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शिक्षा प्रदाता शिक्षक, समाज का मूर्तिकार होता है

इतिहास इस बात का साक्षी है कि, प्रत्येक समय में महान दार्शनिक ही महान शिक्षा शास्त्री ही हुये है। प्लूटो, सुकरात,लॉक कमेनियस,रुसो, फेबिल, गॉधी टेगौर,अरविन्द घोष, स्वामी विवेकानंद आदि। इन सभी दार्शनिकों ने अपने अपने दर्शन को क्रियात्मक और व्यवहारिक रुप देने के लिये शिक्षा का ही सहारा लिया। जैसे फ्रोबेल, शिक्षा को बालक के विकास की सीढी मानते है। शिक्षा के द्वारा ही उसे बोध होता है कि, वह प्रकृति का एक अंग है। शिक्षा जड नहीं अपितु एक चेतन तथा स्वैच्छिक द्विमुखी प्रक्रिया है। शि क्षा दर्शन का क्रियाशील पक्ष है।

शिक्षा प्रदाता शिक्षक, समाज का मूर्तिकार होता है

यह ध्रुव सत्य है कि, शिक्षक ही शिक्षित समाज का मूर्तिकार होता है। शिक्षक में ही शिक्षित समाज का प्रतिबिंब परिलक्षित होता है। भारत में ऐसे अनेक शिक्षाविद् हुये हैं जिन्होनंे भारतीय समाज को नई दिशा ओर उचाईयॉ दी है। इसमें डा. सर्वपलली राधाकृष्णन का नाम सर्वोपरि है। जिनके जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाता है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि, प्रत्येक समय में महान दार्शनिक ही महान शिक्षा शास्त्री ही हुये है। प्लूटो, सुकरात,लॉक कमेनियस,रुसो, फेबिल, गॉधी टेगौर,अरविन्द घोष, स्वामी विवेकानंद आदि। इन सभी दार्शनिकों ने अपने अपने दर्शन को क्रियात्मक और व्यवहारिक रुप देने के लिये शिक्षा का ही सहारा लिया। जैसे फ्रोबेल, शिक्षा को बालक के विकास की सीढी मानते है। शिक्षा के द्वारा ही उसे बोध होता है कि, वह प्रकृति का एक अंग है। शिक्षा जड नहीं अपितु एक चेतन तथा स्वैच्छिक द्विमुखी प्रक्रिया है। शि क्षा दर्शन का क्रियाशील पक्ष है। यही दार्शनिक चिन्तन का एक सक्रिय पहलू है। ‘‘ वास्तविक शिक्षा का संचालन वास्तविक दर्शन ही कर सकता है।

शिक्षा का एकमा़त्ऱ उद्धेश्य बालक की शक्तियों की विकास है। यह विकास किस प्रकार से होगा इसके लिये कोई सामान्य सिद्धान्त निश्चित नहीं किया जा सकता, क्योंकि भिन्न भिन्न रुचियों और योग्यताओं के बालक में विकास भिन्न भिन्न प्रकार से होता है।शिक्षक बालक की योग्यताओं और क्षमताओं पर दृष्टि रखते हुये उसे संवारता है। फलवादी शिक्षा का उद्येश्य जनतंत्रीय मूल्यों की स्थापना है। शिक्षा के द्वारा हम ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैंजिसमें व्यक्ति में कोई भेद न हो, सभी पूर्ण स्वतंत्रता और सहयोग से काम करें। प्रत्येक मनुष्य को अपनी स्वाभाविक प्रवृतियों , आकांक्षाओं और इच्छाओं को विकसित करने का अवसर मिले।

विद्यालय समाज का लघु रुप है वह समाज को बदलती हुई आवश्यकताओं को प्रतिबिंबित करता है।इसलिये उसे समाज की आवश्यकताओं में परिवर्तन के साथ- साथ बदलते रहना चाहिये। फलवादी शिक्षा में शिक्षक का स्थान महत्वपूर्ण है।वह समाज का सेवक है। उसे विद्यालय में एसा वातावरण निर्मित करना होता है, जिसमें पलकर बालक के सामाजिक व्यक्तित्व का विकास हो सके।

प्लूटो शिक्षा को लौकिक प्रणाली का आवश्यक कार्य समझते थे वे दो प्रकार के मन में विश्वास करते थे। एक प्रयोगसिद्ध तथा दूसरा चेतन। प्रयोग सिद्ध मन अंश से प्रारंभ होकर सम्पूर्णं की ओर बढता है। उसने सदा साध्य को साधन से बढा तथा सम्पूर्ण को अंश से उपर माना। इसीलिये उसने प्रतिपादित किया है कि, शिक्षा से उसका अभिप्राय उस प्रशिक्षण से है जो कि उचित आदतों के द्वारा बालकों की नैसर्गिक मूल प्रवृतियों के गुण का का विकास करने के लिये दिया जाता है।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार क्या केवल वही व्यक्ति शिक्षित है, जिसने कुछ परीक्षाएं पास करली हों। वास्तविकता यह है कि, जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिये तैयार नहीं कर सकती , जो चरित्र निर्माण नहीं कर सकती , जो समाज सेवा की भावना को विकसित नहीं कर सकती उस शिक्षा से कोई लाभ नहीं है। हमें उस शिक्षा की जरुरत है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है।, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती ह बुद्धि विकसित होती है। पुस्तकीय ज्ञान इतना महत्वपूर्ण नहीं है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली संभवतः इनमें से एक भी उद्ेश्य को पूरा नहीं करती। वर्तमान शिक्षा प्रणाली पूरी तरह व्यावसायिक हो चुकी है। आजकल यह माना जा रहा है कि, शिक्षा जितनी मॅहगी होगी उतनी ही अच्छी होगी लेकिन यह अवधारणा कदापि उचित नहीं कही जा सकती। शिक्षा अैोर शिक्षक की व्यावसायिकता ने शिक्षा को मूल उद्येश्य से ही भटका दिया है। लेकिन फिर भी ऐसे सेंकडों शिक्षक है जिन्होने ग्रामीण परिवेश के बच्चों की बौद्धिक और मानसिक क्षमताओं को तराशा है। बिहार इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। जहॉ से सेंकडों गरीब बच्चे राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपना श्रेष्ठ दे रहे है। इसका श्रेय परदे के पीछे इन्हें तराशने वाले शिक्षकों को जाता है। पहले शिक्षा दान श्रेष्ठतम माना जाता था लेकिन अब इसे व्यापार बनाने वाले कतिपय शिक्षकों ने ‘शिक्षक दिवस की मूल भावता को आहत किया है।

ऐसे अनेक उदाहरण है जहॉ शिक्षक अपने घर पर आवश्यक मॅहगी -मॅहगी वस्तुओं को देने के लिये बच्चों पर दबाव बनाते है। जबकि शिक्षक दिवस अपने शिक्षा प्रदाता के प्रति आभार धन्यवाद तथा कृतज्ञता ज्ञापित करने तथा उनके द्वारा बताये गये मार्ग पर चलने का ‘‘संकल्प दिवस’’ है। शिक्षा को लाभ का धंधा मानने वाले लोगों के कारण ही वर्तमान शिक्षा अपना मूल स्वरुप खोती जा रही है। जिसमें बडों के प्रति यहॉ तक के प्रति शिक्षक के प्रति सम्मान, आचरण की शुद्धता और शुचिता के लिये स्थान सिकुडता जा रहा है। अंक आधारित शिक्षा ने सभी मूल्यों को कहीं पीछे छोड दिया है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली शिक्षित होने का दंभ ढोने वाले लोगों का उत्पादन कर रही है। और उत्पादन के नाम पर प्रतिपर्ष लाखों युवकों को बिना किसी मार्गदर्शन के उनके भाग्य भरोसे छोड रही है। जबकि शिक्षा का अर्थ होता है, योग्य नागरिक बनाना जो जीवन की वास्तविक कठिनाईयों से स्वॅय मुकाबाला कर सके। इसीलिये अनेक छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में अपने अभिभावकों और स्वॅय की अपेक्षाओं के अनुरुप नहीं कर पाने के कारण आत्महत्या कर रहे है।

एसी स्थिति में एक शिक्षक ही अपने छात्रों को जीवन की वास्वविकताओं से परिचित करा कर उन्हें उनसे शिक्षा लेने के लिये प्रेरित करता है। शिक्षक जब अपना सर्वश्रेष्ठ देकर उन्हें सॅवारता है और वह छात्र भी अपना श्रेष्ठ देता है तो उस शिक्षक की खुशी की कल्पना नहीं की जा सकती। इसीलिये कहा गया है कि, शिक्षा प्रदाता शिक्षक , शिक्षित समाज का मूूर्तिकार होता है।

शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षा प्रदाताओं को शुभकामनाएं।


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