किंकर्तव्यविमूढ़ – कविता- ईश शाह

जब मैं कुछ नहीं करता हूँतब मुझे दोषी करार दिया जाता है।जब कुछ करूँ तो फिर मेरा क्या हश्र होगा?मैं डरता हूँ नजरों के अंधियारो सेडरता हूँ शब्दों की तलवारो सेसहमा हूँ रिश्तों के बटवारे मेंपला हूँ आँसुओ की आँखों मेंचार आँखे वाले मेरे जीवन के

मंजिल – कविता – ईश शाह

ए मुसाफ़िर थक गया है तो थोड़ा आराम कर ले,फिर उठ और अपनी मंजिल अपने नाम कर ले । इतना मत भागथोड़ा ठहराव कर ले,सब से हो गई हो तोअब खुद से बात कर ले । दिन तो बित ही गयासरगर्मी सी रात कर ले,जो चेहरे पर हंसी रखेउन शब्दों को साथ कर ले ।
मेरी राय ऍप MeriRai App 😷

अब अपने पसंदीदा लेखक और रचनाओं को और आसानी से पढ़िए। मेरी राय ऍप डाउनलोड करे | 5 Mb से कम जगह |

error: Content is protected !!