बुद्धिजीवी …. तकनीकी खराबी …

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बुद्धिजीवी …. तकनीकी खराबी …

कुछ बुद्धिजीवी,
देश के करीबी ।

आज मुझसे उलझ गए,
दिए जलने से पहले ही बुझ गए ।

बेवजह की हो गई बहस,
जैसे कुछ कर दिया हो तहस नहस ।

मुझसे रहा ना गया,
मैंने बस उन्हें यही कहा ।

तैयार हैं ना भाई साहब ?
नौ बजे नौ मिनट दीप जलाने बेहिसाब ।

इतना ही कहने की थी देर,
भाई साहब १२० की गति से दिल्ली से पहुंच गए अजमेर ।

लगा जैसे बोलके कर दिया मैंने कोई पाप,
सुनने को मिल गया बहुत अनाप शनाप ।

मारली जैसे मैंने अपने पैरों पे कुल्हाड़ी,
भाईसाहब ज़िद्दी इतने, जितनी उनकी गहरी दाढ़ी ।

कुछ सुनने को नहीं थे भाई साहब कटिबद्ध,
कुछ ज़्यादा बुद्धिमान, कुछ ज़्यादा अकलमंद ।

बेशक भाई साहब पायजामे में खड़े थे,
लगा जैसे महीनों से भरे पड़े थे ।

उनकी बातें चौंकाने वाली थी,
तर्कहीन, शर्मसार, दिल दुखाने वाली थी ।

हो गए मुझपर वो नाराज़,
जैसे उनका छीन लिया ताज ।

इनकी मुंह ज़ुबानी,
सुनिए इनकी कारस्तानी ।

आप भी भौचक्के हो जाएंगे,
सिर पकड़ेंगे, चक्कर खाएंगे ।

भाई साहब बोले :-

” नौ बजे, नौ मिनट का क्या है तर्क ?
इस नौटंकी से मुझको नहीं पड़ता फ़र्क ।

पहले ही निकला हुआ है देश का तेल,
लाइट बंद के चक्कर में ना हो जाए ग्रिड फेल ।

अपना ज्ञान, नसीहत, रखिए अपने पास,
अर्थ व्यवस्था का पहले ही हो रहा बहुत विनाश ।

इसमें कोई नहीं सिद्धांत,
क्या कोरोना ना होगा इसके उपरांत ?

इससे कुछ ना होगा भला,
कड़ी टूटने का नहीं ये सिलसिला ।

पहले ताली, थाली, अब दीवाली !
मन का वहम है ये ख़ाली ।

बेकार की बात, ना कोई फायदा,
मैं अपनाऊंगा बस मेरा कायदा ।

मेरी मानो तो आप भी मत करो,
इन फ़ालतू की बातों में मत पड़ो ।

क्या कर लेंगी मोमबत्तियां और दिए ?
छोड़िए इन बातों को, कुछ और कहिए ।

इनसे ना बीमारी भागी है, ना भागेगी,
याद आ रही दाल लददू दे ढाबे दी ।

कुछ नहीं होगा इनसे,
क़ैद हूं देखो १४ दिन से ।

पता नहीं क्या लगा दी ये लक्ष्मण रेखा ?
कई दिनों से नहीं देखी हेमा, रेखा !

बगैर सोचे समझे लगा दिया लॉक डाउन,
बंद कर दिया घर में, ना घूम सकता शहर, ना टाउन ।

कुछ तो दे देते मोहलत,
हम हो आते मूर्थल सोनीपत ।

समय बिताने के लिए बनाओ टिक टोक,
क्या मानना किसी का, जियो बेरोकटोक ।

किंचित ना करो सरकार पे विश्वास,
ना चिकित्सक, ना दवाई, सब कुछ बकवास ।

खाओ तुम घर बैठकर मेवा,
जवाबदेही बस सरकार का ठेका ।”

भाई साहब की और भी है गाथा,
ख़ैर छोड़िए, कि लंबी हो रही है कविता ।

मत ऊबिए,
प्रार्थना कि कविता में डूबिए ।

काफ़ी संदेश हैं,
अपना ही देश है ।

भाई साहब को कौन समझाए ?
उन जैसे अकलबंद समझदारी कहां से लाएं ?

कहते खुद को बुद्धिजीवी हैं,
मगर हरकतों से हिन्द फरेबी हैं ।

घुटनों में होती है अकल,
ना ज्ञान, मगर चारों ओर दखल ।

ना देते कोई सहायता,
फैलाते बख़ूबी रायता ।

मानते ख़ुद को हैं ख़ुदा,
पिटारा शिकायतों का हरदम खुला ।

होते विपरीत, चाहे कोई भी चीज़,
अभिमानी, क्रोधी क्योंकि कुंठित

होता इन्हें बस अधिकार से मतलब,
ज़िम्मेदारी आने पर हों गायब ।

सरकार से सब अपेक्षाएं,
ख़ुद ना अनुपालन, बस आदेश फरमाएं ।

ऐसे बहुत भरे पड़ें हैं आलोचक,
हर बात को जोड़ते हैं जो धर्म पर ।

बात की गहराई में जाइए,
ख़ुद ही अपने उत्तर पाइये ।

माना दिए जलाने से ना ख़त्म होगा कॉरॉना,
दीप मालाओं से जगमगा उठेगा कोना कोना ।

समझिए भाव, अहसास कीजिए अभिव्यक्ति,
असंख्य ऊर्जा का संचार होगा, होगी प्रचुर शक्ति ।

इस विभीषिका में सब होंगे साथ,
भाव से होंगे विश्व भर में संवाद ।

हर चीज़ सिद्धांत, धर्म से मत जोड़ो,
कुछ ऊपर उठो, संकीर्णता की बेड़ियों को तोड़ो ।

ये वक़्त नहीं राजनीति का,
ये वक़्त है आपसी प्रीति का ।

यहां उद्देश्य सकारात्मकता,
ना फैले छल अराजकता ।

एकजुटता से बढ़ती हिम्मत,
यह अमूल्य, ना है कोई कीमत ।

ये हमारे संस्कार हैं,
रोशनी ही व्यवहार है ।

एका होगी, मेल व संधि,
बहुत ताकतवर हाथ बने जब मुट्ठी ।

मिलकर जब हम साथ लड़ेंगे,
अच्छे कार्य में मिलकर डटेंगे ।

फ़िर काले बादल शीघ्र छटेंगे,
विषाणु औझल, रोग मिटेंगे ।

समझ सकता हूं आपके भाव,
देंगे मोदी भक्त का नाम ।

काम पहले, बाद में नाम,
पूरा विश्व उन्हें करता सलाम ।

ऐसा होना चाहिए संचालक,
दे मिसाल, आदर्श, उदाहरण ।

पूरे हिन्द की उनको चिंता,
हर जन स्वस्थ, सुरक्षित, रहे ज़िंदा ।

दे दिया उन्होंने राम बाण,
घर में रहो, गर बचानी जान ।

दृढ़ संकल्प, पूरा विश्वास,
देते गरीब अमीर को आस ।

सबको किया उन्होंने जागरुक,
सावधानी बरते हर एक नागरिक ।

मेरा भी कुछ बंता फर्ज़,
देश की खातिर चुकाऊं कर्ज़ ।

अगर मोदी जी हैं देश भक्त,
तो हां मैं मोदी भक्त ….
मैं मोदी भक्त ….

स्वरचित – अभिनव ✍🏻

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