मिलन को रास रचाता हों

नज़रों की सीमा से मीलों उपरकोई गीत मिलन के गाता हों। जहां सूरज बातें करता होंबिखरी रोशनी समेटता हों। धरती भी अलसाती होंबादल ओढ़ लजाती हों। चांद बीच आ जाता होंजलन में मुंह बिचकाता हों। शाम ढले सब प्रीत लिएमिलन को रास रचाता हों।।

दहलीज़ – कविता – शिल्पी प्रसाद

कुछ किताबें उन मांओं पर लिखी जानी चाहिए,जिनके दिन चुल्हें के धुएं की धुंध बनकर रह गए।एक पन्ना भी मन का न नसीब आया जिनके।। एक-आधा गीत उनके द्वंद्व की भी गढ़ी जानी चाहिए,महिमा मय नहीं, खांस-खांस खाट पर निढाल हुई जो पट गई।दम निकलते वक्त

और जब मोहब्बत का रुख़ बदलेगा..

और जब मोहब्बत कारुख़ बदलेगाअपनी दिखावट सेअपने होने भर केअहसास मेंतब,अपनी कहानी केसबसे प्रभावशाली औरमुख्य किरदार आपस्वयं होंगे। ©शिल्पी

विरह – कविता -शिल्पी प्रसाद

तुम जान लो,मैं जानती हूंये बातों की लड़ीजो स्वाभाविक आजमेरी जीवन कीशैली हो गई है,यह आदत एक रोज़हवा में घुलपिघल जाएगीऔर, पीछे रह जाएगीमेरी पीड़ा,तुम बिन मिलेविरह मिल जाएगा मुझे। ~शिल्पी
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