वास्तव में बड़े बनें – कविता

वास्तव में बड़े बनें…

घर के जो हों बड़े,
आपस में गर ये लड़ें,
ज़िद पे ओर जाएं अड़े,
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

मिट्टी के हैं ये भी घड़े,
मद में जो होयें खड़े,
बिखरे इसलिए हैं ये पड़े,
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

देख दूजा गर जो डरे,
सहमे धमके और बिफरे,
इज़्ज़त फ़िर कोई ना करे,
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

इनकी अपनी मनवाने चले,
और ना ये विश्वास करें,
बातों के बस पीछे पडें,
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

साझा जज़्बा ना करें,
दोष ख़ुद पे कभी ना मड़ें
दूजे के उल्टा ऊपर चड़ें,
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

दीवार ख़ुद ही पक्की करें,
खालीपन ख़ुद से ही भरें,
इनके सब बस पाँव पड़ें
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

अपनी मनमानी ये करें,
दूजा पेश हो कटघरे,
जीते जी फ़िर रिश्ते मरें,
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

ग़लती बस दूजा करे,
ये ना कभी समझौता करें,
दूर तब ही हों अपने,
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

ये भी तो अंतर्ध्यान करें,
कमी गुण सबमें हैं भरे,
दूजे गर गधे बकरे,
फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ?

दोस्ती की मिसाल बनें,
सुनाएं और ये भी सुनें,
प्यार से मनाएं मनें,
तभी बड़े, बड़े बनें ।।।

स्वरचित – अभिनव ✍

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