आवाहन :( निर्गुण)

आवाहन :( निर्गुण) ठाढ़ी झरबेरिया वन में होत मिन सार बा कैसे जाऊँ पार पियरा नदिया के पार बा। भोरी मतवारी तन की अब लगि कुआरि हूँ। सगरौँ सिंगार कइली लागेला उघारि हूँ। वहि पार.. पी. घर... यहि पार संसार बा। कैसे जाऊँ

रीझ-रीझ कर खीझ रहा हूँ

रीझ-रीझ कर खीझ रहा हूँ , जब से जग में होश संँभाला । प्रेम पुरातन याद नहीं अब, जब से छूटा साथ तुम्हारा ।। हम भूले तो तुम भी भूले, हारे की मत बाट जोहना । हम भी तेरे, माया तेरी , देर नहीं, झट मिलो मोह ना ।।
मेरी राय ऍप MeriRai App 😷

अब अपने पसंदीदा लेखक और रचनाओं को और आसानी से पढ़िए। मेरी राय ऍप डाउनलोड करे | 5 Mb से कम जगह |

error: Content is protected !!