दोस्ती – तेरी मेरी गोष्ठी …

दोस्ती - तेरी मेरी गोष्ठी … दोस्ती,अक्सर है मुझसे पूछती,कानों में मेरे गूंजती,पहेलियाँ ये मुझसे बुझती । क्या मेरा होता खास दिवस ?साल में एक दिन सकूं क्या सज ?क्या मेरी औकात सिर्फ़ दो गज ?क्या मात्र औपचारिकता हूँ अब बस ? क्या नाम

ऐ हवस, तू बस भी कर …

ऐ हवस, तू बस भी कर … ऐ हवस,अब कर भी बस,कुछ खा तरस,और ढूंढ तू शख्स । मैं हूँ बेबस,ना बचा अब रस,क्यूँ रही है हस ?तूने लिया है डस । तेरे सिर हैं दस,तेरा दुस्साहस,मैं गया हूँ फंस,बना तेरा दास । ना तू टस से मस,है जस की तस,तू झूठा

ईद

ईद ईद,मधुर संगीत,भाई चारे का प्रतीक,सौहार्द की उम्मीद । संगम व्यास व सिंध,एकता की ईंट,अहिंसा की जीत,ना शक किंचित । दोस्ती निश्चित,एक दूजे का हित,तम जाए है बीत,सबकुछ ही विनीत । बड़ी पुरानी रीत,पूर्वजों की सीख,बदले रोज़ तारीख़,बन

आज़ादी की क़ीमत

आज़ादी की क़ीमत अगस्त का मास,आती है याद,शूरवीरों की,तप की तस्वीरों की । जागता है जज़्बा,तैयार शहर क़स्बा,सनक कुछ करने की,देश पे मर मिटने की । उमड़ता है जुनून,नशा जोश धुन,देश लगे सर्वप्रथम,इसमें जैसे जाते रम । खाते हैं सौगंध,माटी की

रफ़ाल – बेमिसाल

रफ़ाल - बेमिसाल रफ़ाल,तूफानी चाल,दुश्मन बेहाल,जी का जंजाल । करे तेज़ प्रहार,माने नहीं हार,बेहद असरदार,सिर पे ये सवार । आधुनिक विज्ञान,ये लड़ाकू विमान,भारत की जान,थामी है कमान । ना निशाना चुके,गहरे मंसूबे,शत्रू पे टूटे,सबकुछ ये

मेरा सैनिक, मेरी जीत

मेरा सैनिक, मेरी जीत … आज कारगिल दिवस,हूँ मैं नतमस्तक,दुश्मन हो जब तक,मेरा वीर सजग । इसकी कुर्बानी,छोड़ी ज़िन्दगानी,कीमत जो जानी,सार्थक है कहानी । वो डटा रहा,ना कभी झुका,वो था भूखा,दुश्मन को भुना । ना पीछे हटा,जज़्बा ना

बड़े – कविता

बड़े बरगद के जैसे ये पेड़,रक्षक हैं जैसे कि शेर,तम को करें बिल्कुल ही ढेर,ये जल्दी, मैं हूँ बस देर । ईश के ये अवतार,इनसे ही है हर बहार,तेज़ इनकी हर धार,मेरे जीवन का ये सार । इनके अहसान अनगिनत,मैं ज़मीं, ये मेरी छत,मेरी हर ये सरहद,मैं

वास्तव में बड़े बनें – कविता

वास्तव में बड़े बनें… घर के जो हों बड़े,आपस में गर ये लड़ें,ज़िद पे ओर जाएं अड़े,फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ? मिट्टी के हैं ये भी घड़े,मद में जो होयें खड़े,बिखरे इसलिए हैं ये पड़े,फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ? देख दूजा गर जो डरे,सहमे

मज़दूर नहीं, वो है मजबूर

मज़दूर नहीं, वो है मजबूर मज़दूर यानि श्रमिक,परिश्रम का प्रतीक,मेहनत का वैज्ञानिक,अनथक दौड़ता जीव । चौबीसों घंटे मुशक्कत,करता कर्म निष्कपट,चले जाता धर्मपथ,अद्भुत कला महारत । विकास इसीके कारण,हर समस्या का निवारण,तन मन करे है

ज़िंदगी – कविता अभिनव कुमार

ज़िंदगी ज़िंदगी एक बोझ है,आज के इंसान की यही खोज है । अरे ज़िंदगी तो एक बहार है,जीना आए तो प्यार, नहीं तो पहाड़ है । ज़िंदगी तो एक गीत है,उसे जीना ही एक जीत है । जो इसे ना जी सके, उसपर धिक्कार है,डर – डरकर जो जीता है, उसकी ज़िंदगी का

कर्मवीर – कविता अभिनव कुमार

कर्मवीर कर्मवीर,यानि कर्मशील,कर्मठता पुरुषार्थ सहित,हिन्द हुआ इनपर गर्वित । (४) ये जैसे कि साहसी योद्धा,जीवनदायी निर्मल पौधा,ये खिलाड़ी, हम सब श्रोता,उत्तरदायित्व से ना समझोता । (८) फ़ौजी रहता सरहद पर,ये

ऋषि जी की फिल्में…बसती हर दिल में…

ऋषि जी की फिल्में…बसती हर दिल में… जितनी करी उन्होंने फिल्में,सारी उड़ेली इस रचना में । फिल्मों के सिवा कुछ ना इसमें,पाँच दशक की सारी फिल्में । किरदार बख़ूबी साँचे में ढाला,अर्पित श्रद्धांजलि इस माध्यम द्वारा । फिल्मों का इतना

ये ५६ इंच का सीना है

ये ५६ इंच का सीना है ये ५६ इंच का सीना है, कोई ऐसी वैसी ढाल नहीं…ये मोदी जी का पसीना है, मेहनत की उनकी मिसाल नहीं… दुखियों से दुख को छीना है, दिल साफ है बिल्कुल चाल नहीं…ये हिन्द देश का नगीना हैं, इनके बिन गलती दाल नहीं । जो कहते

कहूँ ऋषि कपूर या कोहिनूर

कहूँ ऋषि कपूर,या कोहिनूरदोनों समरूप,बेहद ही खूब । 4 किया नाम सार्थक,तप था अंत तक,सब अपने बलबूते पर,चूम लिया था अंबर । 8 चॉकलेटी छवि,प्यार की पदवी,था जैसे रवि,आकर्षित सभी । 12 निर्माता, निर्देशक,अभिनेता आकर्षक,चलता था अनथक,होते

एकांत – कविता

एकांत जाने कैसे लोग रहते हैं भीड़ में,हमें तो तन्हाई पसंद आई है । अकेले बैठ के अपने आप से बातें करना,रोज़ की आदत हो आई है । जो भरते थे दम अपनी दोस्ती का,साथ उठने बैठने का,आज उनमें भी ठन आई है । सच कहता हूं एकांत बहुत अच्छा है

क्या करूं, क्या ना करूं ?

क्या करूं, क्या ना करूं ? मैं हूं मजबूर, हूं खुशी से दूर, लगी किसकी नज़र ? मेरा क्या कसूर ? ४ हूं बिल्कुल बेबस, ना सकता हंस, फैंका किसने जाल ? मैं गया हूं फंस । ८ बीच में हूं लटका, नज़रों में खटका, कुश्ती

शिकारा फिल्म – अभिनव कुमार

शिकारा चलचित्र शिकारा,है पानी खारा,किस और इशारा ?निर्देशक द्वारा ! जो दर्द था सारा,उसे कहां उतारा ?जो चड़ा था पारा,दिया कुछ और नारा । ना था हत्यारा,ना कोई अंगारा,बस नायक सितारा,उसको ही निखारा ! लहू लाल चौबारा,ज़िंदा था मारा,ना

इरफ़ान ख़ान, हर दिल की जान

इरफ़ान ख़ान, हर दिल की जान इरफ़ान ख़ान,हर दिल की जान,एक अलग पहचान,एक अलग पहचान । ४ १९६७ में जन्में साहबज़ादेबुलंद व नेक इरादे,जो कहते, वो निभाते वादे,अमल में लाते, ना सिर्फ बातें । ८ जन्म राजस्थान जयपुर,हरदम विवादों से दूरतपकर बना

मेरी ही ख़ातिर

मेरी ही ख़ातिर सिर्फ़ मेरी ख़ातिर ,ये सब हैं हाज़िर,ये हिन्द के नायक,कुछ करें ना ज़ाहिर । 4 बिन खुद की परवाह,मेरी करें रक्षा,दें सीख व शिक्षा,ये रब का दर्जा । 8 कल ना थी कद्र,अब होता फक्र,गोल घूमा चक्र,ये भले व भद्र । 12 ये जैसे

मैं आपका कश्मीर :-

मैं आपका कश्मीर :- आज मैं आज़ाद हूं ३७० की बेड़ियों से,आज मैं आज़ाद हूं अलगाववादी भेड़ियों से… दशकों से ही मैं था आतुर मिलने हिन्द महान से,मात-पिता से बिछड़ा हुआ था बिछड़ा अपनी जान से… आज ही सही मायनों में मेरी पहली आज़ादी है,आज
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