संतुष्टि …अंतर्मन की पुष्टि …

संतुष्टि …अंतर्मन की पुष्टि … लिखते लिखते ऊब गया हूँ,ना जाने क्यूँ यूं डूब गया ?चलते चलते रुक गया हूँ,अपने आप ही झुक गया हूँ । लिखने से क्या होगा हासिल,क्या जाएगी मंज़िल मिल ?आए सवाल ये रात और दिन,क्या होगा सपना मुमकिन ? व्हाट्स ऐप

‘काश’ बनाम ‘आ-काश”

'काश' बनाम 'आ-काश" काश मेरी कोई बहन ही होती !साथ में हँसती, साथ में रोती । काश मेरा कोई भाई होता !राज़दार चाहे बड़ा या छोटा । काश मेरे भी रिश्ते होते !मेरे साथ फ़िर फ़रिश्ते होते । काश मेरे भी दोस्त होते !आपस में रोज़ न्योते होते ।

रोहित सरदाना – अश्रुपूर्ण भावभीनी श्रद्धांजलि अभिनव

रोहित सरदाना,शख़्स जाना माना,कहीं चला गया,पता नहीं कहां ! था बड़ा सटीक,छवि बेहद निर्भीक,देता था सीख,ना दहाड़, ना चीख़ । देखे सुने बिन,ना कहता था,जो कहता था,रस बहता था । स्पष्ट वक्ता था,सब परखता था,जब हँसता था,बड़ा जचता था । गज़ब था

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 4

बिन मतलब,गर तेरी तलब,मानो मिल गया रब,मिल गया रब । अभिनव कुमार आँखों से बात,कुछ अलग ही बात,तारों की रात,अनकहे जज़्बात ।अभिनव कुमार दोस्ती मैं सच्ची निभा ना सका,दिल में तुम्हारे जगह पा ना सका,झूठ ना कहके भी झूठा कहलाया,ग़लती थी बस यही

विवेक पे निर्भर … तो रहते हैं देव

विवेक पे निर्भर … तो रहते हैं देव जिस काम में डालूँ हाथ,वो होता यकीकन बर्बाद,छिन्न भिन्न होते जज़्बात,डगमगा जाता आत्मविश्वास । जितनी फूँकूं काम में जान,आधी फ़सल भी ना तैयार,समय निवेश पानी सा बहाव,हाथ में कुछ ना आए जनाब । मार्ग गलत

होली – कविता

खुशियों की रंगोली, 🌈समां में करुणा घोली,सारी नफ़रत धोली । मिटे गिले व शिकवे,चार चांद लगे शब पे,🌙🌙🌙🌙दुश्मन गए हैं छिप से, 🥵दोस्त मिले हैं दिल से । 💓 अनेकता में एकता, ✨नभ

भगत, राज, सुखदेव … जिस्म अलग, रूह मगर एक

भगत, राज, सुखदेव … जिस्म अलग, रूह मगर एक .. तेईस मार्च,को गिरी थी गाज,था भगत को खोया,भस्म हिन्द का ताज । एक सच्चा सपूत,ईश्वर का दूत,उसकी कुर्बानी,कोई सके ना भूल । था ख़ुद को भूला,सदा देश ही सूझा,उस जैसा ना कोई,बस वतन की पूजा ।

अब तो ….. (कविता)

अब तो …..रिश्तों में मिलावट है,मुस्कान बस बनावट है,आहट की ना चाहत है,ख़ुद से ही बग़ावत है । ना जाने …क्यूँ बदल गए इतने हैं हम ?कहाँ गए अश्क़ वो थे जो नम ?क्यूँ मतलबी हो गए हम हरदम ?क्यूँ पैर नहीं अब जाते हैं थम ? किस बात की दौड़ ?क्यूँ

ख़ुद को दिया धोखा …

ख़ुद को दिया धोखा … इस गणतंत्र दिवस,किसान वाकई बेबस ?लिया देश को डस,रहा विश्व है हँस ! शर्मसार हुई दिल्ली,उड़ी बहुत है खिल्ली,क्या यही आज़ादी ?की बहुत बर्बादी । तिरंगे की मर्यादा,सीना छलनी, है काटा,देश टुकड़ों में बांटा,नम आज विधाता ।

26 नवम्बर की स्याह रात ..

26 नवम्बर की स्याह रात .. (शहीदों को श्रद्धांजलि, दिल से अर्पित पुष्पांजलि,जिन्होने दी जान, कि रोशन रहे गुलिस्ताँ,है उनको नमन, झुकाए शीश धरा गगन ।) वो 26 नवम्बर,काला एक नंबर ।शर्मसार था अम्बर,सोया था दिगंबर । मुंबई थी दहली,दहशत थी

परमवीर चक्र …वीरों का पर्व

परमवीर चक्र …वीरों का पर्व … परमवीर चक्र,जब होता ज़िक्र,सिर शान से ऊंचा,होता है फ़ख्र । 4 इक्कीस जांबाज़,को मिला ये ताज,हिन्द भाव विभोर,रक्खी जो लाज । 8 उच्च सैन्य सम्मान,त्याग व बलिदान,शूरवीरता शौर्य,वीर को

सरदार पटेल की जीवनी

सरदार पटेल की जीवनी को रचना में पिरोने का प्रयास :- सरदार पटेल,जैसे दिये में तेल,वे तेज़ गुलेल,अंग्रेज़ किए ढेर । 4 थे बहुत ही नेक,सदियों में एक,कुछ अलग चमक,था जुनून सनक । 8 गुजरात में जन्म,बचपन से ही दक्ष,थे सदैव निष्पक्ष,सटीक

दुल्हन थी क्या दीवाली ?

दुल्हन थी क्या दीवाली ? (स्वरचित - अभिनव✍) दीपावली जब बीत जाती है,एक मायूसी सी छा जाती है । रौनक ओझल हो जाती है,महफ़िल बेमन सो जाती है । सबकुछ ठहर सा जाता है,अकेलापन खाता है सताता है । दुल्हन जैसी थी सजी दीवाली,आज मगर

इस बार दिवाली ………

इस बार दिवाली ……… इस बार दीवाली कुछ अलग है,कर रही हमें ये सजग है,,दे रही उम्मीदों की झलक है,,,ज़िंदा रहने की सिर्फ़ ललक है । इस बार सफ़ाई नहीं प्राथमिकता,पकवानों में भी मन नहीं लगता,,वेशभूषा की और अब ध्यान नहीं टिकता,,,गहनों का भी

छोटी दीपावली

छोटी दीपावली,है उतावली,,रोशन होने को,,,ख़ुद में खोने को । करे है इंतज़ार,उत्सुक बेक़रार,,बड़ी दीपावली का,,,बहना दिल वाली का । त्योहार ये दिलों का,जलते हुए दियों का,,आओ मनाएं साथ हम,,,दूर भगाएं सारा तम ।

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 3

सीधी बातों को भी उल्टा आंका,गोले बारूदों से मुझको दागा,अपने अंदर बिल्कुल ना झाँका,कुछ था नज़रिया, कुछ और ही भांपा !अभिनव कुमार जैसे ही साझा की अपनी किताब,बदले में आलोचना का मिला ख़िताब,हक़ीक़त में बदलने चला था ख़्वाब,मुझपे ही तोहमत लगी

ये शाम भी ढल जाएगी

ये शाम भी ढल जाएगी … अपने से ज़्यादा,हो दूजे का ध्यान,,यही बस करना,,,है सबको श्रीमान । कोशिश ना बने,कोई किसी का कैरियर,,सब्र का इम्तिहान,,,सबसे बढ़िया घर । तप का मौका,कर दिखाएं सब,,ख़ुद भी रहें स्वस्थ,,,औरों को भी समझाएं हम । जाने

दशहरा – कविता

दशहरा(स्वरचित - अभिनव ✍️) सूख शांति का पर्व,हमें इस पे गर्व । मंगलमय वेला,आई रौनक मेला । हुआ मद का अंत,प्रेम गहन अनंत । पूरा हुआ बनवास,हुआ कुरीतियों का नाश । हर पल संयम,ना करुणा कम । करे काम नेक,और रखा विवेक
error: Content is protected !!