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कविता

टिप टिप टिप टिप बूंदे

टिप टिप टिप टिप बूंदेटिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरमन में कौंधा सा हुआ मेघ घिरे घनघोर। टिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरपढ़ा लिखना ताक धर हो गए भाव विभोर। टिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरधक धक कर दिल झूमता

मंजिल – कविता – ईश शाह

ए मुसाफ़िर थक गया है तो थोड़ा आराम कर ले,फिर उठ और अपनी मंजिल अपने नाम कर ले । इतना मत भागथोड़ा ठहराव कर ले,सब से हो गई हो तोअब खुद से बात कर ले । दिन तो बित ही गयासरगर्मी सी रात कर ले,जो चेहरे पर हंसी रखेउन शब्दों को साथ कर ले ।

जिंदगी

कभी हास्य बद बनती है जिंदगीकभी शोक ग्रस्त बनती है जिंदगीकभी खेल खेलती है जिंदगीचलते सफर में कुछ याद आयाकभी सोचता हू यू हिसाब मत लेप्यारी मद होश जिंदगी।।

कविता-बचपन

कविता-बचपन कल की ही बात थी वो,जब गुड्डे-गुड्डियों‌ का खेल था ।बस.. वो ही यह दिन था,जिसमे बचपन का मेल था ।। वो आए,तुम गए,तुम आए,वो गए,फिर से सब आए ।काश वो घरौंदे बनाने, बचपन वाले दिन फिर आए ।। वो माँ की गौद मे खेलना ,फिर उठकर भाग

प्रेम है, बसंत हैं।

प्रेम है, बसंत हैं। राह तकती है पंखुड़ियांतितलियों कीजानती है वे बैठ बालियों परपराग निचोड़ उड़ जाएंगीफिर भी जाने क्योंउन्हें आस रहता सदावे आ कर फूलो बढ़ता बोझसोख़ बसंत खिलाएंगी। नीली पाखी चहकते-मटकतेआ बैठी फिर ठूंठ परतिनका दबाए

आया वसंत

मन में उमंगतन में तरंगखिल उठे रंगभर भर उमंगआया वसंत !आया वसंत !! सृष्टि मचलखिले पुष्प दलकरवट बदलभर भर उमंगआया वसंत !आया वसंत !! नई राह चुनकोई साध धुनसंधान करभर भर उमंगआया वसंत !आया वसंत !! बँधनो को तोड़ केउलझनों को छोड़ केआरम्भ

किस्से

किस्से,कुछ किताबीकुछ खयाली,पन्नों के बीचठूंठ पत्तियों की तरह,बेजान और अंजान,चेतना केनिचले सतह सेतैरकरमन की शिथिलसतह कोउद्विग्न करतेचले जाते है। किस्से,कुछ किताबीकुछ खयाली।

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 7

रोने के हम आदि हैं,क्या करें - 'बेहद जज़्बाती हैं' !आपने ये कहके ठुकरा दिया,कि 'हम तो निराशावादी हैं' !अभिनव कुमार नाराज़ शीघ्र हो जाता हूँ,और मुँह भी बहुत बनाता हूँ',धन्यवाद इस अभिवादन का,मैं बोलने से कतराता हूँ ।अभिनव कुमार मेरा हर

बेमतलबी बचपन

बेमतलबी बचपन बातें थी,बेमतलब, बेख़ौफ़बेवजह, बकवास। बचपन था,बेसब्र, अल्हड़हैरान-परेशान, मासूम। दोस्ती थी,सुकून, शरारतीबगावती, मनमौजी। सोचती हूं, आज बचा है क्या हैबस, छुटपन की कुछ यादेंआम का पेड़, कैरीगपशप वाला टूटा-जर्जर

मैं…ख्वाब…और जाम !

मैं…ख्वाब…और जाम ! चाहत की है बात नहींमैंने सब यूं ही छोड़ दियाकैसे तेरे पास रुकूंवेवजह कुछ करना छोड़ दिया जब जब मैं जाता राह अटकमैंने चांद निहारा सुबह तलकसब ख्वाब हैं मेरे चुभन भरेये जानके सबको तोड़ दिया टूटे ख्वाबों को मज़ार

मेरा कीमती उपहार

मेरा कीमती उपहार …. हाय ये कैसा भौतिकवादी युग !भोग, लालसा, धन की बस भूख,क्या चाहिए, कुछ पता नहीं,सबकुछ सम्मुख, फ़िर भी दुख । केवल दिखावे की है होड़,दौड़, दौड़, बस अंधी दौड़,रिश्ते ताक रहें हैं मुँह,अपने दिए अब पीछे छोड़ । कुछ ओर ही चाहे

अजय महिया छद्म रचनाएँ – 6

भूली-बिसरी यादों का झरोखा हूं मै,कभी इन झरोखों से झांक कर देखो …तेरा वज़ूद नज़र आएगा ।।अजय महिया माँ- मेरा हृदय हैतो बहन -मेरी सांस,पिता मेरी धड़कन हैतो भाई मेरी ज़ान,दोस्त मेरा घर हैतुम मेरी जहान् ।।अजय महिया मिले भी तो क्या हुआ,दिल

कर्मठ बनो

कर्मठ बनो भूलना भूल जाओ सूली पर झूल जाओ,दिन देखो ना रात अभी आंखों में तुम खून लाओ,हरा भरा होगा सब जीवन बीज तुम्हारे अंदर है,चेहरा और चमन चमकेगा एक बार बस खिल जाओ। संघर्ष करो दृणता लाओ अपना घर आंगन महकाओ,जैसे रस्सी काटे पत्थर ऐसे

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 6

ख़ुद को खुदा, तुझको जुदा है माना मैंने,सच कहूँ - ख़ुद को बिल्कुल भी ना जाना मैंने !एक अरसे बाद आज मेरी आँख खुली,केवल ठुकराया बस, ना सीखा अपनाना मैंने । ✍🏻 अभिनव कुमार मान ही गए हम तुम्हें जनाब,मंसूबों को अपने दिया

अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 5

मुझे ज़िन्दगी तुझसे शिकायतें बहुत हैं,तुझे दी मैंने हरपल हिदायतें भी बहुत हैं,आज निकला जब मैं सड़क पर,तब जाना कि तेरी मुझ पर इनायतें बहुत हैं । अभिनव कुमार तुमने बनानी चाही हमसे,हम बना ना पाए,,ग़ैरों की तो बात दूर,मेरे पास ना साए ।

हमारी वो मासूम मां

हमारी वो मासूम मां, जिनके पास ऐसी मासूम मां हैं जिनका …… न कोई सोशल मीडिया पर अकाउंट हैं, न फोटो , सेल्फी का कोई शौक है, उन्हें ये भी नहीं पता की स्मार्टफोन का लॉक कैसे खुलता है, जिनको ना अपनी जन्मतिथि का पता है,

रोजगार की चाहत – कविता मनोज कुमार – हनुमानगढ़

रोजगार की चाहत खाली कंधो पर थोड़ा सा भार चाहिए।बेरोजगार हूँ साहब रोजगार चाहिए।जेब में पैसे नहीं डिग्री लिए फिरता हूँ।दिनोंदिन अपनी नजरों में गिरता हूँ।कामयाबी के घर में खुलें किवाड़ चाहिए।बेरोजगार हूँ साहब मुझे रोजगार चाहिए।प्रतिभा की

मनोज कुमार – छद्म रचनाएँ

कभी साथ बैठो तो पता चले की क्या हालात है मेरेअब तुम दूर से पूछोगे तो सब बढ़िया हालात है मेरेमुझे घमंड था की चाहने वाले दुनिया में बहुत है मेरेजब बात का पता चला तो उतरगये नखरें तेवर सब मेरे।। मनोज कुमार, नोहर (हनुमानगढ़) होठों पर

आसान है क्या …

आसान है क्या … आसान है क्या ?सोचो तो सब कुछ !सोचो तो कुछ भी नहीं ! चिंतन पर,सबकुछ ही निर्भर,क्या सरल, क्या है विकट ! मन:स्थिति,लिखती है विधि,बनाए बिगाड़े हर घड़ी । श्वास लेना,आसान है क्या ?कोशिश कर, सब कुछ होगा । आत्मबोध -

अजय महिया छद्म रचनाएँ – 5

हर सुबह का धूआं कोहरा नहीं होता है ।हर रात का चन्द्रमा काला नही होता है ।।बीत जाते हैं ज़िन्दगी के हसीन पल भी ।हर दिन नए साल का सवेरा नहीं होता ।। अजय महिया नोहर, हनुमानगढ़ दिल की धड़कनें ,रातों की नींद,मेरा चैन ले गई ।इक खुबसूरत कली
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