मैं भस्म करूँ क्या रावण को

मैं भस्म करूँ क्या रावण को

मैं भस्म करूँ क्या रावण को !
मुझमें ख़ुद ढेरों रावण हैं,
रावण तो फ़िर भी ज्ञानी था,
मेरा तो मैला दामन है !

मारना है तो मारूं बुराइयों को,
भर लूँ रिश्तों की खाईयों को,
तब ही होगी फ़िर असली विजय,
जब दग़ा ना दूँ परछाइयों को l

लालच की दुकान लगाई है,
ईर्ष्या की फसल उगाई है,
एक बार जो देखूँ आईना मैं,
सब असलियत सामने आई है l

ऊपर से लगता खिला खिला,
अन्दर से एकदम पर खोखला,
मैं निर्णय ना ले पाता हूँ,
कि बुरा हूँ या फ़िर हूँ भला !

मेरे दस मुख ना हैं हुए मगर,
मैं क्रोधी बहुत हूँ मान्यवर,
थोड़ा समान, थोड़ा भिन्न हूँ,
मैं रूठ जाता हूँ अक्सर l

वो तो फ़िर भी एक राजा था,
अहंकार तभी आ जाता था,
मेरी कोई पदवी नहीं है पर,
मेरा क्यों कुरीतियों से नाता है!

जब हर जन प्रसन्न व हरा-भरा,
ना कोई ग़म, ना कोई गिला,
आचरण सुन्दर, ना निंदनीय ज़रा,
असली मायनों में तब दशहरा !

स्वरचित – अभिनव ✍🏻

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