वर्तमान समय भारतीय लोकतंत्र के लिये बेहद नाजुक समय है। राजनैतिक मर्यादाऐं अपनी सभी सीमाये ेंलांघती नजर आ रही है। राजनैतिक हित दे’ा हित से कहीं उपर होता जा रहा है। इस उपापोह में मुख्य मुददे कही खोते जा रहे है।
इन राजनैतिक दलेां के सामने अभी केवल 2014 चुनाव हैै। किसी भी मुददे पर समर्थन या विरोध केवल राजनैतिक तराजू पर तौलने के बाद ही हो रहे है। विगत महीनों में डीजल औेर पेट्रोल के दाम एक से अधिक बार बढाये जा चुके है जिसका सभी दलों ने मात्र राजनैतिक विरोध किया इस बार भी यही हुआ। विरोध में चिंता आमजन की नहीं थी लेकिन राजनैतिक लाभ हानि का गुणा भाग ज्यादा था। ममता ने भी यही किया जिस बात के लिये उन्होंने केन्द्र की सरकार से हटना मुनासिब समझा था उसी के लिये हुये बंद में उन्होनें भाग लेना उचित नहीं समझा। क्योंकि, उन्हें आखिरी समय तक यह आ’ाा थी कि, ‘ाायद गीदड भभकी से हमे’ाा की तरह उनका जो काम चल रहा था वो इस बार भी चलेगा
राजनीति का सिलेंडर, और सिलेंडर की राजनीति
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