हाॅकी खिलाडी मोहम्मद शाहिद का अवसान

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एक बडे खिलाडी का छोटी उम्र में चले जाना

एक बहुत बडा खिलाडी और एक बेहतर इंसान बहुत छोटी उम्र में 56 वर्ष में हमें छोडकर चला गया। लीवर की गंभीर बीमारी से ग्रसित शाहिद ने गुरुग्राम के वेदांता अस्पताल में अपने जीवन की आखिरी साॅस ली।

14 अप्रिल 1960 को वाराणसी में जन्में शाहिद को बच्पन से ही हाॅकी से लगाव था। उन्होने वर्षो तक स्कूल स्तर की हाॅकी खेली। बाद में वे लखनउ के स्र्पोट्स काॅलेज में प्रविष्ट हुये। जहाॅ उनकी प्रतिभा आकार लिया।

19 वर्ष की आयु में 1979 में उन्होने भारत की ओर से पहिले जूनियर विश्व कप में भाग लिया। उसे बाद उन्होने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा। 1979 में क्वालालम्पुर में खेली गयी चार देशो की प्रतियोगिता में उन्होने भारतीय सीनियर टीम में प्रवेश किया। अगले ही वर्ष 1980 में कराची में हुई चेम्पियन्स ट्राफी में उन्हें सर्वश्रेष्ठ फारवर्ड का अवार्ड मिला।

उन्होने 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई गेम्स में भागलिया तथा 1986 के एषियन गेम्स में भारतीय टीम का नेर्तत्व किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने1982 कराची, 1985 में ढाका, एषिया कप में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

शाहिद भारत की ओर से 1980 मास्को,1984 लाॅस एजेल्स, तथा 1988 के सियोल ओलम्पिक में भाग लिया। 1980 में मास्कों में हुयेआलम्पिक में भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक जीता था। मोहम्म्द शाहिद ने 1981-82 मुम्बई तथा 1986 में लंदन में हुये विश्वकप में भागलिया। 1986 में वे भारतीय के कप्तान थे।

वे भारत के अबतक हुये श्रेष्ठ फाॅरवर्ड खिलाडियों में से एक थे। उनके पास एक बार गेंद का आ जाना विपक्षी टीम के लिये घबराहट का कारण बन जाता था। वे विश्व विख्यात ड्रिबलर थे। वे कलात्मक हाॅकी के पर्याय थे। उनकी इसी कलात्मक हाॅकी के हजारों लोग दीवाने थे। घरेलू प्रतियोगिताआ में वे वर्षो तक भारतीय रेल्वे की ओर से खेले तथा अनेकों प्रतियोगिताए जीती।

उनके बारे में कहा जाता था कि, एक बार गेंद उनके पास आई तो सीधे गोल मुख तक ही पहुॅचती थी। वे न केवल गेम चेंजर थे अपितु गेम मेकर भी थे। शाहिद में हॉकी प्रेम कूट कूट कर भरा था। उन्होने अपने अकेले के दम पर भारत तथा भारतीय रेल्वे के लिये अनेक मैच जितवाये।

एक बडे खिलाडी का छोटी उम्र में चला लाना हम हाॅकी प्रमियों के लिये बहुत दुःखद घटना है। जिससे उबरने में न जाने कितना वक्त लगेगा।
एक सच्चे खिलाडी का हार्दिक श्रद्धाजलि।

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