Browsing Category

कविता

असमंजस – अब बस …

असमंजस - अब बस … तुम भी सही,मैं भी सही,ग़लत बात फ़िर,किसने कही ? दिल की बात,दिल ही में रही,मैं हूँ वही,मैं था वही । ताने बाने बस,बुनते रहे,सिर्फ कमियां ही,चुनते रहे । रही सही कसर,गलतफहमियां खा गईं,जाने कैसी !रिश्तेदारी निभा गईं ।

फ़र्क देखिए (1) बनाम (2) में ज़मीन आसमान का

फ़र्क देखिए (1) बनाम (2) में ज़मीन आसमान का :- (1) "चलो आज मुस्कुराते हैं" - तालिबानी गुनगुनाते हैं,दहशत बड़ी फैलाते हैं, निर्दोष मारे जाते हैं,औरतों पे ज़ुल्म ढाते हैं, आबरू भी ढहाते हैं,वे कल को भूल जाते हैं, बस

अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से कहे …

अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से कहे … सोचता था मैं पहले कि तुम,मेरे रक्षक, मुझको घेरे हो,आज मग़र अहसास हुआ कि,तुम तो निकले सौतेले हो । दहशत, दर्द, ज़ुल्म, आतंक,ना जाने क्या क्या दे रहे हो,पाल पोस तुम्हें बड़ा किया,तुम बने मेरे ही लुटेरे हो ।

कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो !

कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो ! … कैसे कह दूं कि तुम नहीं मेरे हो !तुम मेरे नहीं, पर मेरे हो,ज़रूरी नहीं कि बन्धन हों, फ़ेरे हों,तन जुदा हैं, पर मन में तो ठहरे हो,रूहें तृप्त जब रिश्ते गहरे हों ।

जय हिंद …

जय हिंद … सैनिक है बैठा सीमा पर,सिर्फ़ तेरी मेरी ख़ातिर,मैं और तू तो हैं घर पर,वो जैसे एक मुसाफ़िर । अपनी तो जान बचाने की,ना उसको कोई है परवाह,एक मैं और तू ही लड़ते हैं,क्या मंदिर, मस्जिद, दरगाह ! सबकुछ तो उसने त्यागा है,देशभक्ति ना

पन्द्रह अगस्त‌ की उस गाथा को, हम यूं ही नहीं गाते हैं।।

बहुत कठिन था वो दौर,जिसको आज हम याद करते हैं ।पन्द्रह अगस्त‌ की उस गाथा को,हम यूं ही नहीं गाते हैं।। मंगले पांण्डे चढा फांसी पर,लक्ष्मी बाई के हम दिवाने है ।पन्द्रह अगस्त‌ की उस गाथा को,हम यूं ही नहीं गाते हैं।।

स्वतंत्रता – वरदान या अभिशाप

स्वतंत्रता - वरदान या अभिशाप … गुमसुम नादान,अचंभित हैरान,बांहें फैलाए,खड़ा हर इंसान । आया यकायक याद,हुई आज आबाद,है मेरा दिवस,मेरी वर्षगांठ । आज़ादी इतराई,थोड़ा मुस्काई,थी चेहरे पे,रंगत जो छाई । वो हिन्द की जान,उसका ईमान,छीनने से

भारत का शेर – नीरज चोपड़ा

भारत का शेर … नीरज चोपड़ा,गाँव का छोकरा,किया तिरंगा ऊंचा,हिन्द खुशी से रो पड़ा । जीता दिल,प्रदर्शन उत्कृष्ट,हासिल स्वर्ण पदक,बदली पुरानी रीत । सोने की चिड़िया,के माथे पे बिंदिया,याद करेंगी,शतकों तक पीढ़ियां । उठाया भाला,बड़ी दूर

आदमी (कविता)

आदमी कहीं खो गया है आभासी दुनिया में आदमीझुंठलाने लगा है अपनी वास्तविकता को आदमीपरहित को भूलकर स्वहित में लगा है आदमीमीठा बोलकर ,पीठ पर वार करता है आदमीचलता जा रहा है सुबह शाम आदमीपता नहीं किस मंजिल पर पहुँच रहा है आदमीअपनी तरक्की की परवाह

जीवन – कविता

जीवनरोने से क्या हासिल होगाजीवन ढलती शाम नहीं हैदर्द उसी तन को डसता हैमन जिसका निष्काम नहीं है ।। यह मेरा है ,वह तेरा हैयह इसका है ,वह उसका हैतोड़ फोड़ ,बाँटा -बाँटी का ,गलत इरादा किसका हैकर ले अपनी पहचान सहीतू मानव है ,यह जान सहीदानवता

एक लड़की की कहानी

एक लड़की की कहानी एक लड़की जो सच में बहुत खूबसूरत थी।मानो जैसे संगमरमर की जागती मूरत थी। उसके साथ हर पल उसके बहुत अपने थे।उसकी खुली आंखों में भी बहु बड़े सपने थे। वह भी एक दिन आगे बढ़ना चाहती थी।हवाओं के साथ आजाद उड़ना चाहती थी।

प्यार की बात

प्यार की बात बस एक बार तुम्हारे करीब आकर।तुम्हारी नज़रों से ये नजरें मिलाकर। तुम्हारे चाँद से चेहरे का दीदार कर।तुम्हारी रेशमी जुल्फों को सवांर कर। तुम्हारे हाथों को अपने हाथ में लेकर।हर दिन तुमको अपने साथ में लेकर। तुम्हारे साथ

इश्क़ का इज़हार

इश्क़ का इज़हार बहुत ही आसान है किसी को दिल से प्यार करना।लेकिन आसान नहीं होता इश्क़ का इज़हार करना। अब देख लो हम भी तुमसे बातें तो हजार करते हैं।लेकिन कहने से डरते हैं, कि तुमसे प्यार करते हैं। अगर ये समाज प्यार करने वालों को ताने न

संतुष्टि …अंतर्मन की पुष्टि …

संतुष्टि …अंतर्मन की पुष्टि … लिखते लिखते ऊब गया हूँ,ना जाने क्यूँ यूं डूब गया ?चलते चलते रुक गया हूँ,अपने आप ही झुक गया हूँ । लिखने से क्या होगा हासिल,क्या जाएगी मंज़िल मिल ?आए सवाल ये रात और दिन,क्या होगा सपना मुमकिन ? व्हाट्स ऐप

समय चक्र की मार

समय चक्र की मार वर्तमान में हो गया, बुरा सभी का हाल।समय चक्र की मार से, हुए सभी बेहाल।। दर-दर थे भटके सभी, मित्रों पिछले साल।समय चक्र की मार से, हुए सभी बेहाल।। विपदा का फिर आ गया, पुनः सामने काल।समय चक्र की मार से, हुए सभी

ज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलो

ज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलोसफर को हमसफर बनाते‌ चलो ।हर ग़म से भी बे'ग़म होते चलोज़िन्दगी‌ का गीत गुनगुनाते चलो ।। है ग़ुलिस्तां गुल ये,कह रहे हैं सभीमांगने से ना मिलेगी फिर ज़िंदगी ।तन्हाई को मुस्कुराकर सहते चलोज़िन्दगी‌ का गीत

वो बात नहीं रही

लगता तेरे जहां मे इंसानों की कदर नहीं रहीतभी तो इंसान को इंसानों से चाहत‌ नहीं रही ।। लगता‌ है जा रहे हैं सुनहरे पल इस ज़माने केतभी तो एक- दूसरे घर में वो बैठक नहीं रही ।। लगता है बीत रहा है मेहमानों वाला दौर भीतभी तो स्वागत करने वाली

‘काश’ बनाम ‘आ-काश”

'काश' बनाम 'आ-काश" काश मेरी कोई बहन ही होती !साथ में हँसती, साथ में रोती । काश मेरा कोई भाई होता !राज़दार चाहे बड़ा या छोटा । काश मेरे भी रिश्ते होते !मेरे साथ फ़िर फ़रिश्ते होते । काश मेरे भी दोस्त होते !आपस में रोज़ न्योते होते ।
error: Content is protected !!