भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था को आइना दिखा, चुनौतियों से पार पाने का जरिया बनता कोविड़-19

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भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था को आइना दिखा, चुनौतियों से पार पाने का जरिया बनता कोविड़-19

(डॉक्टर मनमोहन सिंह शिशोदिया, भौतिकी विज्ञान विभाग, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय ग्रेटर नोएड)

विपत्तियां अपने साथ उससे भी बड़े अवसर साथ में लाती हैं। किसी व्यक्ति, संस्था, अथवा राष्ट्र की सफलता का स्तर उनके द्वारा विपत्तियों में निहित अवसरों को पहचानने वाली दृष्टि की स्पष्टता, अवसरों से लाभान्वित होने की प्रतिबद्धता तथा देश, काल, एवं प्रकृति के अनुरूप प्रभावी कार्ययोजना पर निर्भर करता है। यह कोविड़-19 जैसी विश्वव्यापी महामारी से प्रभावित भारतीय उच्च शिक्षा के लिए बिलकुल प्रासंगिक है जहाँ इतिहास में शायद पहली बार पठन-पाठन पद्धतियों में इतने त्वरित परिवर्तन हुए हैं।

यद्यपि यह राष्ट्रीय गर्व का विषय है कि देश में लगभग 993 विश्वविद्यालय, 33931 महाविद्यालय, 475 चिकित्सा महाविद्यालय, 25 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, 20 भारतीय प्रबंध संस्थान, 13 भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, 23 भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान,31 राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, 3.73 करोड़ छात्र एवं 14.16 लाख शिक्षकों वाला वृहद् एवं सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र विद्यमान है. तथापि विश्व व्यापी कोविड़-19 महामारी ने जिस तरह हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था को आइना दिखाया है उससे यशपाल के ‘परदा’ की तरह, उच्च शिक्षा तंत्र की खामियां सबके सामने उजागर हो गई हैं।

कहना न होगा कि हमारा विशाल शिक्षा तंत्र, वृहद स्तर पर हुए त्वरित परिवर्तनों के प्रत्युत्तर के लिए तैयार नहीं था। अतः यह एक अवसर है जब हम अपने संस्थानों को गुणवत्तापरक शिक्षण के साथ ही शोधकार्य, वैज्ञानिक/तकनीकी आविष्कारों, नए ज्ञान के सृजन, एवं भविष्य की चुनौतियों के प्रत्युत्तर के लिए तैयार करें. यह कड़वा सत्य है कि हमारे अधिकाँश संस्थान पारम्परिक शिक्षण से ऑनलाइन शिक्षण की संक्रांति को उतना सहज नहीं बना पाए, जितना की छात्रों द्वारा अपेक्षित था.

इसके कुछ कारण जो ध्यान में आते है, उनमें प्रमुख हैं, ऑनलाइन शिक्षण के लिए; आधारभूत पारिस्थितिकी तंत्र का अभाव, छात्र और शिक्षक वर्ग का मानसिक रूप से तैयार न होना, दूरस्थ इलाकों में इंटरनेट की अनुपलब्धता अथवा स्पीड का पर्याप्त ना होना, अधिकाँश छात्रों एवं शिक्षकों का ई-लर्निंग तकनीकों के साथ पहला अनुभव होना, लॉकडाउन के कारण आवश्यक तकनीकी सपोर्ट न मिलना, पुस्तकालयों में ई-संसाधनों कि कमी आदि।

चुनौतियां, समाधान एवं अवसर

देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में पाठ्यक्रम अलग होने के कारण किसी भी नोडल एजेंसी के लिए उत्कृष्ट स्तर की अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना अत्यंत दुष्कर कार्य है। अतः ऐसा लगता है कि शिक्षाविदों एवं नीति-निर्माताओं को पुनः इस बहस को शुरू करना चाहिए कि क्या विशिष्टता आधारित संस्थानों/विषयों/पाठ्यक्रमों को छोड़कर, राष्ट्रीय स्तर पर एकसामान पाठ्यक्रम लागू हो? पाठ्यक्रम ऐसा हो जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर समानता हो एवं संस्थानों की स्वायत्तता को अक्षुन्य रखने एवं नवोन्मेषों को बढ़ावा देने हेतु 10-15% परिवर्तन करने के अधिकार सम्बंधित संस्थान को हों.

ई-लर्निंग संसाधनों एवं तकनीकों के प्रति छात्रों एवं शिक्षकों में अंतनिर्हित जड़त्व से मुक्त हो यह मंतव्य बनाना होगा कि, ई-लर्निंग न केवल आपदा के समय आवश्यक है अपितु पारंपरिक पठन-पाठन को और अधिक प्रभावी एवं व्यवाहरिक बनाने हेतु अनिवार्य भी है। अन्य वाणिज्यिक क्षेत्रों के उलट, शिक्षा जगत में ई-लर्निंग/डिजिटल तकनीकों की अब तक की कम स्वीकार्यता के बाबजूद, कॉविड-19 शिक्षा जगत में ई-लर्निंग की तीव्र तरंग पैदा करने में उत्प्रेरक का कार्य कर सकता है। छात्रों की दृष्टि से, शैक्षणिक परिवर्तन ऐसे हों जिनके फलस्वरूप छात्र मनोवैज्ञानिक रूप से सहज एवं प्रसन्नचित रहें. शिक्षक की कुशलता इसमें निहित है कि वह ऑफलाइन से ऑनलाइन संक्रांति को छात्रों के लिए कितना सहज एवं मनोरंजक बना सकता है? इसके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित किये जाने की महती आवश्यकता है।

वर्तमान संक्रांति भारतीय शिक्षा को मैकाले पद्धति के कुचक्र से आज़ाद कर, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों एवं पुरातन ज्ञान परंपरा के समावेश का एक उचित अवसर है। अर्थव्यवस्था में घाटे की पृष्ठ्भूमि में पारम्परिक रोजगार के अवसरों में संभावित कमी के मद्देनजर शिक्षण संस्थाओं को अपने छात्रों को अधिकाधिक स्वदेशी स्टार्ट-अप के लिए प्रेरित करना होगा।

भारत सरकार के स्वच्छ भारत अभियान, डिजिटल इंडिया प्रोग्राम, एवं प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का कोविड़-19 के खिलाफ लड़ाई में प्रभावी भूमिका होने के कारण इन्हें शिक्षा तंत्र के साथ सन्निहित किया जाना चाहिए। कोविड़-19 के खिलाफ लड़ाई के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों को देखते हुए शिक्षण संस्थानों को सरकारी अनुदान में कमी एवं छात्रों के पंजीकरण में संभावित गिरावट से और कम आर्थिक संसाधनों द्वारा नई चुनौतियों से निपटने के लिए भागीरथी प्रयास करने होंगे। वर्तमान परिदृश्य में ऐसा लगता है कि अभिभावकों की फीस देने की क्षमता में कमी आयेगी। सरकार का यह कदम अति सराहनीय है की उसने समस्त केंद्रीय संस्थानों को वर्तमान सत्र में फीस न बढ़ाने के लिए निर्देशित किया है।

इसका भी डर है कि कहीं तकनीकों के माध्यम से पठन-पाठन के चलन से उच्च शिक्षा अल्पसुविधा प्राप्त छात्रों की पहुंच से बाहर न निकल जाए। अतः शिक्षा निकायों से ऐसे छात्रों के प्रति संवेदनशीलता अपेक्षित है. आर्थिक मंदी के कारण उद्योगों की हालत खस्ता होने से बढ़ने वाली बेरोजगारी से ऐसा न हो कि बड़ी संख्या में युवा छात्र प्रवेश से वंचित रह जाएँ। ऐसे युवाओं को समाज के लिए उपयोगी बनाने हेतु गंभीर प्रयास करने होंगे। ऐसी स्थिति में औद्योगिक घरानों को कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत अधिकाधिक सहयोग के लिए आगे आना चाहिए तथा बैंक एवं दुसरे निकायों को सुलभ ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए। सरकार को विशेष रूप से शिक्षण संस्थानों को दान देने वाले लोगों/संस्थाओं को आयकर में छूट देनी चहिए। आर्थिक हाशिए पर रह रहे छात्रों को विश्वविद्यालय द्वारा छात्रवृति अथवा अल्पकालीन रोजगार देने का प्रयास करना चाहिए।

युद्धकाल की भांति ही वर्तमान परिस्थितियों में पारंपरिक तरीके एवं समाधान प्रभावी नहीं होंगे,अपितु लीक से हटकर कुछ समाधान तलाशने होंगे. कॉविड-19 महामारी ने “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्” में निहित भारत के मूल संस्कार एवं विचार के महत्त्व को पुनः रेखांकित किया है। अमीर एवं संसाधन युक्त व्यक्तियों/समूहों को सहअस्तित्व के सिद्धांत को स्वीकारना होगा कि वे शेष दुनिया से अलग ऐसे किसी स्वर्ग का निर्माण नहीं कर सकते जहाँ उनके सहचरों को प्रभावित करने वाली आपदाएं न पहुंच पाएं। इस ग्रह के प्रत्येक जीव का भाग्य/दुर्भाग्य शेष जीवों के भाग्य/दुर्भाग्य से जुड़ा है चूंकि आपदाएं जाति/पंथ/भूगोल/इतिहास/अर्थशास्त्र के आधार पर भेद नहीं करतीं।

अतः हम सभी को कड़ी नज़र रखनी होगी कि कहीं अपने आस-पास किसी व्यक्ति/समूह/देश आदि के रूप में ऐसे भस्मासुर तो नहीं पनप रहे जो जाने-अनजाने डायनासोर की तरह मानव सभ्यता के विलुप्त होने का कथानक लिख रहे हों।

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