पद और गुण की वंदना – णमोकार मंत्र

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यह णमोकार नमस्कार महामंत्र जैन धर्म की सभी परमपराओं द्वारा एकमत से मान्य है। ्रप्रायः मानव किसी एक महापुरुश को लक्ष्य बनाकर अपनी समस्त भक्ति व श्रद्धा का स्त्रोत उन पर उडेल देता है, परन्तु इस महामंत्र की विषेशता है कि, इसमें किसी व्यक्तित्व विषेश की नहीं अपितु पद और गुण की वन्दना है। यह मंत्र है
णमो अरिहन्ताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं
इस मंत्र के बारे में कहा गया है कि, जितने भी मंगल हैं, उन सब में यह सर्वश्रेश्ठ मंगल है। पाॅच पदो की वंदना ंके कारण इसे पंच- परमेश्ठि महामंत्र भी कहा गया हैं। यह पंच- पद समस्त विष्व की सर्वश्रेश्ठ आत्माओं को समर्पित है। इसमें प्रथम के दो पद सुदेव के रुप में तथा बाद के तीन पद सुगुरु के रुप में ग्रहण किये गये है।

णमो अरिहन्ताणं:- अरिहन्त देव को नमस्कार। अरि- षत्रु,हंताणं- हनन करने वाले।

आत्मीय षक्ति को उजागर करने में बाधक घनघाति- कर्म चतुश्टय ज्ञानावरणीय, दर्षनावरणीय,मोहनीय, अन्तराय को क्षय कर अनन्त चतुश्टय 1. अनन्त ज्ञान, 2.अनन्त दर्षन 3.क्षायिक चरित्र- अनन्त चरित्र, तथा 4. अनन्त षक्ति को प्रकट करने वाले,तद्योग्य बारह गुणों अनास्त्रव,अमम, आकिच्चन्य, षोकरहित,निर्लेप, व्यपगत- प्रेमराग- दोश-मोह, निग्रन्थप्रवचनाोपदेषक, षास्त्र नायक, अनन्तज्ञानी, अनन्तदर्षी- अनन्तचारिणी, एवं अनन्तवीर्य सम्पनन से युक्त, उसी भव में सिद्धि गमनयोग्य पवित्र आत्माओं को अरिहन्त पद में नमस्कार किया जाता हैें।

णमो सिद्धाणं:-

namokar-mantra-meri-rai-jain
सिद्ध भगवान् को नमस्कार हो । अश्टकर्म रुपी काश्ट को परम षुक्ल ध्यान रुपी अनल से जिन्होने भस्म कर दिया है, जो परम विषुद्ध अश्ट गुणों अनन्तज्ञान,अनन्तदर्षन,अनन्तचारित्र, अनन्तसुख,अटल अवगाहन,अमूर्तिक अगुरुलघु एवं अननतवीर्य से युक्त है, जो पुनरागमन रहितमुक्ति के षाष्वत सुख मे विद्यमान है। निरंजन, निराकार,निरामयबन चुके है तथा मंगलरुप एवं अविनाषी है, वे सिद्ध कहलाते है।
णमों आयरियाणः-

आचार्य को नमस्कार हो।ं मर्यादापूर्वक – विनयपद्धति के साथ जो भव्य प्राणियों से सेवित हैं, वे आचार्य कहलाते है। सूत्रार्थ विज्ञाता गच्छनायकगच्छ के आधार उत्तम लक्षणों से सम्पन्नगण के ताप से विमुक्त अर्थात गण की सारण-वारण धारण रुप व्यवस्था को कुषलता के साथ वहन करने वाले,पंचाकार- ज्ञानाचार,दर्षनाचार,चरित्राचार,तपाचार,और वीर्याचार,का दृढता से पालन करने कराने वाले संघ धुरा को योग्यता के साथ चलाने वाले,अर्हद्- धर्म की सर्वतः उन्नति करने वाले छत्तीसगुण पंचाचार पालक, पंच एवं तीन गुप्ति के धारक /पालक सम्पन्न सुगुरु आचार्य कहलाते हैं।

णमो उवज्झायाणं:-
उपाध्याय को नमस्कार हो। जिनके समीप रहकर अध्ययन,न्याय-व्याकरण,स्वर-व्यंजन युक्त, षुद्ध उच्चारण के साथ जैनागमों का अध्ययन किया जाए उन्हें उपाध्याय कहते है। उपाध्याय को 25 गुणकारी कहा गया है। वे हैं 11 अंग आचारांग,सूयगडांग,ठाणांग,समवायांग,वियाहपन्नति,नायाधम्मकहाओ, उवासकदषांक, अन्तगडदसांग, अणुत्तरोववाई पण्हावागरण विवागसुयं।

12 उपांगः- उववाई, रायप्पसेणी,जीवाभिगम,पण्णत्ति,निरयावलिया,कप्पवडंसिया, पुप्फिया, पुप्फचूलिया एवं वण्हिदसा। चरण सप्तति पंच महावृत,दस श्रमणधर्म,दसविधि वैयावृत्य, नवब्रम्हचर्य गुप्ति,रत्नत्रय,द्वादषविधितप, क्रोध, मान, माया लोभ का निग्रह एवं करण सप्तति पिण्ड विषुद्धि के चार भेद,पाॅच समिति, तीन गुप्ति, बारह भावना बारह पडिमा,पंचेन्द्रिय निरोध, पच्चीस प्रतिलेखना,द्रव्य,क्षेत्र, काल, भावरुप चार अभिग्रह ।
णमो लोए सव्व साहूणः- लोकगत सभी साधुओं का नमस्कार।

संस्कृत व्युत्पतिकार ‘‘ साधु’’ षब्द की व्युत्पत्ति बताते हुये कहते हैः-
साधयन्ति ज्ञानादिषक्तिभिः मोक्षमति साधवः अर्थात् ‘ज्ञानादि षक्तियों के द्वारा जो मोक्ष की साधना करते है, वे साधु कहलाते है’ समता वा सर्वभूतेशु ध्यायन्तीति साधवः।

समस्त चराचर जगत् के प्राणियों के प्रति जिनका समता आत्मीय भाव हो , उन्हें साधु कहते है।

सहायकं वा संयमकारिणां धारयन्तीति साधवः।

जो संयम पालन करने वाले के सहायक हों, वे साधु कहलाते है। समवायांग सूत्र में साधु के 27 मूल गुण बताये गये है। पाॅच महाव्तपालन, पाॅच इंद्रियों का निरोध, चार काशायों का त्याग, भाव सत्य, करणसत्य, योगसत्य, क्षमा वीरागता,मनसमाहरणता, वचनसमाहरणता, कायासमाहरणता, ज्ञानसम्पन्नता,दर्षनसमपन्नता, चरित्रसम्पन्नता, वेदनातिसहनता, एवं मारणन्तिकातिसहनता।

इस महाामंत्र अरिहन्त प्रभू,सिद्ध,आचार्य, उपाध्याय एवं साधु इन सभी पद एवं गुणकारीआत्माओं को वंदन/नमस्कार किया जाता है ।कहीं कोई भेदभाव नहीं है।यहाॅ किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक या धार्मिक अलगाव के बिना, अन्त में ‘ण्मो लोए सव्व साहूणं’ के रुप में उन समस्त साधु भगवंतो को नमस्कार किया जाता है, जिनका समस्त चराचर जगत् में प्राणियों के प्रति आत्मीय भाव है।भले ही वे साधु भगवंत किसी भी धर्म, सम्प्रदाय या मान्यता के हों।

यह महामंत्र चमत्कारी व अतिषय प्रभावषाली है। आस्था एवं श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से मन को निर्मलता व अपूर्व षान्ति मिलती है। भगवतीसूत्र, समवायांगसूत्र, प्रवचन सारोद्धार आदि ग्रन्थों में इस महामंत्र व पंच परमेश्ठि अरिहन्त प्रभू,सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं साधु के गुणों का विषद विवेचन प्राप्त होता है।

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