कविता

वक़्त – कविता वन्दना जैन

वक़्त


बदलते हुए वक़्त मे मैंने
लाचार समुन्दर देखे
पतवारों के इशारे और
लहरों के नजारे देखे
नाचती हुई नावें देखी
आँखें रुआंसी और
लब मुस्कुराते देखे
महलों मे बसते वीराने देखे 
रिश्तों की तंग गालियाँ
बचपन की मजबूर
अटखेलियां देखी
कई कहानियां बेतुकी
छोड़ती हुई केंचुकी देखी
विपदा से उजड़े घरोंदे देखे
फूलों की सलाखों के पीछे
दुबके हुए परिंदे देखे
मंदिर मे सोने की दीवारें देखी
बाहर गरीब की कतारें देखी
दूर से हर अपना देखा
जागते हुए सपना देखा |

वंदना जैन मुंबई निवासी एक उभरती हुई लेखिका हैं | जीवन दर्शन,सामाजिक दर्शन और श्रृंगार पर कविताएं लिखना इन्हे बहुत पसंद है | समय-समय पर इनकी कविताएं कई अख़बारों और पत्रिकाओं में छपती  रही हैं | इनका स्वयं का काव्य संकलन "कलम वंदन" भी प्रकाशित हो…

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