दहलीज़ – कविता – शिल्पी प्रसाद

कुछ किताबें उन मांओं पर लिखी जानी चाहिए,
जिनके दिन चुल्हें के धुएं की धुंध बनकर रह गए।
एक पन्ना भी मन का न नसीब आया जिनके।।

एक-आधा गीत उनके द्वंद्व की भी गढ़ी जानी चाहिए,
महिमा मय नहीं, खांस-खांस खाट पर निढाल हुई जो पट गई।
दम निकलते वक्त अकेले पड़ी कोठरी में दो टूक शब्द तक नहीं सुनें।।

टूटे-फूटे ढाई अक्षर दिवार पर ही सही, उनके नाम के भी गुधे जाने चाहिए,
जो दहलीज़ के पीछे घूंघट में घर चकचकाती रह गई।
आंखों की दमक झुर्रियों संग ढल गया जिनका।।

किन्तु जो ऐसा हो,

कहानी, कविता, और कैनवस पर उतारने से अच्छा
क्यों न इन्हें सशक्त बनने दिया जाए
कलम, कंठ और कूंची से
ये स्वयं अपनी
कविता में अपने संघर्ष के पद्य
कंठ से अपनी व्यथित मन के गीत
कूंची से जीवन की रंग-बेरंग होती तस्वीर
लिखकर, गाकर, उकेरकर, लोगों को स्वयं ही दिखलाए।

दहलीज़

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