सपने महज़ सपने ही रह गए

सपने महज़ सपने ही रह गए एक सपना आया गाँव से,खड़ा होने अपने पाँव पे,भरे जोश और चाव से,ज़मीं से जुड़ा बिन भाव के । अकेला आया वो मायानगरी,संग महनत की लाया गठरी,अजब ऊर्जा बड़ी तेज़ गति,हौंसले मज़बूत, निश्चित प्रगति । उसे विश्वास, होगा वो

उसका आख़िर था क्या कसूर ?

उसका आख़िर था क्या कसूर ? बड़ी अजब कहानी है,पग पग पे बेईमानी है,रिया है, पिठानी है,माहिर है, सयानी है । नीरज है, केशव है,नौटंकी में पूरा दम है,दीपेश भी कहाँ कम है !अच्छा खासा अनुभव है । शोविक रजत भी हैं किरदार,गांजा चरस चले

अंतर ज़मीन आसमान का

अंतर ज़मीन आसमान का एक सोया रहा दो महीने,दूजे ने कसी कमर दो दिन में । एक ने किया बस वक़्त बर्बाद,दूजे ने एक किए दिन और रात । एक ने बहुत फ़ैलाया रायता,दूजा अपनाए कानून कायदा । पहले ने काटी बस घाँस,दूजा सख़्त कड़ी पूछताछ । एक बना

गणपति बप्पा मौर्या

गणपति बप्पा मौर्या एकदंत गणपति,सीखों की समृद्धि,अपनालो तो सिद्धि,बल व यश में वृद्धि । सब देवों में प्रथम,दिल में रहते हरदम,मुरीद हर कोई जन,आराध्य पूज्य गजानंद । ना धर्म जाति ना मज़हब,ना कोई सीमा या सरहद,इन सबसे परे व अलग,ना भेदभाव

सुशांत की आत्मकथा

सुशांत की आत्मकथा किसपर करूं विश्वास ?किसपे रखूं आस ? दोस्त ने दगा दिया,दिलरुबा ने ख़ून पिया । दोनों के थे कितने भेस !थाली में ही कर दिए छेद । ऐश की, रहे साथ साथ,और करा विश्वासघात । देख रहा मैं ऊपर से,सारे सबूत हैं मिटा दिए ।

आज़ादी की आपबीती

आज़ादी की आपबीती 'आज़ादी' अब ७३ की हो गई,अपनों की राह तकते हुए थककर सो गई,माना थोड़ी सी बेचारी बूढ़ी हो गई,अभी तो मिली थी, कहीं फ़िर तो नहीं खो गई ! 4 अपनी किस्मत को कोस रही थी,मन को अपने मसोस रही थी,ख़ुद को ख़ुद में खोज रही थी,दिल पे रक्खे

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ

बजाए कि चीखें या झपटें,बेहतर हो सब सुनें व समझें ।इंसान हैं, इंसानियत निभाएं,प्यार का सबको पाठ पढ़ाएं ।अभिनव कुमार - Aug 2020 इन खुशियों के पीछे गहरी उदासी है,ऐसे ही नहीं दास्ताँ लिखी जाती है ।अभिनव कुमार - Aug 2020 मैं जिसको

कृष्ण चरित्र माला

|| कृष्ण चरित्र माला || कुशल राजनीतिज्ञ,सब ही कृतज्ञ । कूटनीति में दक्ष,सदैव निष्पक्ष । तपस्वी, बलवान,दानी, दयावान । कर्तव्यशील, कुशल,धैर्यवान हरपल । प्रजापालक, पराक्रमी,राजधर्म सर्वोपरि । संयमी, शीलवान,सदाचारी,

आऊंगा फ़िर, पाप करने ख़तम …

आऊंगा फ़िर, पाप करने ख़तम … है माखन चोर,मेरा नन्द किशोर,जैसे नाचे मोर,उसका ही दौर । नटखट हैं कान्हा,सबको है थामा,हर युग ने माना,ब्रज की वो आभा । आज उनका जन्म,पर्वों का पर्व,भारत को गर्व,ये सच्चा धर्म । आस्था एवं श्रद्धा,उल्लास से

मैं एक हिन्दू हूँ,

मैं एक हिन्दू हूँ, मैं एक हिन्दू हूँ,रावी हूँ और सिंधू हूँ,महत्वपूर्ण एक बिन्दु हूँ,दे चांदनी, वो इंदु हूँ । ना बिल्कुल मैं हूँ भयभीत,ना ही हूँ असुरक्षित,मेरा धर्म मेरी जीत,वो चाहे सबका हित । किसी पर कभी ना है थोपे,किसी का रास्ता

फ़िर आए राम …

फ़िर आए राम … अपने अवध में,फिर आए राम,,इस कलयुग में,घर आए राम । पाप ख़त्म करने,फ़िर आए राम,,ज़ख़्मों को भरे जो,मरहम हैं राम । प्यार बहुतायत में,साथ लाए राम,,ना आए शायद में,निःसंदेह आए राम । मोदी जी सदृश,आज आए राम,,हनुमान गए दिख,योगी

राम राज्य – कविता अभिनव कुमार

राम राज्य,बजें ढोल नगाड़े,दुर्जन हैँ हारे,हैं राम सहारे । नस नस में राम,बसे हर कण राम,है चारों धाम,आठों पहर प्रणाम । भाई चारे की जीत,एक नई उम्मीद,रात गई है बीत,आई लहर है शीत । अयोध्या नगरी,दुल्हन है सजी,खुशी सच में हंसी,धूम घर घर

सुशांत का दुखांत

सुशांत का दुखांत हूं मैं निशब्द,बिल्कुल ही स्तब्ध,जब चला पता,सुन्न, स्थिर, हूं हिला । होए ना विश्वास,लगे अभी भी पास,सबका वो चहेता,सच्चा अभिनेता । लांघी हर मझधार,वो था दमदार,अपने दम पर,खड़ी की दीवार । था ज़मीं से जुड़ा,दिल बहुत

अन्याय पे लगाम लगाएं …

अन्याय पे लगाम लगाएं … जब मैं रोता हूँ,तब तू हंसता है,मैं आंखें भिगोता हूँ,तू साज़िश रचता है । जब मैं फँसता हूँ,तुझे मज़ा आता है,मैं अंदर धंसता हूँ,तू और सुनाता है । मेरी खुशियां मेरी नज़्म,तुझको ना हैं होती हज़्म,हरे और हो जाते

राखी – उम्मीदों की बैसाखी

राखी - उम्मीदों की बैसाखी … राखी,स्नेह प्रेम की झांकी,चाहे वैद्य या ख़ाकी,चेहरे पे रौनक मां की । भाई बहन का पर्व,इक दूजे पर गर्व,मनाये हिन्द है सर्व,पावन धरा व नभ । भाई लेता प्रण,रक्षा हर क्षण,बहन बसी हर कण,एक जैसे मन । भाई की

दोस्ती – तेरी मेरी गोष्ठी …

दोस्ती - तेरी मेरी गोष्ठी … दोस्ती,अक्सर है मुझसे पूछती,कानों में मेरे गूंजती,पहेलियाँ ये मुझसे बुझती । क्या मेरा होता खास दिवस ?साल में एक दिन सकूं क्या सज ?क्या मेरी औकात सिर्फ़ दो गज ?क्या मात्र औपचारिकता हूँ अब बस ? क्या नाम

ऐ हवस, तू बस भी कर …

ऐ हवस, तू बस भी कर … ऐ हवस,अब कर भी बस,कुछ खा तरस,और ढूंढ तू शख्स । मैं हूँ बेबस,ना बचा अब रस,क्यूँ रही है हस ?तूने लिया है डस । तेरे सिर हैं दस,तेरा दुस्साहस,मैं गया हूँ फंस,बना तेरा दास । ना तू टस से मस,है जस की तस,तू झूठा

ईद

ईद ईद,मधुर संगीत,भाई चारे का प्रतीक,सौहार्द की उम्मीद । संगम व्यास व सिंध,एकता की ईंट,अहिंसा की जीत,ना शक किंचित । दोस्ती निश्चित,एक दूजे का हित,तम जाए है बीत,सबकुछ ही विनीत । बड़ी पुरानी रीत,पूर्वजों की सीख,बदले रोज़ तारीख़,बन

आज़ादी की क़ीमत

आज़ादी की क़ीमत अगस्त का मास,आती है याद,शूरवीरों की,तप की तस्वीरों की । जागता है जज़्बा,तैयार शहर क़स्बा,सनक कुछ करने की,देश पे मर मिटने की । उमड़ता है जुनून,नशा जोश धुन,देश लगे सर्वप्रथम,इसमें जैसे जाते रम । खाते हैं सौगंध,माटी की

रफ़ाल – बेमिसाल

रफ़ाल - बेमिसाल रफ़ाल,तूफानी चाल,दुश्मन बेहाल,जी का जंजाल । करे तेज़ प्रहार,माने नहीं हार,बेहद असरदार,सिर पे ये सवार । आधुनिक विज्ञान,ये लड़ाकू विमान,भारत की जान,थामी है कमान । ना निशाना चुके,गहरे मंसूबे,शत्रू पे टूटे,सबकुछ ये
Powered By Indic IME
error: Content is protected !!