जीवन या कहर

जीवन या कहर

ये काली घटा कांटों का महल
ये जीवन है या कोई कहर
टूटा है बनके पहरा यूं
जैसे पी लिया हो कोई जहर

क्यों मंदम हवा है वहकी सी
और वीरानगी भी चहेंकी सी
पीतल का निकला हर वो महल
जिसे सोचा स्वर्ण महल हमने

कहीं दूर से आती एक आवाज़
जहां दफ़न हैं कई हजारों राज
उस घाटी का है अलग चमन
जहां वीराना भी लगे अमन।

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Comments are closed.

मेरी राय ऍप MeriRai App 😷

अब अपने पसंदीदा लेखक और रचनाओं को और आसानी से पढ़िए। मेरी राय ऍप डाउनलोड करे | 5 Mb से कम जगह |

error: Content is protected !!