विश्वास जब बन जाए अंधविश्वास

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विश्वास जब बन जाए अंधविश्वास

भारत में 75% साक्षरता दर होने के बावजूद भी अंधविश्वास से प्रताड़ना के मामले में आए दिन सुर्खियों में छाए रहते हैं। 21वीं शताब्दी में जहां एक तरफ मानव ने कितनी तरक्की कर ली है कि वह दूसरे ग्रह पर दुनिया बसाने के सपने को हकीकत में बदलने जा रहा है वहीं देश में 17वी शताब्दी से जुड़ी रीति-रिवाज,मान्यता और कुरीतियाँ समाज से अपनी जड़ेंं नहीं उखाड़ सकी हैंं। इंसान स्वार्थ में इतना अंधा हो जाता है कि वह सही और गलत में फर्क नहीं कर पाता भगवान में विश्वास के नाम पर चारों तरफ अंधविश्वास व्याप्त है, जिसकी बली चढ़ते हैं बेगुनाह लोग। देश में भूत-प्रेत, काला जादू, बली, बाल विवाह जैसे अंधविश्वास आज भी मौजूद हैं।

अंधविश्वास क्या है

अंधविश्वास की उत्पत्ति विश्वास ही हुई है, परंतु विश्वास का एक आधार होता है जबकि अंधविश्वास का कोई आधार नहीं होता। अंधविश्वास का तात्पर्य है आंखें बंद करके विश्वास करना। किसी भी बात को बिना सोचे समझे, बुद्धि का इस्तेमाल किए बिना या बिना किसी प्रमाण के मान लेना ही अंधविश्वास
होता है। समाज में पुरानी रुढ़ीवादी विचारों से प्रभावित होकर बिना किसी अज्ञात कारण के कार्य करना ही अंधविश्वास कहलाता है।

शीघ्र सफलता प्राप्त करने का कोई मंत्र नहीं

कठिन परिश्रम के बिना मीठा फल प्राप्त नहीं होता यह शायद अधिकांश लोग जानते हैं फिर भी नौकरी में सफलता, व्यवसाय में दिन रात तरक्की, प्रेम विवाह, परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना, पुत्र प्राप्ति आदि के लिए तांत्रिकों और ओझाओं के जाल में फंस जाते हैं, और उन्हीं तांत्रिकों के कहने से जादू टोना या नरबलि जैसे कुकृत्यों से हजारों मासूमों की जिंदगी तबाह हो जाती है। अंधविश्वास निराधार है अर्थात इसका कोई आधार नहीं है। अंधविश्वास केवल भ्रम या कल्पना को आधार बनाकर अपनी जड़े समाज में फैलाता है। मनो वैज्ञानिकों का कहना है कि अंधविश्वास के पीछे छिपे कारणों का मनोविज्ञान अजीब है, इस के जाल में अपनी जिंदगी से निराश लोग या शीघ्र सफलता पाने वाले लोग ही फसते हैं परंतु यह बात शायद वह भूल जाते हैं कि शीघ्र प्राप्त की गई वस्तु का न कोई आधार होता है ना भविष्य।

पढ़े लिखे लोग भी है प्रभावित

अंधविश्वास के जाल में केवल अनपढ़ या आम लोग ही नहीं पढ़े-लिखे समृद्धि परिवारों के लोग भी फंसे हैं। सामान्यतः घरों में बुजुर्गों द्वारा बिल्ली के रास्ता काटने पर, दूध के उफनने या शीशा के टूटने पर अपशकुन माना जाता है, यह सभी अंधविश्वास हैंं। परंतु कुछ लोग इनका पालन इसलिए करते हैं कि इससे किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता यह व्यक्तिगत नजरिये तक सीमित होता है, परंतु कुछ अंधविश्वास ऐसे भी हैं जिंहें अमल में लाने पर व्यक्तिगत या आर्थिक क्षति पहुंचती है। जैसे- पशु बलि या नरबलि। इस तरह के अंधविश्वास से प्रत्येक वर्ष हजारों मासूम जिंदगी तबाह हो जाती हैं जो समाज के घिनौने चेहरे को दर्शाती है।

स्वार्थ और अंधविश्वास में कोई इंसान इतना अंधा हो जाता है कि वह अपने विवेक का इस्तेमाल किए बिना नर बलि या पशु बलि जैसे रूह कपा देने वाले कुकृत्यों को अंजाम दे देता है। यह हमारे समाज के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है।

मन का भ्रम होता है शुभ अशुभ

शुभ-अशुभ कुछ नहीं होता केवल मन का भ्रम होता है। पैर में खुजली होने से अगर बारिश होने लगती तो देश में कहीं सूखा नहीं पड़ता, उसी तरह हथेली खुजाने से पैसा आता तो देश में कोई गरीब नहीं होता। आधुनिकता का ढिंढोरा पीटने वाले जब तरह-तरह के अंधविश्वासों में फंसते नजर आते हैं तो दोगले लगने लगते हैं। आम आदमी ही नहीं बड़े-बड़े नेता या सेलिब्रिटी कोई कार्य करने से पहले शुभ मुहूर्त देखते हैं साथ ही छोटे बड़े पर्दे पर अंधविश्वास को सीरियल्स या मूवीज के जरिए खूब दिखाया जाता है, जिसे भगवान की भक्ति से जोड़ दिया जाता है। मान लीजिए कोई व्यक्ति इंटरव्यू देने जा रहा है या परीक्षा देने, उसी समय बिल्ली रास्ता काट दे तो उस व्यक्ति को कुछ समय तक रोकने की सलाह दी जाती है जिससे बुरी ग्रह को टाला जा सके लेकिन सोचने की बात यह है कि वह व्यक्ति अपनी विवेक का इस्तेमाल करके यह नहीं सोचता कि इंटरव्यू व परीक्षा में समय पर न पहुंचने से ज्यादा अशुभ होगा या रुक कर गृह दशा टलने का इंतजार करने से।

अंधविश्वास के मामले में झारखंड सबसे आगे

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2014 के आंकड़ों के अनुसार झारखंड में अंधविश्वास के मामले देश में सबसे ज्यादा हैं। नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट में काले जादू और अंधविश्वास के कारण होने वाली हत्याओं के आंकड़े पेश किए गए इन आंकड़ों में झारखंड के बाद उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान का स्थान है।

पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं अधिक होती है
अंधविश्वास की शिकार

महिलाओं का स्वभाव सरल होता है इसीलिए वह शीघ्र ही लोगों पर विश्वास कर लेती हैंं और यही कारण है कि महिलाएं तांत्रिकों और ओझाओं के जाल में शीघ्र फस जाती हैंं। छत्तीसगढ़ समेत देश के 17 राज्यों में डाइन और टोनकी जैसे अंधविश्वासों के कारण हजारों महिलाएं प्रताड़ना की शिकार होती हैं। कुछ समय पहले ही दर्जनों महिलाएं टोनकी के कारण मौत के घाट उतार दी गईं। उत्तर प्रदेश में भी इन दिनों चोटी काटने के नाम पर अंधविश्वास का नया खेल खेला जा रहा है, जिसके आरोप में अलीगढ़ जिले के एक गांव में एक बूढ़ी औरत को इसीलिए पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि लोगों ने समझ लिया था कि ह बूढ़ी औरत ही चोटी काट रही है।

बच्चों के मन में न बिठायें भय

जन्म के समय बच्चे का मस्तिष्क कोरी स्लेट की तरह होता है, घर परिवार में वह जैसा देखता है वैसा ही सीखता है। बचपन से ही जब घर परिवार में जादू टोने तथा अंधविश्वासों के कारण उसके मन में एक भय बैठ जाता है जो ताउम्र रहता है और यही अंधविश्वास पीढ़ी-दर- पीढ़ी चलता रहता है इसलिए जादू टोने के नाम पर बच्चों को ना डराएं।

अंधविश्वास से बचने के लिए गांव, कस्बे तथा छोटे शहरों में अधिक से अधिक समाज सेवी संस्थानों,गांव पंचायतों तथा पुलिसकर्मियों को सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है, जिससे महिलाओं को प्रताड़ना से बचाया जा सके, साथ ही टीवी के माध्यम से दिखाये जाने वाले जादू टोना तथा भूत प्रेत के
कार्यक्रमों पर रोक लगनी चाहिए। महिलाओं को भी यह जानना आवश्यक है कि जादू टोना से किस्मत नहीं बनाई जा सकती उन्हें स्वावलंबी जीवन जीने की सलाह दी जानी चाहिए।

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