युद्ध हो रहा है

युद्ध हो रहा है सूरत-ए-हाल दुनिया का ये क्या हो रहा है लौमड़ भर रहा तिजोरी और जोकर रो रहा है  जंग-ए -वतन में आम आदमी पिस रहा है अहम के सिलबट्टे पर राजा सेना को घिस रहा है  जो था कल तक महापंच सबका वही आज घर-घर जाकर जूते घिस रहा है  किस

कलम – कविता – वंदना जैन

कलमशब्द कम पड़ जाते हैंजब प्रेम उमड़ता है ढेर साराप्रियतम तक पहुचना चाह्ती है कलम दिल के हर जज्बात छोटी-बडी बातेंबातों मे मुलाकातेमुलाकतों मे बरसती बरसातेंदिन के एकाकी लम्हे सांझ की कुम्ह्लायी उदासीरातो मे जागती आखेंसपनों मे मिलन के

भिन्न भिन्न चेहरे 

भिन्न भिन्न चेहरे  अलग-अलग रंग औरअलग-अलग रूप के बहार से नहीं अंदर के ये चेहरे कोई है डरे सहमे,कोई खिले-खिले से चेहरे माँ जैसे परेशां,पिता जैसे क्रोधितबच्चों से बेफिक्र चेहरे संस्कारों में पले समय से

प्रेम एक स्वछंद धारा

प्रेम एक स्वछंद धारा एक प्रेम भरी दृष्टि और दो मीठे स्नेहिल बोलों से बना सम्पूर्ण भ्रह्मांड सा प्रेम कैसे समाएगा मिलन और बिछुड़न के छोटे से गांव में जहाँ खड़े रहते हैं अभिलाषाओं और अपेक्षाओं के

माँ – कविता – वंदना जैन

“माँ” मैं हूँ हिस्सा तुम्हारा और रहूंगी सदा छाया तुम्हारी  आज दूर हूँ तुमसे पर हर पल मन में है छवि तुम्हारी                   अपनी मुस्कानों की तुमने सदा की मुझ पर स्नेह वर्षा स्वयं को रखा पीछे और आगे रही ढाल तुम्हारी  अपना निवाला छोड़ा

तुम्हारा संदेसा आया

(तुम्हारा संदेसा आया) मेरे गीतों के स्वर तुमसे सजे हैं “प्रिय”दिन-रात कानों में गूँजें हैं कभी मौन ,कभी पायल पहन थिरकते हुए छम-छम बजे हैं शब्दों ने भी क्या माला बनाई नित जुड़ कर

स्त्रियां – कविता – वन्दना जैन

स्त्रियांजलप्रपात सी बजती छन-छन उछलती मचलती सरस सी जलधार सहज ,शीतल,सफ़ेद मोतियों का कंठ हार  प्रेम में मधुछन्द सी गूंजती कभी भय लिप्त हो आँखें मूंदती मानसिक उद्वेग को सागर सा समेटती  स्वयं की लिखी अनबुझ पहेली सी व्यक्त होती अव्यक्त सुन्दर

कागज और कलम – वन्दना जैन

कागज और कलम कागज और कलमकलम का गिटार लेकरथिरकने लगी मेरी उँगलियाँकागज के फर्श पर…हृदय और मस्तिष्क केसेतु पर झूलती हुई भवनाओंके गीत गाती…. कलम का हल लेकरये बस निकल पड़ी हैबन कर किसान…जोतने कागज का सीना…शब्द बीज अंकुरण की चाह

वक़्त – कविता वन्दना जैन

वक़्त बदलते हुए वक़्त मे मैंनेलाचार समुन्दर देखेपतवारों के इशारे औरलहरों के नजारे देखेनाचती हुई नावें देखीआँखें रुआंसी औरलब मुस्कुराते देखेमहलों मे बसते वीराने देखे रिश्तों की तंग गालियाँबचपन की मजबूरअटखेलियां देखीकई कहानियां

फागुन – (कविता)

भूली बिसरी यादों केकचे पक्के रंगों सेलौटे अनकहे कुछ गीतों सेभरा पूरा फागुन होकुछ आँखों के तीरों सेकुछ पलाश के कालीनों सेकापोलों को गुलालों सेरंग देने की उत्कंठा सेभरा पूरा फागुन होहोंठो की दबी मुस्कानों औरदिल मे दबे एहसासों कीभॅवरे सी

दुनियादारी – (कविता)

उम्र के महल मे घूमती देह कोझुरियों की नजर लग गईमाथे की सिल्वटेंचिंता के सिलबट्टे पर पिस गयीजीवन की आधी रातें सोच विचार मेऔर आधे दिन बेकार हो गएजो थे आंचल के पंछीअब हवा के साहूकार हो गएहर रोज कहती है जिंदगी मुझसेजाओ तुम तो बेकार हो गएहम भी

उदासी – कविता

कुछ कह रही है ये उदासीबात मेरी भीसुन लो जरा सीमाथे पर नुमायां होतीलकीरेंभी कुछ कह रही हैंमौन का क्वच पहनेवाणी की तलवार भीहोंठो की मयान मे रखी हैऔरदिमाग के महलमे उलझे सवालों के रेशेसे बनी चादर ओढ़ेलेटी है..फिर चादर उठाझरोखे से झांकती

सुंदरता दिल से होती है

सुंदरता दिल से होती हैदिल सुंदर तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भीसुंदर दिखाई देता हैदिमाग का केंद्र बिंदुबाहरी सुंदरता पर टिका होता हैवह नापता रहता हैदेह की लंबाई,परिधिउभारों मेऔर उलझा रहता हैअपनी गणित केप्रमेय और कठिन सवालों मे…नहीं परख पाता

विकल्प – कविता (वन्दना जैन)

विकल्पअब क्या विकल्प हैस्वयं से संकल्प हैअंधेरों को विराम दूँचाॅद को सलाम दूँया तारों को लगाम दूँजीवन तो अल्प हैआशा ही कल्प हैअब क्या विकल्प हैजो दिखे सत्य हैछुपा हुआ कृत्य हैतन की फैली बाहें हैंमन की सिकुड़ी राहें हैंरिश्तों मे भेद हैहर

फिर से लिखने चली हूँ

फिर से शब्द संजोने लगी हूँफिर से पत्र लिखने लगी हूँ इस बार थोडी चिंतित हूँशब्दों की लड़ाई से भयभीत हूँ कुछ पुराने स्नेह से सने पुष्प सेकुछ नए बैरंग शुष्क कागजी सेइनके अंतर्द्वंद मे उलझ गयी हूँ मन:स्थति उमड़ घुमड़ रही हैउंगलियों को
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