कविता

अज़य महिया छद्म रचनाएँ – 16

मुझे किताबों ने क्या सीखाया और क्या सीखा रही हैं, मैं ब्यां नहीं कर सकता,यदि जानना चाहते है तो किताबें पढना सीखिए

अज़य महिया

उसके लौट आने की दीद में सारी उम्र गुज़ार दी,कमबख़्त के न आने का ईशारा भी उम्र गुजरने के बाद मिला

अज़य महिया

आशिकों की आँखों से ये निकले दर्द के आँसू हैं
ये बारिश का होना ही तो उनके प्रेम को दर्शता है

अज़य महिया

यादों की शीतल हवाएं चल रही है जनाब
यूं मुस्कुराकर मत देखिए,जम जाएंगे हम

अज़य महिया

विधवा-जीवन बिन दु:खों के,
ज्यों नारी बिन पति के |
निखरे न नरत्व बिन दु:खों के |
उपजे न मति बिन दु:खों के ||

अज़य महिया

किया था इश्क कभी,एक बेवफा के साथ
वादा करके छोङ गई,सुनहरे सपनों के साथ

अज़य महिया

किसी की याद आए तो दीया जलता और बुझता है
किसी से प्यार हो जाए तो रात को जागना पङता है
कही कोई तो है,जो मुझको भी, इतना याद करता है
मुझे सपने जो आएं तो,ज़माना भी करवटें बदलता है

अज़य महिया

सबकी रूह कांप ऊठी थी,सुनकर उसकी करुण भरी पुकार |
नव पल्लव,विटप विपिन को काट दिया, फिर क्यों रोए संसार ||

अज़य महिया

नदियों के किनारे होते है इसलिए सब बाहर निकल आते है पर इश्क हकीकी कैसे बाहर निकले साहब,ये तो बिना किनारों की सरिता है |

अज़य महिया

व्योम-गगन से उतर रही है,एक संध्या सुन्दर नारी |
देख कर उसकी रूप-छटा को,अचरज होता भारी ||
सप्त वर्ण की साङी पहनी,भाल लाल बिन्दी धारी |
जलद-पट से झलक रही है,कनक-ओप अपार भारी ||

अज़य महिया

लाल साङी पहन के वो तो पश्चिम दिशा में खङी है
लुभा रही जन-जन का हृदय,जाने क्यों मन हर रही है

अज़य महिया

तेरी बेवफाई की मैंने एक ऐसी कहानी लिखी है
सुनहरे अक्षरों में हमने अपनी ज़वानी लिखी है

अज़य महिया

तेरी बेवफाई की मैंने एक ऐसी कहानी लिखी है
सुनहरे अक्षरों में हमने अपनी ज़वानी लिखी है
गुज़ारे होंगे तुमने ज़िन्दगी के हज़ारों हसीन पल
हमने तो तन्हाई भरे भावों से तेरी तस्वीर देखी है

अज़य महिया

कहीं ग़मों का अंधेरा है,कहीं पर लाखों खुशियाँ छाई है |
जिस दिल मे हो प्रणय किसी का,कस़में उसी ने खाई है ||

अज़य महिया

देखकर भी कह नहीं सकते वफा-ए मोहब्बत,
मुश्किल दौर में तुम मेरा साथ क्या निभाओगे ||
इतनी अमूल्य होती है साहब!इश्क की बाजी,
बाज़ार की गलियों,दुकानों मे कहां से पाओगे ||

अज़य महिया

अभी तो खूमार चढा है अरमान अभी बाकी हैं
अभी तो जगत् में है
मशान अभी बाकी है
अभी तो अस्थायी जगह है स्थायी जगह अभी बाकी है

अज़य महिया

देखकर भी कह नहीं सकते वफा-ए मोहब्बत, मुश्किल दौर में तुम मेरा साथ क्या निभाओगे इतनी सस्ती नहीं होती साहब!इश्क की बाजी, बाज़ार की गलियों,दुकानों मे कहां से पाओगे

अज़य महिया
मै लेखक अजय महिया मेरा जन्म 04 फरवरी 1992 को एक छोटे से गॅाव(उदासर बड़ा त नोहर. जिला हनुमानगढ़ राजस्थान) के किसान परिवार मे हुआ है मै अपने माता-पिता का नाम कविता व संगीत के माध्यम करना चाहता हूं मै अपनी अलग पहचान बनाना चाहता हूं

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