जब भारतीय जनमानस आजादी के सूर्य की पहली किरण के इंतजार में था

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जब भारतीय आजादी की इबादत लिखी जा चुकी और तक हों गया था कि, 14-15 अगस्त की आधी रात को भारत नये अध्याय की षुरुआत करेगा औेर एक स्वतंत्र राश्ट्र हो जायेगा तब जनमानस की उत्तेजना, खुषी, जोष,राश्ट्र के प्रति प्रेम, स्वतंत्र राश्ट्र में जीने की उत्सुकता अपने चरम पर थी। षाम से ही लेगों का हजूम दिल्ली की ओर कूच कर रहा था, गोया पूरा देष दिल्ली में समान को आतुर था। हो भी क्यों न हर काई उन क्षणों को जीन चाहता था, भोगना चाहता था।

भारत के प्रथम राश्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के नई दिलली स्थित आवास के सामने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ हो रहा था जिसमें केवल वे लोग षामिल थे जो अगल कुछ घंटों के बाद स्वतंत्र देष की सरकार का हिस्सा बनने वाले थे। इस यज्ञ की अग्नि में आहुत सामग्री से उठने वाले धूएं से न केवल वातावरण अपितु इन सभी के मन की षुद्धि हो रही थी। इस प्रकार भावी मंत्रीगण उन विकट जिम्मेदारी को वहन करन के लिये अपने आप को योग्य बना रहे थे जो उन पर आने वाली थी। यह षुभ अवसर पर की जाने वाली अनिवार्य वैदिक क्रिया थी। यज्ञ की आहुती देना अपने संकल्प के पूर्ण होन का सूचक होता है। यहाॅ पर भी यही माना गया।

भारत के संचालन की जिम्मेदारी जिस षख्स पर आने वाली थी प. जवाहरलाल नेहरु संविधान सभा को संबोधित कर रह थे। लाहौर से बार बार प्राप्त हो रहे हिंसा, आगजनी औेर लूट के समाचारो ने उन्हें विचलित कर दिया था। वे अपने दिल की आवाज सुना रहे थे मानों आज उनकी जिव्हा पर सरस्वती विराजित हो गई हो। वे कह रहे थे कि, चंद घंटो के बाद हमारा जो सपना साकार होने जा रहा है उसकी नींव बहुत पहिले कां्रतिकारियों के बलिदान ने लिख दी थी। यद्यपि हमें यह आजादी उस रुप में नहीं मिल रही है जिस रुप की हमने औेर हमारे महान षहीद क्रांतिकारियों ने कल्पना की थी। तथापि हमें इसी रुप में स्वीकार करना होगा। वे कहे जा रहे थे कि, ज्योंहींआधी रात की टंकार होगी … दुनियाॅ सो रही होगी भारत जागेगा और जागते ही आजाद हो जायेगा। इतिहास में ऐसे क्षण कभी- कभी आते है जब हम एक दहलीज पार करें और पुराने को छोडकर नये में आ खडे हों। जब उसी एक कदम से पूरा युग समसप्त हो जाये ओर हम नये युग का सूत्रपात करें।

सभा भवन के बाहर आधी रात में अचानक बिजलीऔर तेज बारिष होने लगी। चारों तरफ हजारों की संख्याॅ में भारतीयों को क्या परवाह थी। क्षण- क्षण नजदीक आ रही उस आधी रात की संभावना ने उन्हें इतना रोमांचित कर रखा था कि, उन्हेें भीगने का ज्ञान ही नहीं हुआ। उधर संविधान सभा कक्ष में बैठे लोग गम्भीर होकर आधी रात की टॅकार की प्रतीक्षा में समाधिस्थ से हो गये थे। आखिर वो घडी आ गई जिसने े एक दिन के समापन ओर साथ में एक युग के समापन की भी घोशणा करदी।

भारत की आध्यात्मिक परम्परा सुबह के सूरज का स्वागत षंख से करने की रही हैं लेकिन घडी की 12 टंकार पूरी होने से पहिले ही हुये तीव्रतर षंखनाद ने उपस्थित जन समूह को रोमांच के चरम पर पहुॅचा दिया। इसका सीधा संदेष था कि, विष्व का सबसे बडा लोकतात्रिक देष अब आकार ले चुका है। साथ ही यह भी कि, विष्व के सबसे बडे साम्राज्य की भारत से विदाई हो गई है।

देंष की राजधानी दिल्ली रोषनी से जगमगा रही थी। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों में नयनाभिराम रोषनी की गई थी। आजादी की वो रात रोषनियों की रात थी। हरिजन बस्तियाॅं जो महात्मा गाॅधी की सबसे पसंदीदा बस्तियाॅ थीं उसमें मोमबत्तियाॅ और दूसरें साधनों से रोषनी की गई थी। आ जाादी के जष्न से मुम्बई, षिमला, कानपुर, लखनउ, आदि जगमगा उठे । लेकिन कलकत्ता भय और हिंसा और अविष्वास के वातावरण में जीने को मजबूर था। गाॅधी जी उस समय कलकत्ता में ही थे। षाम को एक एसा अनूठाा जलूस निकाला गया जिसमें हिन्दू और मुसलमान षामिल हुये और वे गाॅधी जी के अस्थाई निवास हैदरी हाउस की तरफ बढ चले लोगों ने गाॅधी जी प्रेरणा से अपने अपने हथियार बंद कर दिये। केवल 24 घंटे पहिले जो लोग एक दूसरें की जाान के प्यासे थे और गला काट रहे थे, वे ही सडकों और गलियों में हाथ मिलाते दिखे। हिन्दू ओर मुसलमान औेरतों ने एक दूसरें के धर्म को भूलकर केवल माानवता के याद रखा और आपस में एक दूसरे का मुॅह मीठा कराया।

एक ओर पूरा देष जष्न में डूबा था वहीं दूसरी ओर वायसराय भवन में वे सभी वस्तुऐ, चित्र पेटिंग्स हटाये जा रहे थे जो ब्रिटिष साम्राज्य के साक्षी थें या उसकी याद दिला रहे थे। भारत के प्रथम राश्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने भारत के अंतिम वायसराय को भारत का प्रथम गर्वनर जनरल बनाये जाने का पत्र सोंपा जिसे माउण्टबेअन ने यह ेकहकर स्वीकार किया कि, वे भारत की सेवा उसी प्रकार करेगें जैसे कि, कोई स्वॅय भारतीय। बाद में नेहरु जी ने अपने मंत्रिमंडल की सूची गर्वनर जनरल को सौंपी औ उन्हें तथा मंत्रियों को षपथ दिलाई गई। सुबह होने पर लोगों के हजूम से मिलते हुये बडी मुष्किल से नेहरुजी लाल किले पहुॅचे ओर उन्होंने लालकिलें पर पहॅुच कर तिरंगा फहराया। यह वो यादगार क्षण था जिसे कोई भारतवासी कभी भी नहीं भुला सकता।

इस प्रकार जन मानस केा आजादी के सूरज की पहिली किरण का सुखद अहसास हुआ।

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