कागज और कलम – वन्दना जैन

कागज और कलम कागज और कलमकलम का गिटार लेकरथिरकने लगी मेरी उँगलियाँकागज के फर्श पर…हृदय और मस्तिष्क केसेतु पर झूलती हुई भवनाओंके गीत गाती…. कलम का हल लेकरये बस निकल पड़ी हैबन कर किसान…जोतने कागज का सीना…शब्द बीज अंकुरण की चाह

वक़्त – कविता वन्दना जैन

वक़्त बदलते हुए वक़्त मे मैंनेलाचार समुन्दर देखेपतवारों के इशारे औरलहरों के नजारे देखेनाचती हुई नावें देखीआँखें रुआंसी औरलब मुस्कुराते देखेमहलों मे बसते वीराने देखे रिश्तों की तंग गालियाँबचपन की मजबूरअटखेलियां देखीकई कहानियां

फागुन – (कविता)

भूली बिसरी यादों केकचे पक्के रंगों सेलौटे अनकहे कुछ गीतों सेभरा पूरा फागुन होकुछ आँखों के तीरों सेकुछ पलाश के कालीनों सेकापोलों को गुलालों सेरंग देने की उत्कंठा सेभरा पूरा फागुन होहोंठो की दबी मुस्कानों औरदिल मे दबे एहसासों कीभॅवरे सी

दुनियादारी – (कविता)

उम्र के महल मे घूमती देह कोझुरियों की नजर लग गईमाथे की सिल्वटेंचिंता के सिलबट्टे पर पिस गयीजीवन की आधी रातें सोच विचार मेऔर आधे दिन बेकार हो गएजो थे आंचल के पंछीअब हवा के साहूकार हो गएहर रोज कहती है जिंदगी मुझसेजाओ तुम तो बेकार हो गएहम भी

उदासी – कविता

कुछ कह रही है ये उदासीबात मेरी भीसुन लो जरा सीमाथे पर नुमायां होतीलकीरेंभी कुछ कह रही हैंमौन का क्वच पहनेवाणी की तलवार भीहोंठो की मयान मे रखी हैऔरदिमाग के महलमे उलझे सवालों के रेशेसे बनी चादर ओढ़ेलेटी है..फिर चादर उठाझरोखे से झांकती

सुंदरता दिल से होती है

सुंदरता दिल से होती हैदिल सुंदर तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भीसुंदर दिखाई देता हैदिमाग का केंद्र बिंदुबाहरी सुंदरता पर टिका होता हैवह नापता रहता हैदेह की लंबाई,परिधिउभारों मेऔर उलझा रहता हैअपनी गणित केप्रमेय और कठिन सवालों मे…नहीं परख पाता

विकल्प – कविता (वन्दना जैन)

विकल्पअब क्या विकल्प हैस्वयं से संकल्प हैअंधेरों को विराम दूँचाॅद को सलाम दूँया तारों को लगाम दूँजीवन तो अल्प हैआशा ही कल्प हैअब क्या विकल्प हैजो दिखे सत्य हैछुपा हुआ कृत्य हैतन की फैली बाहें हैंमन की सिकुड़ी राहें हैंरिश्तों मे भेद हैहर

फिर से लिखने चली हूँ

फिर से शब्द संजोने लगी हूँफिर से पत्र लिखने लगी हूँ इस बार थोडी चिंतित हूँशब्दों की लड़ाई से भयभीत हूँ कुछ पुराने स्नेह से सने पुष्प सेकुछ नए बैरंग शुष्क कागजी सेइनके अंतर्द्वंद मे उलझ गयी हूँ मन:स्थति उमड़ घुमड़ रही हैउंगलियों को
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