठ कप्तान तथा अ’ाोक कुमार, बी.पी.गोविन्दा असलम ‘ांेरखान तथा सुरजीत जैसे बेहतरीन खिलाडियों के  होने के बाबजूद भारतीय टीम पहिली बार पदक संे वंचित रही।, पूल मैचों में भारतीय टीम नीदरलेंड से 1-3 से,तथा आस्टेलिया से 1-6 से पराजित हो गई। अन्य मैचों में उसने अर्जेन्टीना को 4-0,कनाडा को 3-0, मलये’िाया को 3-0 से परजित किया। पोजी’ान मैचों में आस्टेलिया से 5-6, तथा  जर्मनी से 2-3 से हार गई। बाद में बमु’िकल मलये’िाया को 2-0 से हराकर छठवां स्थान प्राप्त किया। इस परिणाम के बाद में जब मै दूसरे दिन दादा ध्यानचंद से मिलने सिपरीबाजार झांसी स्थित उनके निवास पहुॅचा ओर उनसे साक्षत्कार की इच्छाा जाहिर की तो सबसे पहिले उनके मुॅह से यही निकला कि, मुझे अपने जीवन में ये दिन भी देखना था।
क्हा जाता हे कि, जब उनके पुत्र अ’ाोक कुमार वापिस आये तो दादा ने उनसे कई दिनों तक बात नहीं की। अ’ाोक कुमार ने बहुत सफाई देने की को’िा’ा की लेकिन दादा ने केवल यही कहा कि, ‘‘बडे खिलाडी एसी गलतियाॅ नहीं करतें’’।
              1980 में मास्को ओलम्पिक पर बाहि”कार की छाया पडी तथा वि’व की अनेक बडी टीमों ने भाग नहीं लिया। फुलबेक वी.भास्करन की अगुआई में गई टीम ने तंजानियाॅ को 18-0 से हराया। पोलेंड तथा स्पेन से 2-2 से बराबरी की तथा क्यूबा को 13-0, रुस को 4-2 से पराजित कर फाॅयनल में प्रवे’ा किया। जहॅा उसने स्पेन को 4-3 से हराकर स्वर्ण हासिल किया।
               1984 में लाॅस एंजेल्स में हुये ओलम्पिक में भारतीय टीम वि’व के श्रे”ठतम फारवड्र्र में से एक जफर इकबाल की कप्तानी में खेली। यू.एस.ए. को 5-1 से,मलये’िाया को 3-1 से, स्पेन को 4-3 से हराया। लेकिन आस्टेलिया से 2-4 से पराजित हुई तथा जर्मनी से गोल रहित बराबरी के कारण सेमीफाॅयनल से वंचित हो गई्र।  5-8 स्थान के लिये हुये मैच में उसने न्यूजीलेंड को 1-0 से हराया तथा 5-6 स्थान के लिये हुये मैंच में उसने नीदरलंेड को 5-2 से हराकर पाॅचवां स्थान प्राप्त किया।

           1988 सियोल में भारतीय टीम के कप्तान एम.एम. सोमैया थे। परगटसिंह, जूड फेलिक्स, अ’ाोक कुमार और थोईबा सिंह जैसे खिलाडियों के होने के बाबजूद भारतीय टीम अपने प्रदर्’ान में कोई सुधार नहीं कर सकी औेर छठवें स्थान पर रही। े पहिले ही मैच में  अप्रत्या’िात रुप से रुस की अपेक्षाकृत कमजोर माने जाने वाली टीम से0-1 से पराजित हो गई तथा जर्मनी से 1-1 से ड्रा खेला। दक्षिण कोरिया को 3-1 से तथा कनाडा को 5-1 से पराजित तो कर दिया लेकिन सेमीफाॅयनल में जगह नहीं बना पाई। 5-8 स्थान ेके लिये खेले गये मैच में  पाकिस्तान से 1-2 से पराजित होकर छठवां स्थान प्राप्त किया।
            1992 में बार्सिलोना में गई टीम के इस बार परगट सिंह कप्तान थे। मुके’ा कुमार,आ’ाी”ा बलाल, ए.बी. सुबैया , जबदेव सिंह ओर धनराज पिल्लै जैसे खिलाडियों के हाने के बाबजूद भारतीय टीम एक बार फिर खाली हाथ लौटी। जर्मनी से 0-3,ब्रिटेन से 1-3, आस्टे्रलिया से 0-1 से हारने के बाद उसकी सेंमीफाॅयनल की संभावनाऐ समाप्त हो गईं। अर्जेन्टीना को 1-0, इजिप्ट को 2-1 से, हराया। 5-8 स्थान के लिये खेले गये मैच में उसे एक बार फिर पराजय  का मुॅह देखना पडा जहाॅ उसे स्पेन ने 2-0 से पराजित कर दिया। न्यूजीलंेड को 3-2 से हराकर भारतीय टीम सातवें स्थान पर रही।
             1996 में एटलांटा ओलम्पिक में पुनः परगटसिंह के नेतृत्व में गई भारतीय टीम कोई चमत्कार नहीं कर सकी। तथा आठवें स्थान पर रही। अपने पहिले ही मैच में अर्जेन्टीना से 0-1 से पराजित होने तथा जर्मनी से 1-1 से  तथा पाकिस्तान से 0-0 से बराबरी करने के कारण भारतीय टीम अंक तालिका में पिछड गई तथा सेमीफाॅयनल में प्रवे’ा से वंचित रह गई।अन्य मैचों में उसने यू.एस.ए. को 4-0 से,स्पेन को 3-1 से हराया। 5-8 स्थान के लिये खेले गये मैचों में वो दक्षिण कोरिया से टाई बे्रकर में 3-5 से हार गई तथा फिर ब्रिटेन से भी 3-4 से हार कर आठवें स्थान पर सिमट गई।
          2000 में सिडनी ओलम्पिक के लिये रमणदीपसिंह को टीम की कमान सौंपी गई। लेकिन परिणाम वही रहा भारतीय टीम सातवें स्थन से आगे नहीं बढ सकी। दिलीप टर्की, धनराज पिल्लै,मुके’ा कुमार, समीरदाद, दीपक ठाकुर जैसे सितारा खिलाडियों के होते हुये भी टीम एक बार फिर खाली हाथ लौटी। अपने प्रारंभिक मैचों में दक्षिण कोरिया से 0-2 से पराजय,आस्टे्रलिया से 2-2 से तथा पोलेंड से 1-1 से बराबरी ने उसके लिये एक बार फिर सेमीफाॅयनल के दरवाजे बंद कर दिये। अर्जेटीना पर 3-0 की विजय,स्पेन पर 3-2 की विजय टीम को लाभ नहीं दे सकी। 5-8 वें स्थान के मैचों में ब्रिटेन से 1-2 से हारने तथा अर्जेटीना को 3-1 से हराकर भारतीय टीम सातवे पर रही।
   2004 में ऐथेंस में भारतीय टीम दिलीप टर्की के नेतृत्व में गइ्र्र। भारतीय टीम के लिये यह संतो”ा करने वाली बात रही कि, वो पिछले ओलम्पिक के परिणामेंा से आगे नहीं बढ सकी तो पीछे भी नहीं रही। इस समय तक संदीपसिंह, अर्जुन हलप्पा, विक्रम पिल्लै, गगनअजीतसिंह टीम का हिस्सा बन चुके थे तथा धनराज पिल्लै अनुभवी खिलाडी थे। लेकिन इनमें से कोई भी टीम को संबल नहीं दे सका। नीदरलेंड से 1-3 से, आस्टे्रलिया से 3-4 से, न्यूजीलंेड से 1-2 से पराजय तथा अर्जेटीना से 2-2 से ड्रा ने भारतीय टीम का पूरा गणित बिगाड कर रख दिया। पूल मैच में भारतीय टीम केवल एक मैच ही जीत सकी और दक्षिण अफी्रका को 4-2 से हराया। पोजी’ान मैचों में पाकिस्तान से 0-3 से हारकर तथा कोरिया को 5-2 से हराकर सातवें स्थान पर रही।
     ओलम्पिक हाॅकी के इतिहास में पहिली बार भारतीयटीम खेलने की पात्रता हासिल नहीं कर पाई। जर्मनी ने स्वर्ण,स्पेन ने रजम तथा आस्ट्रेलिया ने काॅस्य जीता।

     

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