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कविता

आज़ादी की क़ीमत

आज़ादी की क़ीमत अगस्त का मास,आती है याद,शूरवीरों की,तप की तस्वीरों की । जागता है जज़्बा,तैयार शहर क़स्बा,सनक कुछ करने की,देश पे मर मिटने की । उमड़ता है जुनून,नशा जोश धुन,देश लगे सर्वप्रथम,इसमें जैसे जाते रम । खाते हैं सौगंध,माटी की

एक जीवन ऐसा भी……

एक जीवन ऐसा भी…… जीवन की तन्हाई को महसूस करसांसों को रोके जा‌ रहा‌ हूं मैं ।नुमाईसें तो बहुत‌ हैं मेरे अंदरफिर भी प्यार निभा रहा हूं मैं।। किस ने देखी दीपक की बातीकि वो अंधियारे को मिटा देती‌ है।फिर भी हे साखी !‌‌ ‌ ‌ ‌ ‌‌‌ ‌ उसी‌ को

रफ़ाल – बेमिसाल

रफ़ाल - बेमिसाल रफ़ाल,तूफानी चाल,दुश्मन बेहाल,जी का जंजाल । करे तेज़ प्रहार,माने नहीं हार,बेहद असरदार,सिर पे ये सवार । आधुनिक विज्ञान,ये लड़ाकू विमान,भारत की जान,थामी है कमान । ना निशाना चुके,गहरे मंसूबे,शत्रू पे टूटे,सबकुछ ये

मेरा सैनिक, मेरी जीत

मेरा सैनिक, मेरी जीत … आज कारगिल दिवस,हूँ मैं नतमस्तक,दुश्मन हो जब तक,मेरा वीर सजग । इसकी कुर्बानी,छोड़ी ज़िन्दगानी,कीमत जो जानी,सार्थक है कहानी । वो डटा रहा,ना कभी झुका,वो था भूखा,दुश्मन को भुना । ना पीछे हटा,जज़्बा ना

सत्य को सहारा दो

सत्य को सहारा दो दीपक हूँ मैं मुझे रोशन होने दोतुम्हे‌ न्याय दिलाने के‌ लिए मुझे लड़ने दोजली है समा मेरे भीतर परोपकार कीमुझे ईक ऩजर भरकर सत्य को देखने दोनहीं जानता कब और कैसे होगी जीत मेरीलेकिन तुम सच्चाई के लिए मेरा साथ तो‌ दोमै जानता

इश्क की गली

इश्क की गली हमको, रास ना आएजो रास आए ,उसको हम खो ना पाएंएक नाव पर सवार होकर,चलना चाहता हू़ंतु ही नाविक है ए-खुदा,जिन्दड़ी पार लगाई

“नाज़” – कविता

हुजूर ज़रा बचना ये इश्क़ बीमारी लाइलाज़ है टूटा हुआ शख़्स लिखता है ये उसका अंदाज़ है !! लब़ों पर रहती होगी मुस्कान हमेशा दिखावे की कभी गौर से सुनना उनकी दर्द भरी आवाज़ है !! टल जाती है दुआ और दवा बेअसर इस मर्ज़ की इश्क़ में

मैं पथ हूँ

मैं पथ हूँ, मेरा ह्रदय छलनी मत करो मैं रोता हूँ, तुम देखने की कोशिश करो क्या गुनाह किया मैंने जो दर्द

संगीत‌ मे ईश्वर

वो जो खुमार है,वो बेसुमार है‌‌‌‌‌‌‌‌ वो दिल की दिवारों पर सवार है, वो जो सवार है,वो घुड़सवार हैसूनो ,इसे तो घोड़े से ही प्यार है, वो जो प्यार है,वो ही एतबार हैसुनो ,वही तो प्रमुख गीतकार है, वो जो गीत है,वो ही स़गीत‌ हैदेखो,वही तो

सत्य जीवन का

मै जीवन की आशाओं में खोया थामै ज़ीवन की निराशाओं मे रोया थाउस मौत-ए-महबूबा को भूलकरमै कल उठने के लिए सोया था रात के घनघोर अंधेरे मे किसी ने मेरे,दिल-ए द्वार पर यकायक दस्तक दीमै एकाएक चौंका और इज़्तिराब सेआंखें खोलकर उठ खड़ा हुआ मैने

बड़े – कविता

बड़े बरगद के जैसे ये पेड़,रक्षक हैं जैसे कि शेर,तम को करें बिल्कुल ही ढेर,ये जल्दी, मैं हूँ बस देर । ईश के ये अवतार,इनसे ही है हर बहार,तेज़ इनकी हर धार,मेरे जीवन का ये सार । इनके अहसान अनगिनत,मैं ज़मीं, ये मेरी छत,मेरी हर ये सरहद,मैं

वास्तव में बड़े बनें – कविता

वास्तव में बड़े बनें… घर के जो हों बड़े,आपस में गर ये लड़ें,ज़िद पे ओर जाएं अड़े,फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ? मिट्टी के हैं ये भी घड़े,मद में जो होयें खड़े,बिखरे इसलिए हैं ये पड़े,फ़िर क्या बड़े, फ़िर क्या बड़े … ? देख दूजा गर जो डरे,सहमे

मेरी गुड़िया की एक कहानी

मेरी गुड़िया की एक कहानी मेरी गुड़िया की एक कहानीसुन दोस्त मेरी तुमको बतलानीस्कूल को जब मैं जाती थीघर छोड़ उसे मैं आती थीलौटती वापस शाम को जब मैंअकेली दुखी पाती उसे तब मैंमेरी गुड़िया की थी एक परेशानीसंग स्कूल उसे मुझे ले जानी मेरी

मन का शोर – शशिकांत सिंह

बिन पूछे सदा जो उड़ता ही चलेएक पल को भी कभी जो ना ढलेहै अटल ये टाले से भी ना टलेना जाने थामे कोई कैसे इसकी डोरकरे बेबस बड़ा ये मन का शोर राजा रंक हो चाहे साधु संत ही भलेमूर्ख चतुर सबको छलिया ये छलेयुगों से रंजिश में इसकी हर इंसान जलेहै

मज़दूर नहीं, वो है मजबूर

मज़दूर नहीं, वो है मजबूर मज़दूर यानि श्रमिक,परिश्रम का प्रतीक,मेहनत का वैज्ञानिक,अनथक दौड़ता जीव । चौबीसों घंटे मुशक्कत,करता कर्म निष्कपट,चले जाता धर्मपथ,अद्भुत कला महारत । विकास इसीके कारण,हर समस्या का निवारण,तन मन करे है

कोरोना

कोरोना किसका रोना ?काहे का रोना ?आजकल सोते-जागते बस,कोरोना ही कोरोना। कोरोना वायरस डिजिज सेदिसम्बर 2019 को अस्तित्व में आया,नाम कोविड 19 पायातब से लगातार मचा रहा कोहरामइंसानी जिंदगी को कर दिया हराम सबसे कहता कोरोनाकोईरोड़ परना

ज़िंदगी – कविता अभिनव कुमार

ज़िंदगी ज़िंदगी एक बोझ है,आज के इंसान की यही खोज है । अरे ज़िंदगी तो एक बहार है,जीना आए तो प्यार, नहीं तो पहाड़ है । ज़िंदगी तो एक गीत है,उसे जीना ही एक जीत है । जो इसे ना जी सके, उसपर धिक्कार है,डर – डरकर जो जीता है, उसकी ज़िंदगी का

हम दिहाड़ी मजदूर कहाते

कर श्रम घर का बोझ उठाते हैं जब रोज कमाते तब खाते बेबस लाचारी में ही जीवन गवांते ना खुद पढ़े खूब ना बच्चे पढ़ा पाते हम दिहाड़ी मजदूर कहाते ना सपने आंखों पर अपने सज पाते बन आंसू पलकों से वो गिर जाते लक्ष्मी सरस्वती
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