स्वतंत्रता सेनानी के रूप में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका

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स्वतंत्रता सेनानी के रूप में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य और साहस की गाथा कौन नहीं जानता। 1857 की क्रांति से शुरू हुई स्वतंत्रता की लड़ाई में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजो का डटकर सामना किया और अपने जीते जी अंग्रेजों को झांसी पर कब्जा नहीं करने दिया। जब भी लोगों की जुबान पर रानी लक्ष्मीबाई का नाम आता है तो सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी हुई पंक्तियां याद आ जाती हैं-

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

इन पंक्तियों को पढ़ने मात्र से ही शरीर में उत्साह और देशभक्ति की भावना जागृत हो जाती है। स्वतंत्रत भारत में आज महिलाओं के जिस सशक्तिकरण की बात की जाती है, लगभग 160 साल पहले रानी लक्ष्मीबाई और अन्य महिला स्वतंत्रता सेनानियों ने महिला सशक्तिकरण की नीवं रखी थी। महिलाओं के लिए रानी लक्ष्मीबाई से अधिक पड़ा महिला सशक्तिकरण का प्रेरणाश्रोत कोई नहीं हो सकता।

रानी लक्ष्मीबाई का परिचय-: लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी जिले में हुआ था। बचपन का नाम मणिकर्णिका होने के कारण घर वाले उन्हें मनु नाम से संबोधित करते थे। उनके पिता मोरोपंत
तांबे मराठा बाजीराव की सेवा में थे। जब लक्ष्मीबाई मात्र 4 वर्ष की थी उनकी माता भागीरथी सप्रे का निधन हो गया था। सन 1842 में मनु का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव निंबालकर के साथ हुआ।

विवाह के पश्चात मनु का नाम रानी लक्ष्मीबाई कर दिया गया और लक्ष्मी बाई झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के नाम से जाने जाने लगी। 1851 में रानी लक्ष्मीबाई और गंगाधर राव को रत्न की प्राप्ति हुई परंतु यह खुशी अधिक समय तक नहीं रुक सकी, चार महीने बाद ही लक्ष्मी बाई के पुत्र की मृत्यु हो गई। गंगाधर राव के बिगड़ते स्वास्थ्य से सभी चिंतित रहने लगे, ऐसे में दत्तक पुत्र(गोद लिया हुआ पुत्र) लेने पर सहमति बनी।

दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया। 21 नवंबर 1953 में गंगाधर राव परलोक सिधार गए।

अंग्रेजों की राज्य हड़प नीति

अंग्रेजों ने राज्य हड़प नीति के तहत दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया,और झांसी का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में करने का फैसला लिया गया। अंग्रेजों ने झांसी का खजाना जब्त कर लक्ष्मीबाई को झांसी का किला छोड़ने को कहा। जिसके बाद रानी लक्ष्मीबाई को रानी महल
जाना पड़ा। 7 मार्च 1957 को झांसी पर अंग्रेजो ने आधिपत्य कर लिया परंतु रानी लक्ष्मीबाई ने हार न मानने का फैसला लिया और अंग्रेजो से झांसी को मुक्त कराने के प्रयासों में जुट गईंं।

रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए स्वयंसेवक सेना की स्थापना की इसमें महिलाओं को भर्ती किया गया। महिलाओं को युद्ध लड़ने का प्रशिक्षण दिया गया। इस लड़ाई में आम जनता ने भी साथ दिया। महारानी लक्ष्मी बाई के साथ इस जंग में अंग्रेजों की हड़प नीति और अत्याचारों के शिकार राजाओं ने भी रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया, जिसमें बेगम जीनत महल, बेगम हजरत महल,
तात्या टोपे, नाना साहब, सम्राट बहादुर शाह प्रमुख थे।

1857 की क्रांति का आगाज

1857 में मेरठ से युद्ध का आगाज हो चुका था। हिंसा की चपेट में झांसी भी आया। 1857 में सितंबर या अक्टूबर में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया परंतु रानी लक्ष्मीबाई ने उसे विफल कर दिया। जनवरी 1857 में अंग्रेजों की सेना ने झांसी की ओर बढ़ना प्रारंभ किया और मार्च में पूरे झांसी शहर को घेर लिया, दो हफ्तों की लड़ाई के बाद अंग्रेजी सेना ने शहर पर
कब्जा कर लिया परंतु रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव को ले कर भागने में सफल रहींं। झांसी से भागकर लक्ष्मी बाई कालपी पहुंची और तात्या टोपे से जा कर मिल गई।

तात्या टोपे के साथ रानी लक्ष्मीबाई ने मिलकर ग्वालियर पर हमला बोल दिया और ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। 17 जून 1858 को अंग्रेजों का सामना करते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने घोड़ा दौड़ाया परंतु दुर्भाग्यवश मार्ग में नाला आ गया और घोड़ा नाला पार न कर सका, अंग्रेजों की टुकड़ी जो पीछे से आ रही थी ने रानी के सिर और हृदय पर प्रहार कर दिया, घायल अवस्था में भी उस वीरांगना ने हार नहीं मानी और अंग्रेजो से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गई।

1857 का युद्ध भारत में स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया प्रथम युद्ध था। भारत को स्वतंत्र कराने में रानी लक्ष्मीबाई के योगदान को कोई भुला नहीं सकता अंग्रेजो के विरुद्ध युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं की श्रेणी में रानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वप्रथम आता है। अंत समय में भी अंग्रेजों से लोहा लेने वाली इस वीरांगना के साहस और बलिदान को हमारा कोटि कोटि प्रणाम।

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