गुरु वंदन

गुरु वंदन … गुरु शिष्य …मनोरम दृश्य … मुबारक हो आपको गुरु दिवस …शिष्यों में गए आप हो बस … आपके तप का मोल नहीं है …गुरु बिन शिष्य का रोल नहीं है … नमन है ऐसे रिश्ते को …गुरु नामक फरिश्ते को … गुरु ही देवे अच्छी सीख …संस्कार

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 7

सब कुछ है, मगर कुछ नहीं,जीवन में शांति बिल्कुल नहीं,खरीदने के लिए चाहे धन सही,ना है संतोष, व मूल नहीं lअभिनव कुमार रोने के हम आदि हैं,क्या करें - 'बेहद जज़्बाती हैं' !आपने ये कहके ठुकरा दिया,कि 'हम तो निराशावादी हैं' !अभिनव कुमार

मेरा कीमती उपहार

मेरा कीमती उपहार …. हाय ये कैसा भौतिकवादी युग !भोग, लालसा, धन की बस भूख,क्या चाहिए, कुछ पता नहीं,सबकुछ सम्मुख, फ़िर भी दुख । केवल दिखावे की है होड़,दौड़, दौड़, बस अंधी दौड़,रिश्ते ताक रहें हैं मुँह,अपने दिए अब पीछे छोड़ । कुछ ओर ही चाहे

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 6

ख़ुद को खुदा, तुझको जुदा है माना मैंने,सच कहूँ - ख़ुद को बिल्कुल भी ना जाना मैंने !एक अरसे बाद आज मेरी आँख खुली,केवल ठुकराया बस, ना सीखा अपनाना मैंने । ✍🏻 अभिनव कुमार मान ही गए हम तुम्हें जनाब,मंसूबों को अपने दिया

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 5

मुझे ज़िन्दगी तुझसे शिकायतें बहुत हैं,तुझे दी मैंने हरपल हिदायतें भी बहुत हैं,आज निकला जब मैं सड़क पर,तब जाना कि तेरी मुझ पर इनायतें बहुत हैं । अभिनव कुमार तुमने बनानी चाही हमसे,हम बना ना पाए,,ग़ैरों की तो बात दूर,मेरे पास ना साए ।

आसान है क्या …

आसान है क्या … आसान है क्या ?सोचो तो सब कुछ !सोचो तो कुछ भी नहीं ! चिंतन पर,सबकुछ ही निर्भर,क्या सरल, क्या है विकट ! मन:स्थिति,लिखती है विधि,बनाए बिगाड़े हर घड़ी । श्वास लेना,आसान है क्या ?कोशिश कर, सब कुछ होगा । आत्मबोध -

अभिनव कुमार छद्म रचनाएँ – पर्यावरण

जीव जन्तु,जैसे शिव शंभू,बचाते पर्यावरण,ना किन्तु परन्तु ।अभिनव कुमार दो हाथ जब मिल जाएं,पशु, पेड़ फ़िर खिलखिलाएं,वातावरण जीवित हो जाए,आओ धरा बचाएं । अभिनव कुमार गागर में साग़र,सबकुछ ही उजागर,इन्सां, पेड़-पौधे, जानवर,मिलकर बनाएं जीवंत

कलम – (कविता) अभिनव कुमार

कलम ✍🏻 छोटी बहुत ये दिखती है, प्रबल मग़र ये लिखती है,बड़ों बड़ों को पार लगादे, इससे उनकी खिजती है । ये हालात लिखती है, शीशे जैसी दिखती है,जैसी बाहर वैसी अंदर, सच से इसकी निभती है । उसूलों पर ही चलती है, बिल्कुल भी ना

मैं सही या ग़लत ?

मैं सही या ग़लत ? मैं ग़लत, मैं ग़लत,मैं ग़लत, मैं ही ग़लत । कहां करूं बोलो दस्तख़त !अब पार हुई है हर हद । कल तक थी तुम्हें मेरी लत,आज हूँ ख़ामख़ा कमबख़्त । मैं हूँ झूठ, तुम ही हो सच,नहीं चाहता मैं जाना बच । तुम थे ढाल, तुम मेरे

कान्हा…धरा पर जल्दी आना

कान्हा…धरा पर जल्दी आना द्वापर युग,अवतरित युगपुरूष,कान्हा जन्म,माह भाद्रपद ।। ८ देवकी से उत्पन्न,अवतार विष्णु भगवन,यशोदा माँ ने पाला,गोकुल नंद लाला ।। १३ अद्भुत बाल्यकाल,शक्तियाँ अपार,राक्षसों का वध,सटीक उद्देश्य पर ।। १० अदम्य

असमंजस – अब बस …

असमंजस - अब बस … तुम भी सही,मैं भी सही,ग़लत बात फ़िर,किसने कही ? दिल की बात,दिल ही में रही,मैं हूँ वही,मैं था वही । ताने बाने बस,बुनते रहे,सिर्फ कमियां ही,चुनते रहे । रही सही कसर,गलतफहमियां खा गईं,जाने कैसी !रिश्तेदारी निभा गईं ।

फ़र्क देखिए (1) बनाम (2) में ज़मीन आसमान का

फ़र्क देखिए (1) बनाम (2) में ज़मीन आसमान का :- (1) "चलो आज मुस्कुराते हैं" - तालिबानी गुनगुनाते हैं,दहशत बड़ी फैलाते हैं, निर्दोष मारे जाते हैं,औरतों पे ज़ुल्म ढाते हैं, आबरू भी ढहाते हैं,वे कल को भूल जाते हैं, बस

अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से कहे …

अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से कहे … सोचता था मैं पहले कि तुम,मेरे रक्षक, मुझको घेरे हो,आज मग़र अहसास हुआ कि,तुम तो निकले सौतेले हो । दहशत, दर्द, ज़ुल्म, आतंक,ना जाने क्या क्या दे रहे हो,पाल पोस तुम्हें बड़ा किया,तुम बने मेरे ही लुटेरे हो ।

कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो !

कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो ! … कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो !तुम मेरे नहीं, पर मेरे हो,ज़रूरी नहीं कि बन्धन हों, फ़ेरे हों,तन जुदा हैं, पर मन में तो ठहरे हो,रूहें तृप्त जब रिश्ते गहरे हों ।

जय हिंद …

जय हिंद … सैनिक है बैठा सीमा पर,सिर्फ़ तेरी मेरी ख़ातिर,मैं और तू तो हैं घर पर,वो जैसे एक मुसाफ़िर । अपनी तो जान बचाने की,ना उसको कोई है परवाह,एक मैं और तू ही लड़ते हैं,क्या मंदिर, मस्जिद, दरगाह ! सबकुछ तो उसने त्यागा है,देशभक्ति ना

स्वतंत्रता – वरदान या अभिशाप

स्वतंत्रता - वरदान या अभिशाप … गुमसुम नादान,अचंभित हैरान,बांहें फैलाए,खड़ा हर इंसान । आया यकायक याद,हुई आज आबाद,है मेरा दिवस,मेरी वर्षगांठ । आज़ादी इतराई,थोड़ा मुस्काई,थी चेहरे पे,रंगत जो छाई । वो हिन्द की जान,उसका ईमान,छीनने से

भारत का शेर – नीरज चोपड़ा

भारत का शेर … नीरज चोपड़ा,गाँव का छोकरा,किया तिरंगा ऊंचा,हिन्द खुशी से रो पड़ा । जीता दिल,प्रदर्शन उत्कृष्ट,हासिल स्वर्ण पदक,बदली पुरानी रीत । सोने की चिड़िया,के माथे पे बिंदिया,याद करेंगी,शतकों तक पीढ़ियां । उठाया भाला,बड़ी दूर

संतुष्टि …अंतर्मन की पुष्टि …

संतुष्टि …अंतर्मन की पुष्टि … लिखते लिखते ऊब गया हूँ,ना जाने क्यूँ यूं डूब गया ?चलते चलते रुक गया हूँ,अपने आप ही झुक गया हूँ । लिखने से क्या होगा हासिल,क्या जाएगी मंज़िल मिल ?आए सवाल ये रात और दिन,क्या होगा सपना मुमकिन ? व्हाट्स ऐप

‘काश’ बनाम ‘आ-काश”

'काश' बनाम 'आ-काश" काश मेरी कोई बहन ही होती !साथ में हँसती, साथ में रोती । काश मेरा कोई भाई होता !राज़दार चाहे बड़ा या छोटा । काश मेरे भी रिश्ते होते !मेरे साथ फ़िर फ़रिश्ते होते । काश मेरे भी दोस्त होते !आपस में रोज़ न्योते होते ।
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