कलम – (कविता) अभिनव कुमार

कलम ✍🏻

छोटी बहुत ये दिखती है, प्रबल मग़र ये लिखती है,
बड़ों बड़ों को पार लगादे, इससे उनकी खिजती है ।

ये हालात लिखती है, शीशे जैसी दिखती है,
जैसी बाहर वैसी अंदर, सच से इसकी निभती है ।

उसूलों पर ही चलती है, बिल्कुल भी ना बिकती है,
है ईमान की एकदम पक्की, ख़ुद की किस्मत लिखती है।

इससे धरती हिलती है, नभ से जाकर मिलती है,
बिन बोले भी सबकुछ करती, ऐसी इसमें शक्ति है ।

ये बिंदास ही चलती है, एक अलग अदा ही झलकती है,
आठ पहर लिखने को तत्पर, ये ना बिल्कुल थकती है ।

दिल से आवाज़ निकलती है, तब जाकर कलम ये चलती है,
जज़्बातों की खान है ये तो, ये हीरे मोती उगलती है ।

ये अरमानों को समझती है, उन संग ही रोती हंसती है,
एक जिस्म तो दूजी जान, दोनों की एक ही कश्ती है ।

अभिनव कुमार ✍

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