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कविता

युद्ध हो रहा है

युद्ध हो रहा है सूरत-ए-हाल दुनिया का ये क्या हो रहा है लौमड़ भर रहा तिजोरी और जोकर रो रहा है  जंग-ए -वतन में आम आदमी पिस रहा है अहम के सिलबट्टे पर राजा सेना को घिस रहा है  जो था कल तक महापंच सबका वही आज घर-घर जाकर जूते घिस रहा है  किस

रवि – कविता -अक्षी त्रिवेदी

रवि शब्दों से रचा हुआ खेल कभी,कहाँ किसिको समझ में आया हैं,दूर से सब देख रहा वो,पर कभी क्या समझाने आया हैं? मन से विचलित होकर वो भी,कहीं अपनी काया काली न कर जाए,देख रहा है वो तो कलयुग,कहीं इसका दर्शक न बन जाए। डर लग रहा बस इसी बात

कलम – कविता – वंदना जैन

कलमशब्द कम पड़ जाते हैंजब प्रेम उमड़ता है ढेर साराप्रियतम तक पहुचना चाह्ती है कलम दिल के हर जज्बात छोटी-बडी बातेंबातों मे मुलाकातेमुलाकतों मे बरसती बरसातेंदिन के एकाकी लम्हे सांझ की कुम्ह्लायी उदासीरातो मे जागती आखेंसपनों मे मिलन के

भिन्न भिन्न चेहरे 

भिन्न भिन्न चेहरे  अलग-अलग रंग औरअलग-अलग रूप के बहार से नहीं अंदर के ये चेहरे कोई है डरे सहमे,कोई खिले-खिले से चेहरे माँ जैसे परेशां,पिता जैसे क्रोधितबच्चों से बेफिक्र चेहरे संस्कारों में पले समय से

प्रेम एक स्वछंद धारा

प्रेम एक स्वछंद धारा एक प्रेम भरी दृष्टि और दो मीठे स्नेहिल बोलों से बना सम्पूर्ण भ्रह्मांड सा प्रेम कैसे समाएगा मिलन और बिछुड़न के छोटे से गांव में जहाँ खड़े रहते हैं अभिलाषाओं और अपेक्षाओं के

माँ – कविता – वंदना जैन

“माँ” मैं हूँ हिस्सा तुम्हारा और रहूंगी सदा छाया तुम्हारी  आज दूर हूँ तुमसे पर हर पल मन में है छवि तुम्हारी                   अपनी मुस्कानों की तुमने सदा की मुझ पर स्नेह वर्षा स्वयं को रखा पीछे और आगे रही ढाल तुम्हारी  अपना निवाला छोड़ा

तेरे शहर में आने का दिल करता है बार बार

तेरे शहर में आने का दिल करता है बार बार...मैं ढूँढता हूँ बार बार, तुझे देखने के बहाने हजार,  अब तो तुझसे मिलने को, ये निगाहे हैं बेक़रार, तेरे बिना जिंदगी की हर तमन्ना है अधूरी,  अब तुझसे मिलकर मिटानी है ये दूरी...तेरे शहर में आने

तुम्हारा संदेसा आया

(तुम्हारा संदेसा आया) मेरे गीतों के स्वर तुमसे सजे हैं “प्रिय”दिन-रात कानों में गूँजें हैं कभी मौन ,कभी पायल पहन थिरकते हुए छम-छम बजे हैं शब्दों ने भी क्या माला बनाई नित जुड़ कर

स्त्रियां – कविता – वन्दना जैन

स्त्रियांजलप्रपात सी बजती छन-छन उछलती मचलती सरस सी जलधार सहज ,शीतल,सफ़ेद मोतियों का कंठ हार  प्रेम में मधुछन्द सी गूंजती कभी भय लिप्त हो आँखें मूंदती मानसिक उद्वेग को सागर सा समेटती  स्वयं की लिखी अनबुझ पहेली सी व्यक्त होती अव्यक्त सुन्दर

काश तू कभी मिली ना होती

काश तू कभी मिली ना होती तो अच्छा होता  दोस्तों के बहकावे मे ना आया होता तो अच्छा होता!! तुमने नजाने मुझसे क्यू बड़ाई नजदीकिया, अगर छोड़ना ही था तो ठीक थी ये दूरियाँ! मैंने तो कभी तुझसे प्यार ना किया, तेरे हां कहने से मैंने

फायदा ही क्या है

बे'वजह ,असमय बोलने मे‌ तेरा फायदा ही क्या है, अपनी कमजोरियों को दिखाने से फायदा ही क्या है ।। सबको मालूम यहां स्वार्थी लोग निवास करने लगे हैंफिर तेरे स्वार्थी या निस्वार्थी बनने‌ से फायदा ही क्या है || अजय माहिया

कुछ शेर ‘उन’ के नाम

कुछ शेर 'उन' के नाम लहरों के यूं ही किनारे खुल गएसुना है उनको बागी हमारे मिल गए,ये उफनती हुई लहरें खामोश भी होंगीहमको भी कुछ नए सहारे मिल गए। वो अब नहीं पूछा करते हैं हमें अक्सर अपनी बातों मेंकई मुद्दत के लिखे खत उन्हें हमारे मिल

टिप टिप टिप टिप बूंदे

टिप टिप टिप टिप बूंदेटिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरमन में कौंधा सा हुआ मेघ घिरे घनघोर। टिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरपढ़ा लिखना ताक धर हो गए भाव विभोर। टिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरधक धक कर दिल झूमता

मंजिल – कविता – ईश शाह

ए मुसाफ़िर थक गया है तो थोड़ा आराम कर ले,फिर उठ और अपनी मंजिल अपने नाम कर ले । इतना मत भागथोड़ा ठहराव कर ले,सब से हो गई हो तोअब खुद से बात कर ले । दिन तो बित ही गयासरगर्मी सी रात कर ले,जो चेहरे पर हंसी रखेउन शब्दों को साथ कर ले ।

जिंदगी

कभी हास्य बद बनती है जिंदगीकभी शोक ग्रस्त बनती है जिंदगीकभी खेल खेलती है जिंदगीचलते सफर में कुछ याद आयाकभी सोचता हू यू हिसाब मत लेप्यारी मद होश जिंदगी।।

कविता-बचपन

कविता-बचपन कल की ही बात थी वो,जब गुड्डे-गुड्डियों‌ का खेल था ।बस.. वो ही यह दिन था,जिसमे बचपन का मेल था ।। वो आए,तुम गए,तुम आए,वो गए,फिर से सब आए ।काश वो घरौंदे बनाने, बचपन वाले दिन फिर आए ।। वो माँ की गौद मे खेलना ,फिर उठकर भाग

प्रेम है, बसंत हैं।

प्रेम है, बसंत हैं। राह तकती है पंखुड़ियांतितलियों कीजानती है वे बैठ बालियों परपराग निचोड़ उड़ जाएंगीफिर भी जाने क्योंउन्हें आस रहता सदावे आ कर फूलो बढ़ता बोझसोख़ बसंत खिलाएंगी। नीली पाखी चहकते-मटकतेआ बैठी फिर ठूंठ परतिनका दबाए

आया वसंत

मन में उमंगतन में तरंगखिल उठे रंगभर भर उमंगआया वसंत !आया वसंत !! सृष्टि मचलखिले पुष्प दलकरवट बदलभर भर उमंगआया वसंत !आया वसंत !! नई राह चुनकोई साध धुनसंधान करभर भर उमंगआया वसंत !आया वसंत !! बँधनो को तोड़ केउलझनों को छोड़ केआरम्भ

किस्से

किस्से,कुछ किताबीकुछ खयाली,पन्नों के बीचठूंठ पत्तियों की तरह,बेजान और अंजान,चेतना केनिचले सतह सेतैरकरमन की शिथिलसतह कोउद्विग्न करतेचले जाते है। किस्से,कुछ किताबीकुछ खयाली।

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 7

जिसका भी बस चल रहा है,वो रंग बदल रहा है,मैंने सोचा "करूँ मैं भी प्रयत्न",मुझको मगर बुरा लग रहा है l अभिनव कुमार सबसे ऊपर दृढ़-विश्वास,पर्वत नहीं कहीं आस-पास,पूर्ण हो जब पर्वतारोहण,पाँव तले संपूर्ण पहाड़ अभिनव कुमार किसी से मैं
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