एकांत – कविता

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एकांत

जाने कैसे लोग रहते हैं भीड़ में,
हमें तो तन्हाई पसंद आई है ।

अकेले बैठ के अपने आप से बातें करना,
रोज़ की आदत हो आई है ।

जो भरते थे दम अपनी दोस्ती का,
साथ उठने बैठने का,
आज उनमें भी ठन आई है ।

सच कहता हूं एकांत बहुत अच्छा है यारों,
अपनी शिकायत ख़ुद से करके ख़ुद से ही सुलझाई है ।

ये क्या दम भरेंगे साथ उठने बैठने का ?
ज़रा सी बात पर एक दूसरे की इज्ज़त उतरवाई है !

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