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कविता

फागुन – (कविता)

भूली बिसरी यादों के
कचे पक्के रंगों से
लौटे अनकहे कुछ गीतों से
भरा पूरा फागुन हो
कुछ आँखों के तीरों से
कुछ पलाश के कालीनों से
कापोलों को गुलालों से
रंग देने की उत्कंठा से
भरा पूरा फागुन हो
होंठो की दबी मुस्कानों और
दिल मे दबे एहसासों की
भॅवरे सी गूंजे गुनगुन हो
ऐसा इस बार फागुन हो

वंदना जैन मुंबई निवासी एक उभरती हुई लेखिका हैं | जीवन दर्शन,सामाजिक दर्शन और श्रृंगार पर कविताएं लिखना इन्हे बहुत पसंद है | समय-समय पर इनकी कविताएं कई अख़बारों और पत्रिकाओं में छपती  रही हैं | इनका स्वयं का काव्य संकलन "कलम वंदन" भी प्रकाशित हो…

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