सहकारी नेतृत्व की असफलता से हुआ दीर्घ सहकारी सरंचना का अवसान

सहकारी नेतृत्व की असफलता से हुआ दीर्घ सहकारी सरंचना का अवसान

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संदर्भः- कृषि और ग्रामीण विकास बैंक
सहकारी नेतृत्व की असफलता से हुआ दीर्घ सहकारी संरचना का अवसान

            प्रदेष की दीर्घ कालीन सहकारी साख संरचना का प्रमुख स्तम्भ म.प्र. सहकारी कृशि और ग्रामीण विकास बैंक एवं जिला सहकारी कृशि और ग्रामीण बैंकों का परिसमापन हो गया है। यह परिसमापन कोई साधारण नहीं है कि उसे इतनीर्  आसानी से लिया जा सके। इसने एसे अनेक प्रष्न उपस्थित कर दिये है जिनका उत्तर खोजा ही जाना चाहिये।
          राजनीतिक इच्छााषक्ति का अभाव औेर इस संरचना के प्रति सौतेला और पूर्वाग्रह से  ग्रसित मानसिकता इस अवसान का प्रमुख कारण है। इसकी आहट 1980 के दषक से ही  आना षुरु हो गई थी जब दो पृथक साख संरचना के साथ कार्य कर रही सहकारिता की अल्पावधि संरचना को अधिक तबज्जो दी जाने लगी तथा उन्हें  दीर्घअवधि के लिये ऋण देने की अनुमति मिली। यहीं से दीर्घावधि संरचना का षनेः षनेः पतन होना  प्रारंभ हुआ।  सरकार, सहकारिता विभाग और सहकारी कार्यकर्ता  खामोष होकर  यह तमाषा देखते रहे। और अपना हित साधने वाले राजनेता जाने अनजाने में अल्पावधि साख संरचना को बढावा देते रहे और मनमाने ढंग से सहकारिता का संचालन करते रहे।
           सबसे बडा और गंभीर प्रष्न यह है कि, जब प्रदेष की सहकारी नीति के अन्र्तगत दीर्घअवधि औेर अल्पअवधि के बीच स्पश्ट विभाजन रेखा थी तो क्यों अल्पावधि ऋण साख संरचना के लिये निर्धारित ब्याजदर न्यूनतम रखी गई औेर दीर्घ कालीन संरचना में ब्याजदर बहुत अधिक  11 से 15 प्रतिषत रखी गई्र। इससे सरकार की मानसिकता स्पश्ट हो गई थी कि,वो इसे बंद करना चाहती  थी। उस मानसिकता के पीछे कौन से कारण काम कर रहे थे यह एक अनुत्तरित पहेली है।
           यह भी एक विचारणीय प्रष्न है कि, राश्ट्रीय कृशि औेर ग्रामीण विकास बैेकं नाबार्ड जो अपनी मर्जी और नीति के कारण राज्य सरकार को सहकारिता विधान में संषोधन को बाध्य कर सकता है तो उसने इन बैंकों के पुनरुत्थान के लिये राज्य सरकार पर अपेक्षित दबाव क्यों नहीं बनाया। उसने अपना मतलब केवल अपने ऋणों की सुरक्षा तक ही सीमित रखा। विगत कई वर्शों से नाबार्ड ने अपनी देयताओं को न चुका पाने के कारण इन बैंकों में ऋण वितरण बंद कर दिया था। इसका दुश्परिणाम यह हुआ कि, मात्र एक या दो प्रतिषत वसूली मारजिन पर निर्भर रहने वाली इन बैंकों के लिये यह काफी दुश्कर  हो गया कि, वे वसूली के लिये किये जाने खर्चों, स्टाफ के खर्च को  सहन कर सकें। अतं में वही हुआ कि, यह संरचना जो प्रदेष की कृशि के उत्थान में अग्रणी थी कंगाली की स्थिति में आकर अपना आकार और अस्तित्व ही खो बैठी। यह कहना अतिषयोक्ति नही होगा कि, इन बैंकों ने प्रदेष के सिचित रकबें में  वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया हैं। कहा जाता है कि, नियमित यातनाएं , यातनाएं न रह कर जीवन षैली बन जाती है। यही इन बैंको के साथ भी हुआ। एसा भी पूरी तरह नहीं कहा जा सकता कि,इन बैंकों के बने रहने और व्यवसाय वृद्धि के लिये प्रयास ही नहीं हुये लेकिन विकृत सोच और मानसिकता ने अपेक्षित परिणाम को अवरुद्ध रखा। जैसे 90 के दषक में गाॅधीजी  के ग्राम स्वराज की अवधारणा के मद्धेनजर नया कृशि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम लागू कर इसेे सीधे सीधे ग्रामीण विकास से जोडने का प्रयास किया गया इसके पीछे यह मानसिकता भी रही कि, ग्रामीण युवाओं का पलायन षहरों की तरफ  न हो और वे स्वॅय अपना रोजगार गाॅव में रहकर चला सकें लेकिन धन की अनुपलबध्ता इच्छा षक्ति का अभाव पूर्वाग्रह ग्रसित मानसिकता आदि अनेक कारणों सेे इसमें कोई प्रगति नहीं हो सकी।
                    यह एक निर्धारित प्रक्रिया थी कि, प्रतिवर्श राश्ट्रीय कृशि और ग्रामीण विकास बैंक नाबार्ड को उसकी ऋण की देयताऐ अनिवार्यतः चुकानी है तो इसके लिये कभी भी जमीनी  स्तर पर गंभीर प्रयास नहीं किये गये केवल तात्कालिक रुप से राषि का इंतजाम विभिन्न संस्थाओं से ऋ.ण लेकर देयताओं की अदायगी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाती थी। अर्थात् जहाॅ आॅपरेषन की जरुरत थी वहाॅ दर्द निरोधक से काम चलाया जाता रहा। एक बार तो स्थिति यहाॅ तक भयावह हो गई कि, राज्य कृशि ओर ग्रामीण बेंक को अपना भवन गिरवी रखना पडा औेर नाबार्ड की देयताओं को चुकाया गया। प्रष्न है कि, जब ऐसे नियम विरुद्ध कायों पर सहकारिता विभाग क्यों खामोष रहा और ऐसे कार्य करने वालों को दंडित करने की कार्यवाही क्यों नहीं हो सकी। यह गोरखधंधा विगत तीन दषको से ेचल रहा था कि, किसी भी तरह नाबार्ड की देयताएं प्रतिवर्श चुकाते रहो चाहे इसके लिये राषि की व्यवस्था के लिये कर्ज ही क्यों न लेना पडे। स्थिति की गंभीरता इसी बात से समझी जा सकती हैे कि, जन सामान्य से एकत्रित सावधि औेर आवर्ती जमा राषि का उपयोग भी वसूली देयताओं में कर लिया गया औेर आज लोग इन बैंकों में अपना जमा पेैसा लेने को भटक रहे है। इन बैकों के प्रत्येक लेन देन पर सहकारिता विभाग का अंकेक्षण होताा है  ओर वो इसके लिये बहुत बडी रकम वसूलता है फिर भी उसके नीचे ही यह सब होता रहा और केवल अंकेक्षण टीपों में उल्लेख किया जाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करली गई। कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं की गई। विगत दो दषकों से अधिक समय से इन बैंकों के अनुत्पादक खर्चों पर नियंत्रण के कोई सार्थक प्रयास कभी नहीं हुये। सहकारिता राजनीति का प्रवेष द्वार रहा है। इसके अंदर प्रवेष करने के बाद प्रवेषकर्ताओं ने कभी भी सहकारिता के उत्थान
के लिये कभी भी कोई सार्थक प्रयास नहीं किये गये।
             सहकारिता एक सेवा मिषन है। सहकारिता एक एसा जन आंदोलन है जिसमें किसानों की सहायता करने का एकमात्र उद्धेष्य था। किसानों को साहूकारों  और बिचोलियों के  चंुगल से मुक्ति दिलाने के लिये इस संरचना की स्थापना की गई थी लेकिन राजनीति ने  सहकारिता को इस उद्धेष्य से भटका दिया और इसे भृश्टाचार और अययाषी के अडडे में परिवर्तित कर दिया गया। सहकारिता प्रदेष और देष के अनेक राजनीतिक व्यक्तित्वों की जननी रही है लेकिन अपनी जननी के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन में वे उदासीन रहे। उन्होने सहकारिता के संसाधनों का तो दोहन किया लेकिन उसकी सुदृढता के लिये कोई सार्थक प्रयास नहीं किये। दीर्घ सहकारी साख संरचना जो ग्राम विकास का मूल आधार थी उसे ही गाॅवों से बेदखल कर दिया गया। सहकारिता के चुनाव राजनीतिक रुप से लडे जाने लगें। राजनीति ने सहकारिता को अपने चुंगंल में ले लिया और अपनी धुन पर उसे  नचाने लगी। सहकारिता का प्रवेषद्वार हर पाॅचवे वर्श नये राजनीतिज्ञों को चुनावी यज्ञ में षामिल करने के लिये ेयह जानते हुये भी प्रवेष देता है कि, वे केवल उसका उपयोग करेंगें षोशण करेगें लेकिन उसके लिये उनकी कोई नैतिक जवाबदारी नहीं है। साथ ही यह भी एक कटु सत्य है कि, सहकारिता की सफलता केवल एक पक्ष पर निर्भर न होकर  इससे जुडे सभी पक्षों की सामूहिक जिम्मेवारी थी जिसके निर्वहन में निष्चय ही लापरवाही ओर कमी रही है।
        आईये आप औेर हम केवल यह उम्मीद करें कि, अब भविश्य में ऐसी किसी जनहिताय और जन उपयोगी अन्य संरचना का अवसान नही होगा।
               
                   
               

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