मेरी गुड़िया की एक कहानी

मेरी गुड़िया की एक कहानी मेरी गुड़िया की एक कहानीसुन दोस्त मेरी तुमको बतलानीस्कूल को जब मैं जाती थीघर छोड़ उसे मैं आती थीलौटती वापस शाम को जब मैंअकेली दुखी पाती उसे तब मैंमेरी गुड़िया की थी एक परेशानीसंग स्कूल उसे मुझे ले जानी मेरी

मन का शोर – शशिकांत सिंह

बिन पूछे सदा जो उड़ता ही चलेएक पल को भी कभी जो ना ढलेहै अटल ये टाले से भी ना टलेना जाने थामे कोई कैसे इसकी डोरकरे बेबस बड़ा ये मन का शोर राजा रंक हो चाहे साधु संत ही भलेमूर्ख चतुर सबको छलिया ये छलेयुगों से रंजिश में इसकी हर इंसान जलेहै

हम दिहाड़ी मजदूर कहाते

कर श्रम घर का बोझ उठाते हैं जब रोज कमाते तब खाते बेबस लाचारी में ही जीवन गवांते ना खुद पढ़े खूब ना बच्चे पढ़ा पाते हम दिहाड़ी मजदूर कहाते ना सपने आंखों पर अपने सज पाते बन आंसू पलकों से वो गिर जाते लक्ष्मी सरस्वती

जिद है अगर तो जीतोगे

जिद है अगर तो जीतोगे उठ तैयार हो फिर हर बार, जितनी बार भी तुम गिरोगे, जिद है अगर तो जीतोगे, चाहे वक़्त ना हो साथ, भले छुटे अपनों का हाथ, हर अंधियारा दूर कर देगा नाथ, सूखे में भी आंसुओं से जब, अपने सपनों को तुम

है ये बड़ी संयम की घड़ी

है ये बड़ी संयम की घड़ी है ये बड़ी संयम की घड़ी,, आओ तोड़ें संक्रमण की कड़ी, रहें कुछ दिन घर में ही सभीं, तभी जितेंगे जिंदगी की लड़ीहै ये बड़ी विकट घड़ी, जहां जिंदगी बेबस है पड़ी है ये बड़ी संयम की घड़ी है
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