बड़े – कविता

बड़े

बरगद के जैसे ये पेड़,
रक्षक हैं जैसे कि शेर,
तम को करें बिल्कुल ही ढेर,
ये जल्दी, मैं हूँ बस देर ।

ईश के ये अवतार,
इनसे ही है हर बहार,
तेज़ इनकी हर धार,
मेरे जीवन का ये सार ।

इनके अहसान अनगिनत,
मैं ज़मीं, ये मेरी छत,
मेरी हर ये सरहद,
मैं स्याही, ये मेरे खत ।

मेरी हैं ये ही तो ढाल,
मैं तीर, ये मेरी कमान,
इनसे मेरी ही पहचान,
इनके दम पर मुझमें जान ।

इनसे बड़ा ना मेरा शुभचिंतक,
दिए मुझे सारे ही तो हक,
ये दिल, मैं हूं धकधक,
विश्वास सदा, ना कोइ शक ।

मैं ख़ुश तो ये हों प्रसन्न,
मैं दुखी तो ये हों सन्न,
ये मेरे तन मन धन,
इनपर सब कुछ अर्पण ।

इनसे ही पाए संस्कार,
ये जैसे हर कोई द्वार,
लग गए जैसे चांद चार,
मेरी तो ये ही पतवार ।

मेरे तो ये ही गुरु,
इनसे ही कहानी शुरू,
जितनी भी तारीफ़ करूं,
कम पड़े, और भरूं ।

तप की हैं ये तो मिसाल,
ये जवाब, मैं हूँ सवाल,
दोस्त सखा, साझा हों हाल,
इनके बिन हर कोई कंगाल ।

इनसे ही हर रिश्ता,
ये जैसे हो फ़रिश्ता,
प्यार ही बस है रिस्ता,
ऐसा नाता कभी ना घिसता ।

स्वरचित – अभिनव ✍🏻

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