बस कलम यूँ ही चल पड़ती है मेरी।

बस कलम यूँ ही चल पड़ती है मेरी। राह में चलते कभी, किसी का दीदार कर।बेवफ़ाई में कभी, कभी किसी के प्यार पर।भीड़ में कभी, तो कभी रात की तन्हाई में।किसी की मुस्कुराहट में, कभी रुसवाई में। बस कलम यूँ ही चल पड़ती है मेरी। कभी किसी को

वक़्त बदल रहा है।

वक़्त बदल रहा है। ऐसा लगता है जैसे वक़्त बदल रहा है। कई लोग हमसे बेवज़ह, दूर होते नज़र आ रहे हैं।हम भी ज़िन्दगी से, मजबूर होते नज़र आ रहे हैं।आज तक नहीं किया था, कोई ग़लत काम हमने।अब हर रोज हमसे ही, क़सूर होते नज़र आ रहे हैं। ऐसा लगता है

ज़िन्दगी तू ही बता तुझ पर, कैसे एतबार करूँ

ज़िन्दगी तू ही बता तुझ पर, कैसे एतबार करूँ।कोई तो वजह हो ऐसी, कि तुझसे प्यार करूँ। हर ख़्वाब, हर ख्वाहिश तो, तूने तोड़ दी मेरी।बता ख़ुद को जीने के लिए, कैसे तैयार करूँ। मेरे हर रास्ते पर तूने, कांटे ही कांटे सजा दिए।इतने दर्द के बाद भी,

गांधी के सपनों का ,उड़ता नित्य उपहास है

गांधी के सपनों का ,उड़ता नित्य उपहास है वही पालकी देश कीजनता वही कहार हैलोकतन्त्र के नाम परबदले सिर्फ सवार हैंराज है सिर्फ अंधेरों काउजालों को वनवास हैयहाँ तो गांधी के सपनों काउड़ता नित्य उपहास है || महफ़िल है इन्सानों की ,निर्णायक

नारी तू भव की आधारशिला – कविता

|| नारी तू भव की आधारशिला || शोभा कि नदी, सगुणों से सजी प्रेम-करुण की तू सीमा, स्तुति तेरी किन शब्दों में जग में न तेरी कोई उपमा || दर्पण सा मन, निरूपण-निरूपण शामक भी, हर किरदार में तू, नारी तू भव की आधारशिला दूजी न

समय का पहिया

समय का पहिया मानो तो मोती ,अनमोल है समय नहीं तो मिट्टी के मोल है समय कभी पाषाण सी कठोरता सा है समय कभी एकान्त नीरसता सा है समय समय किसी को नहीं छोड़ता किसी के आंसुओं से नहीं पिघलता समय का पहिया चलता है चरैवेति क्रम

अब तो ….. (कविता)

अब तो …..रिश्तों में मिलावट है,मुस्कान बस बनावट है,आहट की ना चाहत है,ख़ुद से ही बग़ावत है । ना जाने …क्यूँ बदल गए इतने हैं हम ?कहाँ गए अश्क़ वो थे जो नम ?क्यूँ मतलबी हो गए हम हरदम ?क्यूँ पैर नहीं अब जाते हैं थम ? किस बात की दौड़ ?क्यूँ

प्रेम बहे झरने सा तेरा

प्रेम बहे झरने सा तेरा || तन में सिहरन, सांसों में गतिमन भी व्याकुल, नव-जन्में सा,ऐसा अदभुत प्रेम तुम्हाराह्रदय में बसता, पहली बारिश सा || भाव तुम्हारे, मन के अन्तस परजैसे रश्मि हिम के पर्वत पर,प्रेम बहे झरने सा तेरामन मोहता, कविता

कविता : वो जश्न कोई मना न सके

दोस्ती वो निभा न सकेआग दिल की बुझा न सकेमेरे जज्बातों से खेलकर भीवो जश्न कोई मना न सके || कभी खामोश रहता हूँकभी मैं खुल कर मिलता हूँजमाना जो भी अब समझेज़माने की परवाहअब मैं न करता हूँवो पल कैसे भूल सकता हूँबुझाई थी नयनों की प्यास जब

सम्मान तिरंगा

यह तिरंगा तो ,हमारी आन बान हैयह दुनिया में रखता ,अजब शान हैयह राष्ट्र का ईमान है ,गर्व और सम्मान हैस्वतन्त्रता और अस्मिता की ,यह एक पहचान हैक्रान्तिकारियों की गर्जन हुंकार हैविभिन्नता में एकता की मिसाल हैएकता सम्प्रभुता का कराता ज्ञान

हौसला (कविता)

हौसला निशीथ में व्योम का विस्तार हैहौसला विहान में बाल रवि का भास हैनाउम्मीदी में है हौसला खिलती हुई एक कलीहौसला ही है कुसमय में सुसमय की इकफलीहौसला ही है श्रृंगार जीवन काहौसला ही भगवान हैहौसले की ताकत इस दुनियां मेंसचमुच बड़ी महान है ||

ख़ुद को दिया धोखा …

ख़ुद को दिया धोखा … इस गणतंत्र दिवस,किसान वाकई बेबस ?लिया देश को डस,रहा विश्व है हँस ! शर्मसार हुई दिल्ली,उड़ी बहुत है खिल्ली,क्या यही आज़ादी ?की बहुत बर्बादी । तिरंगे की मर्यादा,सीना छलनी, है काटा,देश टुकड़ों में बांटा,नम आज विधाता ।

गीत- रुस्वा करूं {अजय माहिया}

खुदा करे के तु रूठे ओर मनाऊं मैइसी दिन के लिए,तुझे सताऊं मै । कैसा ये अफ़स़ाना,कैसी मोहब्बत है‌‌‌ ‌‌ तुम्ही को रूस्वा करता जाऊं मै । कितनी सीदत से तुझे ,तराशा है खुदा नेलगता है कोई जन्नत की नूर है तू । तेरे लिए ही जीता हूं और मरता

अजय महिया छद्म रचनाएँ – 3

तेरी ज़ुल्फों का साया जो मिला होता‌ मै इक पल वहां आराम से सोया होतालेखक अज़य महिया अब सत् और असत् मे द्वन्द्व होगा‌‌‌धोखे और धोखेबाज़ से युद्ध होगाअब याचना नही केवल रण होगाया तो जीवन या फिर मरण होगाअब अनीति पर जीत,जश्न न होगाखड़्ग की नोक

आओ सब मिलकर नव वर्ष मनाएं

आओ सब मिलकर नव वर्ष मनाएं सुखद हो जीवन हम सबका क्लेश पीड़ा दूर हो जाए स्वप्न हों साकार सभी के हर्ष से भरपूर हो जाएं मिलन के सुरों से बजे बांसुरी ये धरती हरी भरी हो जाए हों प्रेम से रंजीत सभी ऐसा कुछ करके दिखलायें

कविता : मोहब्बत {प्रभात पाण्डेय }

कविता : मोहब्बत नदी की बहती धारा है मोहब्बत सुदूर आकाश का ,एक सितारा है मोहब्बत सागर की गहराई सी है मोहब्बत निर्जन वनों की तन्हाई सी है मोहब्बत ख्वाहिशों की महफिलों का ,ठहरा पल है मोहब्बत शाख पर अरमानों के गुल है मोहब्बत

कविता : यह कैसा धुआँ है

कविता : यह कैसा धुआँ है लरजती लौ चरागों की यही संदेश देती है अर्पण चाहत बन जाये तो मन अभिलाषी होता है बदलते चेहरे की फितरत से क्यों हैरान है कैमरा जग में कोई नहीं ऐसा जो न गुमराह होता है भरोसा उगता ढलता है हर

जिस प्यार पे हमको बड़ा नाज था

कविता : जिस प्यार पे हमको बड़ा नाज था … जिस प्यार पे हमको बड़ा नाज था क्या पता था वो अन्दर से कमजोर है जिन वादों पे हमको बड़ा नाज था क्या पता था कि डोर उसकी कमजोर है || करूँ किसकी याद ,जो तसल्ली मिले रात के बाद आती

वो सारे जज्बात बंट गए

वो सारे जज्बात बंट गए गिरी इमारत कौन मर गया टूट गया पुल जाने कौन तर गया हक़ मार कर किसी का ये बताओ कौन बन गया जिहादी विचारों से ईश्वर कैसे खुश हो गया धर्म परिवर्तन करने से ये बताओ किसे क्या मिल गया जाति

26 नवम्बर की स्याह रात ..

26 नवम्बर की स्याह रात .. (शहीदों को श्रद्धांजलि, दिल से अर्पित पुष्पांजलि,जिन्होने दी जान, कि रोशन रहे गुलिस्ताँ,है उनको नमन, झुकाए शीश धरा गगन ।) वो 26 नवम्बर,काला एक नंबर ।शर्मसार था अम्बर,सोया था दिगंबर । मुंबई थी दहली,दहशत थी
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